Wednesday, July 19, 2023

मेरे राम


उस अनंत विराट ईश्वर की प्रभुता को पूर्ण रूप से जान पाना हमारी स्थूल बुद्धि के लिए कदापि संभव नहीं है, परन्तु फिर भी हम अपने अपने पांडित्य के अहंकार में उसके वर्णन और क्लिष्ट व्याख्याओं में उलझे रहते हैं। यहाँ तक की महापुरुषों द्वारा अनुभूत सत्य की भी अनर्थपूर्ण व्याख्या हम अपनी मूढ़ बुद्धि से करते रहते हैं। यह कुचेष्टा हमें संतों और ग्रंथों के वास्तविक अर्थ से भटकाकर कथाओं के सतही दर्शन तक तो ले जाती है, परन्तु हमारे अज्ञान का नाश नहीं कर पाती। अधिकतर तो अहंकार के नाश के विपरीत, अहं की वृद्धि ही होती है। तब फिर उपाय क्या है?

पानी का बुलबुला सागर के विस्तार को जाने ना जाने, परन्तु अपनी लघुता को जानने का प्रयास तो कर ही सकता है। अपनी लघुता का स्वीकार ही प्रभुता का अवलंबन है, क्योंकि जब हम अपने बंधन को जान लेते हैं तो उस अवरोध को भी जान लेते हैं जो जीव को परमात्मा से विलग करता है। तब बुलबुले के फूटते ही वह ना केवल सागर को जान लेता है, वरन वह स्वयं सागर ही हो जाता है।

श्रीमद भगवद गीता हो या श्रीराम चरित मानस, कर्म मार्ग हो या भक्ति का, या वेद उपनिषदों द्वारा प्रदत्त ज्ञान; सभी ग्रंथों का सार तत्व तो एक है। दिव्य ग्रंथों के पात्रों को स्वयं के चित्त में देखने के प्रयास में जो मेरी अल्पबुद्धि को प्राप्त हुआ, वह इस रचना के रूप में, आपके साथ साझा करने का साहस कर रहा हूँ। मेरे प्रयास में भी निश्चित ही कुछ कमियां होंगी। अतः मेरी इस चेष्टा को बाल सुलभ चपलता समझकर गुरुदेव व सभी ज्ञानी ध्यानी संतजन मुझे क्षमा करें।

मेरे राम

राम पथ को भूल कामना
जब भी काम गली गई
स्वर्ण मृगों के आकर्षण में
तब तब भक्ति छली गई

माया के प्रभाव में हमने
धर्म को भी विदा किया
लक्ष्मण रेखा खींच धर्म ने
तब कर्तव्य अदा किया 

साधु असाधु न जान सकी
भ्रमित हुई अनाथ बुद्धि
लाँघ गई सीमा स्वधर्म की 
क्षण भर को ही चित्त शुद्धि

आसुरी वृत्तियों से मेरा
जब विवेक भी हार गया
तभी मति का हरण हुआ जब
चित्त मर्यादा पार गया

छोड़ राम को हम, प्रतिभागी
हुए काम स्वयंवर के
मोहपाश ने जकड़ा मन को
प्रेम अनुरक्ति चली गई

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स्वर्ण मृगों की यही कामना
स्वर्ण नगर तक ले आई
भक्ति बैठी शोक वाटिका
वन वन भटके रघुराई 

अब ईश्वर वियोग में निशिदिन
करता हृदय मेरा विलाप
देकर नित संदेश प्रभु का 
संत हरें इसका संताप

निर्मल चित्त अरु वृत्ति सरल
राम में जिनकी लीन है
संत रूप हनुमत के सम्मुख
रावण भी बल हीन है

पंचवटी प्रवास बना क्यों
अशोक वाटिका का अनुताप 
प्रश्न स्वयं से पूछ लिया तो
भक्ति निखरती चली गई

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हुआ समाहित अल्प बुद्धि में
राम कथा का सार यही
कृष्णयोग जो है गीता में
व्यथा रूप संसार यही

