Sunday, June 29, 2014

आ माँ घर चलें

आज माँ (बहुत प्रिय मित्र की माँ, अपनी माँ) बीमार है। बहुत बीमार, जीवन मृत्यु के बीच। ऐसे में एक प्रार्थना ने जन्म लिया और ये सभी बुजुर्गों के लिये इश्वर से विनती बन गयी।

मुझे पूरा विश्वास है ये पुकार पहुंचेगी उस परम सत्ता तक और माँ घर वापस आएगी... आप लोग भी दुआ कीजिये।

धूप का सफ़र मेरा, बुजुर्गों की छाँव रखना
आँगन के दरख्तों को, मेरे साहिब बचाये रखना

लहरों से मुकाबिल हूँ, तजुर्बों की नाव रखना
दस्त-ए-दुआ उनकी, मालिक तू बनाये रखना

पत्थरों के शहर में कोई, मिट्टी का गाँव रखना
एहसास के घरोंदों को, मेरे दिल में बसाये रखना

ख्वाबों के पंख हों बेशक, हवाओं पर पांव रखना
रिश्ता शज़र से मौला, परिंदों का बनाये रखना

इतनी मेहरबानी, मुझपर हवाओ रखना
शमा-ए-जीस्त उनकी, हरदम जलाये रखना

जिंदगी लगे, लग जाये, कैसा भी दांव रखना
माँ बाप का साया, सर पर बनाये रखना

© - प्रशांत सेठ

दस्त-ए-दुआ=दुआ का हाथ, शज़र=पेड़, शमा-ए-जीस्त=जीवन ज्योति

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