Sunday, May 18, 2014

दो टूक

आम आदमी पार्टी को चार सांसदों की बधाई। कुछ अन्य दलों के समर्थक जो इसे बहुत कम बता कर व्यंग कस रहे हैं वो शायद इससे ज़्यादा की उम्मीद लगाये बैठे थे. इस उम्मीद के लिए उनको धन्यवाद दिया जाना चाहिए। देश की जनता ने केजरीवाल जी की ईमानदारी पर विश्वास तो किया है मगर साथ ही अपरिपक्व भी माना है. और ये सही भी है. मोदी जी ने इस चुनाव में अपनी परिपक्वता और प्रबंधन के सामने बड़े बड़े दिग्गजों को बौना साबित कर दिया।

आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों में कोई खामी ना होने के बावजूद उनको अपने ही संगठन में विरोध भी सहना पड़ा. कारण ये की संगठन में प्रमुख ज़िम्मेदारियाँ संभाले हुये कार्यकर्ता स्वयं के लिए उम्मीद लगाये बैठे थे. जो राजनीति को बदलने की बात अरविन्द केजरीवाल करते हैं उसका ज़रा भी अंश जिले और प्रदेश स्तर के अधिकांश कार्यकर्ताओं में नहीं दिखता। स्वार्थ की वजह से स्वयं से अधिक योग्य लोगों को स्वीकार करने की क्षमता ख़त्म हो जाती है. संगठन को खड़ा करने और समाज को जागरूक करने की बजाय आज भी यदि पहले प्राथमिकता चुनावी राजनीति को दी गयी तो यह परिणाम बार बार आएंगे। सत्ता केंद्रित राजनीति मुद्दों से भटकाव का कारण बनती है.

सचमुच व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए, संगठन की ज़िम्मेदारियों से सत्ता लोलुप और अपरिपक्व व्यक्तियों को हटाने का साहस करना पड़ेगा। साथ ही प्रत्येक प्रदेश में हिवरे बाजार जैसे ग्राम विकास कार्यक्रमों को करके दिखाना पड़ेगा। सिर्फ पोपट राव पवार (सरपंच हिवरे बाज़ार) की CD दिखाने से काम नहीं चलेगा। धैर्य और मेहनत का काम है मगर जल्दी क्या है? जल्दी वो करता है जो अपने लिये पेड़ लगा रहा हो. जो भविष्य का निर्माण कर रहा हो उसमे स्वार्थ और अधीरता नहीं होती।

उपरोक्त सुझाव विगत दो वर्षों से दिये जा रहा हूँ मगर भ्रम के रास्ते पर अक्सर चिंतन छूट जाता है. शोर भी बहुत पाल लिया है आस पास, इसलिए शायद सुन नहीं पा रहे है. कीचड को साफ़ करने के लिए कीचड में उतरना पड़ता है. ज़रूर उतरिये, मगर मन को कीचड मुक्त करने के और संगठन का कीचड साफ़ करने के बाद. आज भी पुन: सुझाव यही सोचकर दिया है की शायद अब चिंतन का दौर शुरू हो चुका होगा।

वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन की उम्मीद अन्य किसी राजनीतिक दल से नहीं रखी जा सकती। क्या "आप" से रखी सकती है?

उजालों के इंतज़ार में, बहुत अँधेरे देखे हैं,
सारी रात का जागा हूँ, अब सवेरे देखे हैं !
आज फिर उगा है सूरज, एक नई उम्मीदों का,
आज फिर आँखों ने मेरी, ख्वाब सुनहरे देखे हैं !!

© - प्रशांत सेठ

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