नारी
बहुत की कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूं तो तुमपर लिखने
लायक मेरी औकात नहीं है
विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है
संस्कारों की जननी तुम
मानवता की तुम शिल्पी
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही ज़ात नहीं है
भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा तुम लक्ष्मी
अबला कहूं उचित बात नहीं है
सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है
सृष्टि का श्रृंगार हो तुम
हर रचना का सार हो तुम
क्या सात रंग सात सुरों का
अदभुत तू अनुपात नहीं है ?
माँ का कभी आँचल बनकर
कभी प्रेयसी का काजल बनकर
प्रभु प्रेम का प्रतिबिम्ब नारी
क्या इश्वर का मौन संवाद नहीं है ?
© Copyright Regd. - प्रशांत सेठ
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