क्षण भर को न प्राण रुकेंगे
हुआ राम से यदि वियोग
दश इन्द्रि से बने सुरथ पर
जीव यात्रा बने सुयोग

हृदय पटल पर प्राण प्रतिष्ठित
कमल नयन श्रीराम रहें
विषय भरे जगत में हर पल
भरत सदा निष्काम रहें

काम पाश से मुक्त हुई जब
ज्ञान अग्नि में तप तप कर
भक्ति तब निष्पाप हुई और
राम धाम को चली गई

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अहं भाव में कल्पित सृष्टि
बुद्धि अधजल गागर है
मैं का मिथ्या बोध मिटे तब
बूँद स्वयं ही सागर है 

सीमित है इस ओर दृष्टि
उस छोर सकल विस्तार है
गुरु केवट बन साथ चलें तो
मन वैतरणी पार है 

वाल्मीकि तुलसी व्यास के
श्री चरणों में सदा प्रणाम
सब ग्रंथों का सार यही है
तुम्हीं कृष्ण हो तुम ही राम 

प्रेम प्रतीक्षा त्याग तपस्या
भाव समर्पण अंतस में 
भक्ति बन गई जब शक्ति तो 
पुनः कभी ना छली गई

© - प्रशांत सेठ


Saturday, June 3, 2023

सुदामा

जब हम ऋण लेते हैं तो ऋणदाता के पास किसी मूल्यवान वस्तु को गिरवी रखना पड़ता है। हम सभी ने स्वयं को काल के पास गिरवी रखकर, ऋण रूप यह जीवन प्राप्त किया है। 

श्रेष्ठ व्यापारी वही है जो गिरवी वस्तु को समय पर मुक्त करा ले और ऋण भी इस प्रकार चुकाये कि पुनः ऋण की आवश्यकता ही ना पड़े। मित्र धन से संपन्न सुदामा ऐसे ही श्रेष्ठ धनिक हैं जो लौकिक धन देकर अलौकिक संपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। संसार इन्हें निर्धन समझता है तो समझता रहे। कृष्ण को पाकर जिसकी सारी मांग समाप्त हो जाए उससे बड़ा धनवान कौन हो सकता है।

सुदामा

सौ सौ बार हुए अपमानित
भक्तों को परवाह नहीं
सम्मानों का मुकुट रखो तुम
उनको इसकी चाह नहीं

गिरते पड़ते उठते चलते
जिसने हर पल थामा है
सदा उसी के द्वार खड़ा ये
अति धनवान सुदामा है

जिसके उर में कृष्ण बसा है
उसके धन की थाह नहीं

मोल लगाना बड़ा कठिन है
मुट्ठी भर उस चावल का
सुनो द्वाररक्षक ना रोको
रस्ता ऐसे पागल का

इसके लिए द्वारिका के 
वैभव की भी परवाह नहीं

है दीनों का मित्र वही
जो दीनानाथ कहाया है
जगत तृषित रह गया देखता
दीन प्रेम रस पाया है

इस रस को पाकर भक्तों को
कभी किसी से डाह नहीं

जो पा गये कृष्ण को
वे कहते हैं तू कहाँ नहीं
कदम मेरे भी ठहर गये
जो यहाँ नहीं सो वहाँ नहीं

