Friday, August 1, 2014

एक थे विषधर भाई

नागपंचमी स्पेशल पंच...

मियां सांप को दूध नहीं पिलाओगे?? बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोलकर देखा तो खड़े थे विषधर भाई
डर की वजह से अपनी घिग्गी बंध आयी
हमने हौले से पूछा आज हमारी याद कैसे आयी??
कोई ना कोई बात इसमें होगी ज़रूर
वरना आप कहाँ आते हैं, आप तो बुलवाते हैं हुज़ूर

वो अन्दर आये बैठे, फुफकारते हुये फन पटका
हमने किसी अनहोनी की आशंका से थूक गटका
बोले विद्वान् होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
वैसे तो हम तुम्हारा खून पीकर काम चलाते हैं
आज व्रत की मजबूरी है हम शाकाहार अपनाते हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमारा गला भर आया आवाज़ थरथरा गयी
गुस्से के साथ साथ थोड़ी हिम्मत आ गयी
हमने कहा हुज़ूर आप तो अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप हैं के साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है वो डायन महंगाई
जो चट कर गयी है हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे भी अब पानी पीकर काम चलाते हैं
इसलिये आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है अब नहीं चलने देंगे किसीकी दबंगाई
अब की मनाएंगे आज़ादी जैसी पहले कभी नहीं मनायी

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम सांप हो ये बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बंटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था उसको हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनावों के मौसम में जिनको हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
और वोट को समझ रहे थे दूध मलाई
अब तक होता था सत्कार आज दुत्कार है पायी
क्योंकि हमको भी पैंसठ बरस के बाद अकल आयी

© - प्रशांत सेठ

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