Sunday, February 10, 2019

परिभाषाओं के पार चलें तो?

ठहर गए हैं वो राह में
अपना सफर तो जारी है
ये खाली खाली एक बर्तन
भरे हुओं का आभारी है

ऊपर से नीचे बहना क्यों
मीठे जल की तू धारा
क्या देगा ये सागर तुझको
जो स्वयं ही है खारा
सीमित से उस विस्तार पर
अल्हड़ यौवन भारी है
ये खाली खाली...

शिल्प गणित के उपासक
अनगढ सौंदर्य क्या जानें
गढ़ लिए ईश्वर जिन्होंने
हम उनको ज्ञानी क्यों मानें?
प्यास यहाँ पर कहीं नहीं
बस कुओं की सरदारी है
ये खाली खाली...

गणित मंचों पर रोकेगा
भूख पथ से भटकाएगी
ज्ञान उद्गम तक तुमको
प्यास तीव्र ही ले जाएगी
चिंतन से शून्य लेखन
शब्दों की अय्यारी है
ये खाली खाली...

नई विधाएँ नई खोज
सीमा के उस पार मिलेगी
तोड़ दे सारे तटबंध दृष्टि
तब सृजन की कली खिलेगी
पूछ स्वयं से इस पथ पे क्या
चलने की तैयारी है?
ये खाली खाली...

© - प्रशांत सेठ


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