Monday, April 7, 2014

विचार यात्रा

समाज को श्रेष्ठ विचार और मार्ग देने वाले लोग भी अक्सर एक गलती कर जाते हैं। श्रेय लेने की होड़ में भूल जाते हैं कि विचार अनश्वर और नाम नश्वर होता है। दोनों की गति अलग है। किसी के नाम की गठरी का बोझ लेकर विचार बहुत दूर नहीं जा सकता। नाम तो एक दिन वैसे भी मिट जाना है।
स्वयं के मन की इच्छाओं को सामाजिक क्रांति से जोड़कर चलने वाले अनेक मित्र परेशान हैं कि लोग उनकी बात क्यों नही समझते। इसलिए नही समझते क्योंकि आप स्वयं को स्थापित करने के लिये संघर्ष करने लग जाते हैं। जबकि संघर्ष होना चाहिए सिद्धांतों को स्थापित करने के लिये।
हम सब विचारों के वाहक हैं, सृजक नहीं। विचार सृष्टि में पहले से ही विद्यमान हैं। तभी तो हृदय में आने वाले विचार कहीं न कहीं ग्रंथों में पूर्व लिखित मिल जाते हैं। विचार अपनी यात्रा पर है। एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क के माध्यम से पूर्णता की ओर। इसके प्रवाह को अपने साथ बाँधने की कोशिश में हम उसकी यात्रा में बाधा उत्पन्न करते हैं। विचार भी स्वतंत्र रहें और हम भी। बंधन दोनों की प्रगति के लिये बाधक है, ऐसा मेरा मानना है।

मन की अनंत इच्छाओं के बोझ से
थक जाओ कभी जब स्वार्थपूर्ण सोच से
जीवन की दौड़ में ढूँढ़ना नि:स्वार्थ उद्देश्य
लोग साथ चल देंगे उस ही मोड़ से

- प्रशांत सेठ

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