Tuesday, August 26, 2014

कैसे समझूं प्रेम की भाषा

विगत जन्माष्टमी पर मैं कुछ ढूँढ रहा था। मैं ढूँढ रहा था वो कारण जो मनुष्य और परमात्मा के बीच दूरी उत्पन्न करता है। इस चिंतन ने एक रचना को जन्म दिया ...

जीवन में है शेष कदाचित
अभिलाषा निज सम्मान की
भटक रहा हूँ जगत में लेकर
आशा मिथ्या पहचान की
मैं क्या समझूं प्रेम की भाषा
मुरलीधर घनश्याम की

मन बसी स्वार्थ की नगरी
सत्ता जिसमें अभिमान की
हूँ आकंठ नदिया में डूबा
माया मोह और अज्ञान की
मैं क्या...

शोर बहुत हुआ इच्छाओं का
भीड़ लोभ मद और काम की
दौड़ा रही नित स्वप्नों के पीछे
भूख दिन रात सुबह शाम की
मैं क्या ....

लालसाओं में लिप्त ह्रदय ज्यों
रण भूमि जीवन संग्राम की
गुंजित कैसे फिर कानों में होगी
ध्वनि मधुर मुरली के तान की
मैं क्या ...

© - प्रशांत सेठ

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