मेरी मंज़िल यही कृष्ण है
इसके आगे राह नहीं

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, August 10, 2022

हिन्दु, हिंदुत्व, हिन्दुवाद एवं राष्ट्रवाद

हिन्दु, हिंदुत्व, हिन्दुवाद एवं राष्ट्रवाद

हिन्दु शब्द का प्रयोग किसी भी सनातन शास्त्र में क्यों नहीं है? वास्तव में जिसे सन्दर्भ में धर्म शब्द का वर्तमान समय में प्रयोग किया जाता है वह धर्म ना होकर मत, संप्रदाय अथवा पंथ है। पंथ एवं संप्रदाय अथवा मजहब केवल कुछ मान्यताओं (set of beliefs) को मानने के आग्रह को कहा जाता है। धर्म केवल एक ही है वह है "सनातन धर्म"। सनातन धर्म सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों एवं ईश्वर की अनेक व्याख्याओं को समाहित किये हुए है। ईश्वर की अनेक व्याख्याओं के होते हुए भी सनातन शास्त्र इस बात को सदैव स्वीकार करते हैं कि कोई भी परिभाषा इस असीम व अंनत तत्व को सम्पूर्ण रूप से नहीं समेट सकती। और यह भी स्वीकार किया गया है कि कोई भी परिभाषा अंतिम नहीं हो सकती। इस लिहाज से सनातन धर्म सदैव सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों एवं परिभाषाओं के प्रति ना सिर्फ सहिष्णु है, वरन भविष्य में नवीन तथ्यपरक चिंतन को स्वीकार करने के लिए तत्पर भी रहा है। सनातन धर्म में मनुष्यों की इसी वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा की भावना ही उसकी वास्तविक सहिष्णुता है। प्रश्न यह उठता है कि जब सब प्रकार की मान्यताओं का, यहाँ तक कि नास्तिक शास्त्रों (जो वेद विरुद्ध हैं), को भी यहाँ एक दर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त है, तब रक्षा किससे करना है और क्यों? अब यहाँ इस तथ्य पर गहराई से विचार करें तो मनुष्य की इसी वैचारिक दर्शन स्वतंत्रता की रक्षा करना सनातन धर्म है। जो पंथ अन्य मान्यताओं को ख़ारिज करते हैं अथवा भविष्य में नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न होने की सभी संभावनाओं का अंत करना चाहते हैं, सनातन धर्म में ऐसे कट्टरपंथियों को अधर्मी कहा गया है।

सनातन धर्म ने केवल मनुष्य ही नहीं, अन्य जीवों के साथ साथ प्रकृति के विभिन्न तत्व पर्वत, नदी, वृक्ष, इत्यादि के सह अस्तित्व को भी स्वीकार किया है। देव रूप में इन तत्वों की उपासना हमारे इसी दर्शन का बोध कराती है कि इन सबके बिना मनुष्य का अस्तित्व भी सम्भव नहीं है। अतः इनके प्रति सदैव आभार के भाव के साथ इनको पुष्ट करने हेतु सभी आवश्यक पद्धतियों का जीवन में समावेश ही सनातन संस्कृति है। किसी भी जीव के जीने के अधिकार के अधिकार के प्रति स्वीकार भाव ही हमारी अहिंसा की अवधारणा का मूल है। और यही अहिंसा हमें ऐसे अधर्मियों का विरोध करने की शक्ति देती है। अत: ऐसे सम्प्रदाय जो अन्य पंथों के प्रति असहिष्णु हैं, उन विधर्मियों को मनुष्यता का शत्रु जानकर ही उक्त श्लोक को पढ़ा जाता है।

अहिंसा परमो धर्मः
धर्म हिंसा तथैव च

हिन्दु शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो सनातन धर्म में विश्वास रखते हैं। इस लिहाज से हिन्दु स्वाभाविक रूप से सभी पंथों के प्रति सहिष्णु हो जाता है। यही हिंदुत्व की भावना है और एक कट्टर हिन्दु स्वाभाविक रूप से मनुष्य की स्वतंत्रता का रक्षक होने के कारण कट्टरपंथी आतंक के प्रति असहिष्णु हो जाता है। हिंदूवाद इसी दर्शन का मुखर स्वरुप है। इस कारण से हिन्दु के सन्दर्भ में कट्टरता के मायने ही बदल जाते हैं। एक कट्टर हिन्दु मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक है, जबकि अन्य पंथों की कट्टरता इसी वैचारिक स्वतंत्रता के हनन की पक्षधर है। अतः सनातन धर्म, हिन्दु, हिंदुत्व और हिन्दुवाद एक ही मूल भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो है मनुष्य की वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा।

