अच्छे दिनों की तलाश में ना कितने ख्वाब, रोज़ गाँव से निकलते हैं शहर की तरफ। कच्ची उम्र का भोला और नादान युवक जब शहर पहुँचता है तो ये दुनिया सबसे पहले छुड़ा लेती है उसकी मासूमियत। फिर शुरू होता है झूठी कामयाबियों का वो सफ़र, जिसमे इंसानियत के एहसास धीरे धीरे दम तोड़ते जाते हैं।
लेकिन कहीं ना कहीं आत्मा कचोटती है। जिंदगी की असलियत से रूबरू होकर आँखों पर से रंगीन पर्दा हटता है। दुनिया भर का नाम, शोहरत, रुतबा और दौलत भी वो सुकून नहीं दे पाती जो अपनी मिटटी अपने लोगों में मिलता है। इस रफ़तार भरी जिंदगी में दौड़ते दौड़ते घायल जज्बातों के रिसते घावों को, कभी ना कभी ठहर कर धोना ही पड़ता है।
अपनी जड़ों से कोई कब तक भाग सकता है। आसमानों को छूने की चाह में जड़ों से दूर हो चुके दरख़्त को, मामूली हवायें भी गिरा जाती हैं। ज़रूरी है कि इंसान ऊंचाई पाने के साथ साथ गहराई से भी अछूता न रहे। और ना भूले अपनी ज़मीन को और ज़मीन से जुड़े लोगों को।
अपनी जड़ों की और लौटते इन एहसासों को शब्दों में बांधने की एक कोशिश...
आ अब लौट चलें...
सर की ज़द से बाहर चले दिल की ठांव हो लिये
बाद मुद्दत के शहर से निकले वापस गाँव हो लिये
अरमानों को पंख लगे थे कभी सुनहरे ख्वाबों के
सच से रूबरू यूँ हुये कि फिर से पाँव पाँव हो लिये
कामयाबी के मौसम में शोहरतों की बारिश थी
रिश्ते भी कागज़ की जैसे बरसाती नांव हो लिए
बचपन के वो गीत थे जितने कोयल जैसी तानो में
इस जद्दोज़हद में जिंदगी की कांव कांव हो लिये
हक़ीक़तों की कड़ी धूप में जज्बातों की खैर कहाँ
हम अपने एहसास थाम कर छाँव छाँव हो लिये
©- प्रशांत सेठ
ज़द=दायरा
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