उस अनंत विराट ईश्वर की प्रभुता को पूर्ण रूप से जान पाना हमारी स्थूल बुद्धि के लिए कदापि संभव नहीं है, परन्तु फिर भी हम अपने अपने पांडित्य के अहंकार में उसके वर्णन और क्लिष्ट व्याख्याओं में उलझे रहते हैं। यहाँ तक की महापुरुषों द्वारा अनुभूत सत्य की भी अनर्थपूर्ण व्याख्या हम अपनी मूढ़ बुद्धि से करते रहते हैं। यह कुचेष्टा हमें संतों और ग्रंथों के वास्तविक अर्थ से भटकाकर कथाओं के सतही दर्शन तक तो ले जाती है, परन्तु हमारे अज्ञान का नाश नहीं कर पाती। अधिकतर तो अहंकार के नाश के विपरीत, अहं की वृद्धि ही होती है। तब फिर उपाय क्या है?
पानी का बुलबुला सागर के विस्तार को जाने ना जाने, परन्तु अपनी लघुता को जानने का प्रयास तो कर ही सकता है। अपनी लघुता का स्वीकार ही प्रभुता का अवलंबन है, क्योंकि जब हम अपने बंधन को जान लेते हैं तो उस अवरोध को भी जान लेते हैं जो जीव को परमात्मा से विलग करता है। तब बुलबुले के फूटते ही वह ना केवल सागर को जान लेता है, वरन वह स्वयं सागर ही हो जाता है।
श्रीमद भगवद गीता हो या श्रीराम चरित मानस, कर्म मार्ग हो या भक्ति का, या वेद उपनिषदों द्वारा प्रदत्त ज्ञान; सभी ग्रंथों का सार तत्व तो एक है। दिव्य ग्रंथों के पात्रों को स्वयं के चित्त में देखने के प्रयास में जो मेरी अल्पबुद्धि को प्राप्त हुआ, वह इस रचना के रूप में, आपके साथ साझा करने का साहस कर रहा हूँ। मेरे प्रयास में भी निश्चित ही कुछ कमियां होंगी। अतः मेरी इस चेष्टा को बाल सुलभ चपलता समझकर गुरुदेव व सभी ज्ञानी ध्यानी संतजन मुझे क्षमा करें।
मेरे राम
राम पथ को भूल कामना
जब भी काम गली गई
स्वर्ण मृगों के आकर्षण में
तब तब भक्ति छली गई
माया के प्रभाव में हमने
धर्म को भी विदा किया
लक्ष्मण रेखा खींच धर्म ने
तब कर्तव्य अदा किया
साधु असाधु न जान सकी
भ्रमित हुई अनाथ बुद्धि
लाँघ गई सीमा स्वधर्म की
क्षण भर को ही चित्त शुद्धि
आसुरी वृत्तियों से मेरा
जब विवेक भी हार गया
तभी मति का हरण हुआ जब
चित्त मर्यादा पार गया
छोड़ राम को हम, प्रतिभागी
हुए काम स्वयंवर के
मोहपाश ने जकड़ा मन को
प्रेम अनुरक्ति चली गई
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स्वर्ण मृगों की यही कामना
स्वर्ण नगर तक ले आई
भक्ति बैठी शोक वाटिका
वन वन भटके रघुराई
अब ईश्वर वियोग में निशिदिन
करता हृदय मेरा विलाप
देकर नित संदेश प्रभु का
संत हरें इसका संताप
निर्मल चित्त अरु वृत्ति सरल
राम में जिनकी लीन है
संत रूप हनुमत के सम्मुख
रावण भी बल हीन है
पंचवटी प्रवास बना क्यों
अशोक वाटिका का अनुताप
प्रश्न स्वयं से पूछ लिया तो
भक्ति निखरती चली गई
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हुआ समाहित अल्प बुद्धि में
राम कथा का सार यही
कृष्णयोग जो है गीता में
व्यथा रूप संसार यही
क्षण भर को न प्राण रुकेंगे
हुआ राम से यदि वियोग
दश इन्द्रि से बने सुरथ पर
जीव यात्रा बने सुयोग
हृदय पटल पर प्राण प्रतिष्ठित
कमल नयन श्रीराम रहें
विषय भरे जगत में हर पल
भरत सदा निष्काम रहें
काम पाश से मुक्त हुई जब
ज्ञान अग्नि में तप तप कर
भक्ति तब निष्पाप हुई और
राम धाम को चली गई
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अहं भाव में कल्पित सृष्टि
बुद्धि अधजल गागर है
मैं का मिथ्या बोध मिटे तब
बूँद स्वयं ही सागर है
सीमित है इस ओर दृष्टि
उस छोर सकल विस्तार है
गुरु केवट बन साथ चलें तो
मन वैतरणी पार है
वाल्मीकि तुलसी व्यास के
श्री चरणों में सदा प्रणाम
सब ग्रंथों का सार यही है
तुम्हीं कृष्ण हो तुम ही राम
प्रेम प्रतीक्षा त्याग तपस्या
भाव समर्पण अंतस में
भक्ति बन गई जब शक्ति तो
पुनः कभी ना छली गई
© - प्रशांत सेठ
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