राष्ट्र शब्द से जिस भाव की प्रतीति होती है वह धरती के उस भौगोलिक अंश को कहा गया है जहाँ एक प्रकार की मान्यताओं (set of beliefs) का प्रभुत्व होता है। इन्ही मान्यताओं को राष्ट्र की संस्कृति कहा जाता है। वैसे तो किसी समय सनातन धर्म संस्कृति का भौगोलिक विस्तार आज से कई गुना अधिक था, परन्तु राजनीतिक कारणों से हुई सांस्कृतिक हानि ने इसके विस्तार को वर्तमान भारत भूमि तक समेट दिया। इस सांस्कृतिक हानि का प्रमुख कारण सनातन धर्म की शिक्षा की स्वतंत्रता को समाप्त करने के साथ साथ सहिष्णुता और अहिंसा की गलत व्याख्या है। सनातन धर्म प्रदत्त वैचारिक स्वतंत्रता का दुरूपयोग करके अनेक कट्टरपंथी विधर्मियों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इस संस्कृति को नष्ट करने के लगातार प्रयास किये हैं एवं आज भी कर रहे हैं। वर्तमान हिन्दुवाद इस ऐतिहासिक तथ्य को भली भांति जानता है कि अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु, विधर्मी कट्टरपंथी आतंक से अपने राष्ट्र की रक्षा परम आवश्यक है। अतः एक हिन्दु स्वाभाविक रूप से राष्ट्रवादी भी होता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि अन्य पंथ अथवा सम्प्रदाय का व्यक्ति राष्ट्रवादी नहीं हो सकता। परन्तु यह अवश्य स्पष्ट हो जाता है कि दूसरों की वैचारिक स्वतंत्रता का हनन करने वाले कट्टरपंथ का भारत में कोई स्थान नहीं है। इसी जागरण से भयभीत होकर कुछ कतिपय स्वार्थी राजनीतिक तत्वों ने हिंदुत्व और हिंदुवाद के विषय में जानबूझकर भ्रम प्रसारित करने का दुष्कृत्य किया है। परन्तु वे ये नहीं जानते कि अनेक सदियों से ऐसे दुष्कृत्यों को झेलते हुए यह सनातन संस्कृति आज भी जीवित है और सदैव रहेगी। धर्म कदापि खतरे में नहीं है वरन अधूरे धार्मिकों के अस्तित्व हमेशा खतरे में रहते हैं। अतः अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सर्वप्रथम अपनी धार्मिकता को पूर्ण कीजिये। संसार को इस बात का परिचय दिया जाना चाहिए कि हमारी हिन्दुवादी कट्टरता इसी वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा का नाम है, जबकि विधर्मी पंथों में सहिष्णुता का कोई स्थान दिखाई नहीं देता। धर्मनिरपेक्ष का अर्थ है जिसे धर्म से कोई अपेक्षा ना हो, परन्तु हमें मनुष्य और विश्व के कल्याण के लिए सनातन धर्म से पूर्ण अपेक्षा है। यही हमारी धार्मिकता है। हिंदुत्व या हिन्दुवाद इसी लक्ष्य के प्रति कृतसंकल्प कट्टरता का नाम है। जय हिंद!

- प्रशांत सेठ

Tuesday, January 11, 2022

मिथ्या के मोहपाश

सत्य बोध तुम कहते जिसको,
सब मन का ताना बाना है।
एक ही रंग का चश्मा लेकर
सत्य को किसने पहचाना है?

जीवन समर के कुरुक्षेत्र में,
सत्य के समक्ष जब आओगे ।
निज कुतर्क के संधानों से,
सिर्फ पराजय ही पाओगे ।
कालचक्र जो चला आ रहा, 
क्या तर्कों से रुक पाना है?

