Friday, June 27, 2014

माँ झूठी है

इश्वर किसी माँ को ये दो चीज़ें एक साथ ना दे। या तो औलाद ना दे या गरीबी ले ले।

फूटपाथ पर एक भूख से बेहाल मासूम को बहलाते हुए जब उस माँ को देखा तो अन्दर तक हिल गया। एक ख्याल उभरा और फिर एक क़ता हो गया...

ना जाने पाप था उसके झूठ में, या पुण्य दिलासों में !
मासूम भूख को बहलाती, बेबस माँ की आहों में !!
सच से मचलते बचपन को, फिर एक झूठ ने सुला दिया !
मैं सोचता रहा और वो बढ़ गयी, लिये जिंदगी बाहों में !!

और इसी बात पर मासूम बचपन का जवाब देखिये...

झूठे दिलासों से जब वो बहलाती है
खाली बर्तन में चमचा हिलाती है
खाने के पहले माँ लोरी सुनाती है
तब मैं भी सो जाता हूँ,
वर्ना भूखे पेट किसे नींद आती है

© - प्रशांत सेठ

No comments:

Post a Comment