Friday, April 25, 2014

कल के लिए ज़िंदा रहें

कल के लिए कुछ तो यहाँ ईमान ज़िंदा रहे,
दिल में रिश्ते और वफ़ा का नाम ज़िंदा रहे !
मोहब्बत, यकीन, रहम, इबादत रहे किरदार में,
हर शख्स में ज़रा ज़रा सा इंसान ज़िंदा रहे !!

गुम ना पाये तजुर्बों की भीड़ में बचपन,
मासूमियत हर चेहरे पर यूँ ताबिन्दा रहे !!

ज़िंदा रहे और ज़िंदगी मुस्कुराये लबों पर,
गम जो टकराये कभी तो वो भी शर्मिंदा रहे !!

उड़े, मगर लौट आये मन, शाम ढलने तक,
रात घर में, अपनी ख्वाहिश का परिंदा रहे !!

लाशों के ढेर पर सब छूने चले आसमान,
कोई तो इस शहर में ज़मीन का बाशिंदा रहे !!

© - प्रशांत सेठ

ताबिन्दा = चमकता, बाशिंदा = रहने वाला

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