एक बहुत ही प्रिय मित्र को समर्पित यह कविता, उन सभी लोगों के लिए प्रेरक है, जो जीवन में नैराश्य भाव से ग्रसित होकर हार मान लेते हैं....
जीवन के हरित उपवन में
प्रकृति के विभिन्न रंगों के बीच
रिश्तों की प्यासी धरती को
प्रेम की पावन गंगा से सींच
प्रकृति के विभिन्न रंगों के बीच
रिश्तों की प्यासी धरती को
प्रेम की पावन गंगा से सींच
गरजते मेघों से सुर लेकर
गा रे ह्रदय कोई शाश्वत गीत
गा रे ह्रदय कोई शाश्वत गीत
श्वांसों की आती जाती पुरवाई
कहे ऋतुओं को बाहों में भींच
नैनों में नये स्वप्न उभरे हैं
मन गया है स्वयं पर रीझ
चीर धरती की छाती फिर
अंकुरित हुआ आशा का बीज
कहे ऋतुओं को बाहों में भींच
नैनों में नये स्वप्न उभरे हैं
मन गया है स्वयं पर रीझ
चीर धरती की छाती फिर
अंकुरित हुआ आशा का बीज
बांह पसारे नील गगन भी
राह तक रहा जैसे मनमीत
मन वीणा के तारों ने भी
छेड़ दिया मधुर मिलन संगीत
बढ़ चला एक नन्हा पौधा
आकाश पथ पर अकेला निर्भीक
राह तक रहा जैसे मनमीत
मन वीणा के तारों ने भी
छेड़ दिया मधुर मिलन संगीत
बढ़ चला एक नन्हा पौधा
आकाश पथ पर अकेला निर्भीक
वृक्ष बनकर खड़ा होगा कल
और याद करेगा अपना अतीत
यही संदेश देगा वो जग को
दही मथा तब मिला नवनीत
सुख में दुःख में हर मौसम में
निभाते रहना जीवन से प्रीत
और याद करेगा अपना अतीत
यही संदेश देगा वो जग को
दही मथा तब मिला नवनीत
सुख में दुःख में हर मौसम में
निभाते रहना जीवन से प्रीत
© - प्रशांत सेठ
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