समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
- रामधारी सिंह दिनकर जी
समर्थ है फिर भी पराजित है, ज्ञान है फिर भी बंधन में है, नीति के ज्ञाता हैं फिर भी अनीति के साथ हैं। ऐसे ही चरित्र को भीष्म कहते हैं। जैसे ज्ञान होते हुए भी मार्ग से भटका हुआ कोई संत या सामर्थ्य होते हुए भी निष्क्रिय नेतृत्व।
अनीति के समक्ष जब भी सामर्थ्य और ज्ञान ने सर झुकाया है, तब परिणाम स्वरुप पश्चाताप ही पाया है। कहीं ना कहीं जीवन में हम सब भी तो थोड़े थोड़े भीष्म हो जाते हैं। विशेषकर तब, जब अनीति के समक्ष मौन धारण कर लेते हैं।
भीष्म-द्वन्द
मुक्ति का सामान सब है
सामर्थ्य शौर्य ज्ञान सब है
हूँ शर शैया पर किन्तु फिर भी
चिंतन को विश्राम कब है
मिट रही भ्रांतियाँ मन की
देख रहा त्रुटियाँ जीवन की
लौट रहीं स्मृतियाँ फिर से
बीते गये हर एक क्षण की
परिवर्तित होता हर पल ये
कालचक्र किसने देखा है
कभी मर्यादा की सीता भी
लांघ जाती लक्ष्मण रेखा है
फल मेरे ही कर्म अकर्म का
शत्रु रूप है आज धर्म का
बहुत विलम्ब से जाना मैंने
अर्थ सृष्टा के मर्म का
एक संकल्प लिया था मैंने
भावुकता के ज्वार में
मैं अपराधी हुआ सत्य का
मोह समक्ष उस हार में
उस संकल्प में बंधकर फिर
देख रहा हूँ द्यूत सभा को
मौन धारण किये ज्ञान को
कर्तव्य की विलुप्त प्रभा को
अहंकारमय एक चित्त अधीर
खींच रहा मर्यादा का चीर
और समय लिख रहा मुझको
अधर्म समक्ष एक निष्क्रिय वीर
निज संकल्पों का बंदी हूँ
मैं नियति का प्रतिद्वंदी हूँ
मार रहा हूँ खुद को खुद ही
मैं स्वयं ही तो शिखंडी हूँ
वर्षों पहले इस कृत्य का
फल मैंने ही वरण किया था
एक स्त्री की मर्यादा का
जब मैंने भी हरण किया था
अधर्म संग प्रतिबद्धता खड़ी है
निज प्रतिज्ञा धर्म से बड़ी है
मेरे संकल्प की शत्रु बनकर
इसलिये नियति स्वयं लड़ी है
कब तक लड़ेगा स्वप्न, यथार्थ से
पराजित भीष्म को होना है पार्थ से
अपने अपने जीवन काव्य को
हम भी समझ लें इसी भावार्थ से
© - प्रशांत सेठ

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