प्रश्न सनातन जस का तस है,
मूक हुआ अब हर ज्ञाता है ।
पंथों के इस शास्त्रार्थ में,
उत्तर तो खो सा जाता है ।
उपादान हैं बुद्धि के सीमित,
फिर असीम को अपनाना है ।

मन है चक्षु के पीछे तो,
फिर मन के पीछे है कौन ?
करता सदा अचंभित मुझको,
दृष्टा का यह शाश्वत मौन ।
शोर है ये सब लहरों का ही,
अरु सागर तो अनजाना है ।

आह! पखेरू कटे रखे हैं,
अहं बोध के पिंजरे में ।
ज्यों असीम नभ जा बैठा हो,
सिमटा कर खुदको कमरे में ।
अंश स्वयं तू है अम्बर का ,
तोड़ के पिंजरा जाना है ।

सुप्त चेतना पड़ी हुई है
चित्त उलझा है तन मन में
अहो बिम्ब को भूल गया क्यों,
प्रतिबिम्बों की उलझन में ।
जाग शक्ति, अब जाग, तुझे,
इस शव में ही शिव जगाना है ।

© - प्रशांत सेठ



Monday, October 25, 2021

गांधीवाद बनाम भगवद गीता

गांधीवाद वास्तव में ऐसा दर्शनशास्त्र है जिसे स्वयं गांधी भी पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं कर पाए, तो अनुयायियों से क्या अपेक्षा की जा सकती है। व्यवहारिक धरातल पर विफल यह दर्शन वास्तव में सफल था नहीं बल्कि सफल दर्शाया गया। और सरकारी संरक्षण प्राप्त होने के कारण इसे सफल दिखाने में कोई कठिनाई भी नहीं हुई।

गांधीवाद वास्तव में राजनीतिक दृष्टिकोण से सफलता का सूत्र है क्योंकि यह जनमानस के आक्रोश को ठंडा करके बहलाने फुसलाने के लिये सर्वोत्तम अस्त्र है। परंतु यह गांधीवाद राष्ट्रनीति के दृष्टिकोण से घातक है क्योंकि यह अन्याय अधर्म के प्रति विरोध की मानसिकता को समाप्त करके नपुंसकता उत्पन्न करता है। पिछले 70 वर्ष के इतिहास में इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

गांधीवाद वही अर्जुन विषाद रोग है जिसका उल्लेख भगवद गीता के प्रथम अध्याय में मिलता है। शेष सत्रह अध्याय इस रोग के उपचार के लिए ही भगवान श्रीकृष्ण ने कहे हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है की भगवद गीता एक उच्च कोटि का दर्शन है जिसके सामने गांधीवाद अत्यंत बौना और अव्यवहारिक दर्शन है।

गांधीवाद से प्रभावित वही लोग हैं जिन्होंने गीता का ठीक से अध्ययन नहीं किया है। ये वही लोग हैं जो किसी भी दर्शन की दूर से उपासना तो करते हैं परंतु आत्मसात करने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं करते। यही कारण है कि दिखावे के लिए गाँधी के अनुयायी तो लाखों मिल जाएंगे, परंतु आधी धोती पहनकर भौतिक महत्वकांक्षाओं का त्याग करते इनमें से कोई नहीं दिखता है। वहीं एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने वाले केवल मुन्नाभाई ही मिले, वो भी फिल्मी पर्दे पर।

