Tuesday, July 22, 2014

एक सफ़र जिंदगी

है जब तलक यहाँ बसर जिंदगी
तू मेरी मैं तेरा हमसफ़र जिंदगी

चिराग हो ज्यूँ आँधियों से मुखातिब
जलेगी कब तक क्या खबर जिंदगी

एक सांस ली एक छोड़ दी जैसे
कभी बाहर कभी अन्दर जिंदगी

पत्थरों पर बहते दरिया सी आज
है कल का ये कोई समंदर जिंदगी

वीराने में खिले किसी गुल के मानिंद
तन्हाईयों का जैसे एक घर जिंदगी

समाती नहीं इसमें ख्वाहिशें सारी
हक़ीक़तों की छोटी चादर जिंदगी

धूप, छाँव, कभी बारिश का मौसम
है बहुत खूबसूरत मगर जिंदगी

© - प्रशांत सेठ

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