भोर की पहली किरण से, सूरज सबसे पहले उस दीप को प्रणाम करता है जो रात भर जला है। सुबह होती है और रोज़ होती है, कल फिर होगी। भोर की प्रतीक्षा सो कर करने वालों के जीवन में अंधकार रोज आता है, मगर जिसने जलना सीख लिया, वह अंधकार मुक्त हो गया। इस अन्यायपूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था को ललकारने वाले हर सिपाही को समर्पित...
कुछ दूर तक तो चलना होगा
शौर्य को, त्याग को
सुबह तक तो जलना होगा
संघर्ष की आग को
आँधियों बरसातों में भी
खिलना होगा बाग को
गीत क्रांति का लिख चुका है
गढ़ना होगा राग को
हर तरफ जुल्म हो तब
उठना होगा समाज को
राष्ट्र के दामन पर है जो
मिटना होगा दाग को
दी जिसने है चुनौती
इस अंधियारी रात को
नतमस्तक है सूरज भी
छोटे से चिराग को
© - प्रशांत सेठ
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