उम्मीद का सहरा बाँध कर जब कोई किसान हल जोतता है, बीज बोता है, तब वह एक पल के लिये भी यह नहीं सोचता की बादल बेवफा हो जायेंगे। एक अटूट विश्वास लिये जब उसका पसीना खेत में गिरता है और धोंकनी की तरह चल रही उसकी साँसों में शहनाई का स्वर उभरता है, तब माँ के रूप में धरती खुश होकर लहलहाती फसल सी दुल्हन पाने का आशीर्वाद देती है। मगर क्या कीजिये, मंडप के नीचे तो पिता के रूप में बादल का आशीर्वाद भी ज़रूरी है ना। ऐसे में पिता ही नदारद हो जाये तो क्या कीजिये?
इस बरस ये बादल फिर आवारगी पर उतारू हैं। ना जाने कितने धरतीपुत्रों के प्राणों पर बन आयेगी। महंगाई गरीबी के सर पर नाचेगी और क़र्ज़ में डूबी हुई जिंदगियां, इंसानियत के गिरे हुये स्तर को नापेंगी
इश्वर से यही प्रार्थना कीजिये के बारिश बरसे और झूम के बरसे ...
आँखों से बरसे पानी, बरसे ना अब्र से
दर्द जीत ना जाये कहीं उसके सब्र से
सूखी रहे फसल, न बेवफा हों बारिशें
सींचे न कोई दहकाँ, मर कर फिर कब्र से
दर्द जीत ना जाये कहीं उसके सब्र से
सूखी रहे फसल, न बेवफा हों बारिशें
सींचे न कोई दहकाँ, मर कर फिर कब्र से
© - प्रशांत सेठ
अब्र=बादल, दहकाँ=किसान
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