जब हम ऋण लेते हैं तो ऋणदाता के पास किसी मूल्यवान वस्तु को गिरवी रखना पड़ता है। हम सभी ने स्वयं को काल के पास गिरवी रखकर, ऋण रूप यह जीवन प्राप्त किया है।
श्रेष्ठ व्यापारी वही है जो गिरवी वस्तु को समय पर मुक्त करा ले और ऋण भी इस प्रकार चुकाये कि पुनः ऋण की आवश्यकता ही ना पड़े। मित्र धन से संपन्न सुदामा ऐसे ही श्रेष्ठ धनिक हैं जो लौकिक धन देकर अलौकिक संपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। संसार इन्हें निर्धन समझता है तो समझता रहे। कृष्ण को पाकर जिसकी सारी मांग समाप्त हो जाए उससे बड़ा धनवान कौन हो सकता है।
सुदामा
सौ सौ बार हुए अपमानित
भक्तों को परवाह नहीं
सम्मानों का मुकुट रखो तुम
उनको इसकी चाह नहीं
गिरते पड़ते उठते चलते
जिसने हर पल थामा है
सदा उसी के द्वार खड़ा ये
अति धनवान सुदामा है
जिसके उर में कृष्ण बसा है
उसके धन की थाह नहीं
मोल लगाना बड़ा कठिन है
मुट्ठी भर उस चावल का
सुनो द्वाररक्षक ना रोको
रस्ता ऐसे पागल का
इसके लिए द्वारिका के
वैभव की भी परवाह नहीं
है दीनों का मित्र वही
जो दीनानाथ कहाया है
जगत तृषित रह गया देखता
दीन प्रेम रस पाया है
इस रस को पाकर भक्तों को
कभी किसी से डाह नहीं
जो पा गये कृष्ण को
वे कहते हैं तू कहाँ नहीं
कदम मेरे भी ठहर गये
जो यहाँ नहीं सो वहाँ नहीं
मेरी मंज़िल यही कृष्ण है
इसके आगे राह नहीं
© - प्रशांत सेठ
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