Monday, August 25, 2014

मैं इन्कलाब हूँ !!!

जनकवि स्व. विपिन मणि  जी की 12वीं पुण्यतिथि पर कोटा (राजस्थान) में उनकी स्मृति में आयोजित कवि सम्मलेन में सम्मिलित हुए। काव्य रस की अदभुत धारा बहाने के लिये इस कार्यक्रम के आयोजक प्रिय मित्र डॉ. उदय मणि, कपिल मणि और लोकेन्द्र मणि को हार्दिक बधाई।
संसार में कुछ एक ही ऐसे किरदार होते हैं जो खुद के लिये नहीं जिया करते। इसलिये उनका जीवन देह की सीमाओं से परे जाकर मृत्यु के लिये भी चुनौती बन जाता है। मृत्यु का अधिकार केवल देह पर हो सकता है, विचारों पर नहीं।

श्रद्धेय बाबूजी स्व. विपिन मणि जी को श्रद्धांजलि...

अपनी औलाद पर कब अपना असर नहीं होता
सच की ज़मीन पर कभी झूठ का शज़र नहीं होता
लो देख लो मेरा अक्स अब मेरे बच्चों में
एक जागता ख्वाब हूँ मैं, जो कभी नहीं सोता
...
और ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस अदभुत प्रेम और अपनेपन को जो मणि परिवार के हृदय में बसता है

तिजारत का हुनर मेरा, शायद मुझसे रूठ गया
बरसों से मुनाफे का सिलसिला यूँ टूट गया
दिल के कारोबार में अबकि घाटे की आमद हुई
जिस्म फकत ले आया हूँ, मैं वहीँ छूट गया

© - प्रशांत सेठ

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