Wednesday, April 23, 2014

जो मन देखा अपना...

मन चंचल होता है। कभी लोभ में, कभी भावुकता में, या अन्य भावनाओं के वशीभूत होकर, अनेक ऐसे प्रलोभन देता है कि बुद्धि और विवेक दोनों समर्पण कर देते है। मन की इच्छा पूरी करने के लिये, अनेक बार हम सत्य को भी नकार कर निर्णय लेते हैं। कालांतर में यही निर्णय दुःख का कारण बनते हैं।

अधिकार करना है तो अपने मन पर किया जाए। जीतने की चीज़ तो अपना मन है। जिसने खुद पर नियंत्रण कर लिया उसने संसार पर कर लिया।

एक मुक्तक

जो औरों पर की, तो बिखर जाओगे,
हुकूमत खुद पर कर लो, निखर जाओगे !
दुनिया से भागे तो ठिकाने और भी हैं,
खुद से भाग कर मगर किधर जाओगे !!

© - प्रशान्त सेठ

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