यदि किसी दर्शन को आत्मसात करने का प्रयास निष्ठापूर्वक किया जाए तभी उसके व्यवहारिक गुण दोष प्रकट होंगे। परंतु दुर्भाग्य से अधिकांश लोगों ने गांधीवाद की सिर्फ उपासना की है, जीवन में प्रतिष्ठित करने की चेष्टा नहीं की। तभी तो यह किसी के आचरण में परिलक्षित नहीं होकर केवल कुछ शातिर लोगों का अपनी कायरता एवं हृदय की कालिमा को ढाँकने का लबादा मात्र बनकर रह गया है। वहीं जिन गिनती के लोगों ने गांधीवाद को आत्मसात करने का साहस किया है, उन्हें इस दर्शन के व्यवहारिक दोष शीघ्र ही समझ में आ गए। उदाहरण के लिए सरदार पटेल, नेताजी, इत्यादि। जिन लोगों में स्वाध्याय का स्वभाव नहीं था वो गांधीवाद को निष्ठापूर्वक ढोते रहे हैं और परिणामस्वरूप कुंठित, असफल और भ्रमित जीवन जीकर निकल गए; परंतु स्वाध्याय की कमी के चलते कुंठा और असफलता का कारण अपने भीतर नहीं ढूंढ पाए। ज्ञात रहे कि स्वाध्याय के अभाव में व्यक्ति अपनी असफलताओं का दोष परिस्थितियों पर अथवा दूसरों पर मढ़ने की प्रवृत्ति अपना लेता है और वास्तविक कारण को नकार देता है। जबकि भगवद गीता के सिद्धांतानुसार व्यक्ति अपने स्वयं के कर्म फल ही भोगता है, किसी अन्य के नहीं।

राजनीतिक प्रपंच के चलते आज गांधी के विरोध को लोग गोडसे का समर्थन सिद्ध करने लगते हैं जिसकी वजह से एक ऐसे माहौल का निर्माण हुआ है कि लोग खुलकर गांधीवाद के दोषों पर चर्चा करने से बचते हैं। मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि गांधीवाद का विरोध यानि गोडसे का समर्थन कदापि नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण के गीता दर्शन का समर्थन है।

अहिंसा परमो धर्म:
धर्म हिंसा तथैव च

- प्रशांत सेठ

Tuesday, May 25, 2021

सफेदपोश

एक व्यंग लेख

हमारे प्रिय मित्र हैं Shirish Gontiya  "उजड्ड"। श्रेष्ठ व्यंगकार भी हैं और रंगमंच के कलाकार भी। अब आप पूछेंगे कि व्यंगकार हैं तो मित्र नहीं हो सकते, क्योंकि व्यंगकार तो किसी को भी नहीं बख्शता। परंतु शायद आप नहीं जानते कि एक व्यंगकार दूसरे व्यंगकार के प्रति हमेशा सहिष्णुता का परिचय देता है। इनका नाम स्वामी उजड्ड आनंद रखने का हमारे पास दो कारण हैं। पहला ये कि इन्होंने उजड्डता के मार्ग पर चलकर आनंद प्राप्त करने का संकल्प लिया है, जिसकी वजह से नगर के राजनीतिक हलकों में इन्हें प्रातः निंदनीय एवं सांध्य कुटनीय का सम्मान प्राप्त है। दूसरा ये कि इन्हें सुबह सुबह एक विशेष किस्म का प्रेशर बनता है। इस प्रेशर को ये मुझे एक छोटा सा  "मॉर्निंग प्रवचन" देकर रिलीज़ करते हैं। ये तो प्रेशर रिलीज़ करके निकल लेते हैं परंतु दिन भर के लिए उक्त प्रवचन में छुपे गूढ़ रहस्य को खोजने का प्रेशर मुझपर आन पड़ता है।

स्वामीजी की यह प्रवचन सिद्धि एक दिन अकस्मात एक अलौकिक घटना के पश्चात प्रकट हुई। हुआ यूं कि एक दिन ये अपनी बुलेट मोटरसायकिल समेत नगर के गटर में मेनहोल के रास्ते समा गए। इस घटना में उनके उस प्रदेश पर चोट लगी जहाँ अमूमन व्यंग्यकारों की अक्ल रहा करती है। इनकी छठी इंद्री जाग गई और गटर में इन्हें समाज की गंदगी का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे इनके भीतर की उजड्डता और प्रखर हो गई। तभी से ये मुझे अपनी कृपा स्वरूप सुबह सवेरे एक प्रवचन पेल कर चल देते हैं और शाम तक उसकी बखिया उधेड़ने का आदेश भी दे जाते हैं।

तो अभी दो दिन पूर्व के इनके प्रवचन और उसकी बखिया पेश है
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मोर्निंग प्रवचन

