Wednesday, June 4, 2014

भगीरथ


समय की लहरें ले जायेंगी
अक्षर अक्षर जो है तट पर
निराशा को रेत पर लिखना
आशा लिखना पत्थर पर

जीवन है अभी शेष बहुत
चल पथिक साहस रथ पर
सुगमता ढूँढ़ रहा जग सारा
तू चल केवल दुर्गम पथ पर

ढूँढ़ कहीं वो निश्चित होगा
कोई भगीरथ तेरे अन्दर
उतर आयेगी धरती पर गंगा
संकल्प दृढ रख, स्वप्न सच कर

चुनौतियों से मत घबराना
प्रलोभनों से चलना बचकर
अवरोधों से निखर आयेगी
प्रतिभा जो सोती है छुपकर

क्षणिक सफलता बहकाये तो
कह देना तुम उससे हंसकर
संकल्प अभी कहाँ पूर्ण हुआ है
समर शेष है, उत्सव मत कर

सच पूछो तो यही लक्ष्य है
सतत चलना मिथ्या से हटकर
बोध होने को क्षण ही बहुत है
सत्य स्वयं आता है चलकर

© - प्रशांत सेठ

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