स्वयं के अज्ञान का बोध ही शायद ज्ञान की ओर पहला कदम होता है...
एक शाश्वत प्रश्न?
स्वप्न सदृश्य इस जगत में
मन क्यों इतना मगन है बोलें
कोई खिड़की उस तरफ की
हे ईश्वर अब आप ही खोलें
हाँ, बहुत सुंदर है माना
इस जगत का ताना बाना
किन्तु है ये रहस्य अभी भी
कहाँ से आये, कहाँ को जाना
अंधे की भांति हम कब तक
खोयी हुई राह टटोलें
कोई खिड़की...
शाश्वत नहीं, सत्य नहीं है
जीवन किन्तु असत्य नहीं है
मार्ग है ये किस गंतव्य का
ज्ञात इसका तथ्य नहीं है
मार्ग के दृश्यों को अपने
मन में कैसे हम संजो लें
कोई खिड़की…
प्रश्न कहो या कहो जिज्ञासा
ये पथिक है ज्ञान का प्यासा
करुणा की बस एक झलक से
मन को दे दें आप दिलासा
अपनी व्याकुलता को हम भी
सिवा आपके किससे बोलें
कोई खिड़की...
बाहर भीतर ऊपर नीचे
चल दें बोलो अब किस ओर
अंतहीन इस राह का भी
निश्चित कहीं होगा छोर
आप तक जाती हो, उस ही
राह पर अब हम भी हो लें
कोई खिड़की...
© - प्रशांत सेठ
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