Monday, May 26, 2014

अविस्मरणीय छुट्टियाँ

स्वार्थ, मतलब, कारण से तो अनगिनत रिश्ते बनते हैं मगर कुछ रिश्ते अकारण बनते हैं। इन रिश्तों में इसलिये जान होती है क्योंकि ये हर कारण से मुक्त और अनजान होते हैं। इसको ही मित्रता कहते हैं।

बहुत दिन बाद इतना हँसे और इतना जिये। अपनों के साथ दो दिन की छुट्टी में समझ लीजिये वक़्त को लूट लिया। जितना कुछ वो दे सकता था उससे अधिक ले लिया। अब सब अपने अपने शहर और अपने अपने काम पर लौट गये मगर सुखद स्मृतियाँ शेष हैं और सदैव ऊर्जा देती रहेंगी

दूरियाँ मजबूरियाँ दिल कुछ भी गाता रहे
याद के पंख लगाकर मन का पंछी आता रहे
कैद कर लो इन लम्हों को एहसास के पिंजरे में
ताउम्र ये परिंदा पंख ही फड़फड़ाता रहे

© - प्रशांत सेठ

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