पिछले कुछ दिनों से सफ़र में हूँ। कुछ सीखने और जिंदगी को समझने के लिये सफ़र में रहना ज़रूरी है। लोगों से मिलने मिलाने में जिंदगी निकल जाती है और जिंदगी बिना मिले ही निकल जाती है। इसलिये इस बार का सफ़र जिंदगी से मिलने के लिए। इस दौरान लिखी गयी कुछ पंक्तियाँ....
ज़िन्दगी एहसास का सफ़र, तुम मीलों चले,
और हमसे नहीं मिले, तो फिर क्या मिले !
हम समंदर के मानिंद हैं, मुद्दतों से प्यासे,
तुम दरिया की तरह कभी, लग जाओ गले !!
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बेकरारियों को बरकरार रहने दो
कुछ अधूरा सा ये प्यार रहने दो
ख़त्म ना हो जाये कहीं मोहब्बत का सफर
वस्ल छोडो, मंजिलें दुश्वार रहने दो
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ये ना पूछो क्यों, कैसे, कब किधर हैं,
बहता हुआ दरिया हम, इंतज़ार में समंदर है !
मुसाफिर का मज़हब कहो, या हालात की मजबूरी
ठहरे तो गुनाह है, चलना ही मुक़द्दर है !!
© - प्रशांत सेठ
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