सच्चा ज्ञान हल्दी की गांठ की तरह होता है उसे आप दूध में डालकर अपनी इम्युनिटी तो बढ़ा सकते हैं पर चबा का हज़म नहीं कर सकते।

- उजड्ड वाणी
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प्रवचन बखिया

स्वामीजी कहते हैं कि ज्ञान वह होता है जो सत्य से परिचय करवाये, शेष सब अज्ञान है। परंतु सत्य कड़वा भी होता है और हल्दी की तरह गरिष्ठ भी। अतएव जिस प्रकार हल्दी को दूध के साथ लेने पर ही हजम करना संभव होता है, उसी प्रकार स्वामीजी के प्रवचन को हमारी बखिया के बिना लेने पर आपका हाजमा बिगड़ सकता है।

परंतु स्वामीजी को मॉर्निंग में उत्पन्न होने वाले प्रवचन रूपी प्रेशर का केवल इतना सरल अर्थ नहीं होता। यहाँ स्वामीजी इशारों में गूढ़ रहस्य की ओर इंगित करते हैं। आप सभी जानते हैं कि हल्दी पीली होती है और वाणिक समाज में पीले का अर्थ स्वर्ण धातु से होता है। अर्थात यहां धनार्जन की प्रक्रिया की ओर स्वामीजी इशारा करते हैं।

आप सभी जानते हैं और स्वामीजी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वर्तमान युग मे ईमानदारी की आय से आवश्यकता की पूर्ति भर हो सकती है, ऐश्वर्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपना धन टैक्स से बचाने के बाद सरकारी अफसर, क्षेत्रीय माफिया, पुलिस, मीडियाई माफिया, नेता, जज और वकीलों की कृपा से ही आप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकते हैं। इस सत्य को जानने वाले काला-पीला करने की कला जल्दी ही सीख लेते हैं। परंतु समस्या ये है कि काले के साथ पीला लेने पर एक दिन हाजमा बिगड़ ही जाता है और सारा पीला अन्य रास्ते से निकल कर वापस पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। उदाहरण के लिए देख लीजिए, विजय माल्या से लेकर हमारे मोहल्ले के कालिया तक सभी आज गालियां खा रहे हैं, मेरा मतलब है कि बदहजमी की गोलियां खा रहे हैं।

स्वामीजी इशारों में कहते हैं कि इसी पीले को अगर सफेद की साझेदारी मिल जाये तो सब हजम हो जाता है। यही कारण है कि सफल व्यक्ति हमेशा किसी सफेद खद्दरधारी के संरक्षण में रहता है। यह गठजोड़ आश्चर्यजनक रूप से और शीघ्र सफलता प्राप्त करने का अचूक नुस्खा है। तब आप अवैधानिक कार्य को भी वैधानिक पद्धति से कर सकते हैं। वहीं यदि आपका गठजोड़ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी नेता से है तो उक्त कार्य को संवैधानिक तरीके से भी किया जा सकता है। इस प्रकार आप पीले को आसानी से हजम कर सकते हैं और समाज भी आपको डाइजेस्ट कर लेता है। यदि भाग्य के सितारे अधिक प्रबल हुए तो आपको लोग देवता भी मानने लगते हैं।

इस बात को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। हमारे शहर के एक अस्पताल संचालक काले के साथ पीला कर रहे थे तो नकली इंजेक्शन के मामले में फंस गए। वहीं कुछ लोग असली इंजेक्शन और अस्पताल के बेड को ही ऊंचे दामों में बेचकर ऐश्वर्य भोग रहे हैं। यह हुई वैधानिक पद्धति।

यदि और गहराई में देखें तो यह इंजेक्शन उक्त बीमारी का इलाज करने में असफल मानकर WHO ने उसे अपनी उस लिस्ट से हटा दिया, जिसे WHO ने कुछ माह पूर्व स्वयं ही जारी किया था। लेकिन लिस्ट से हटाने के पहले ही, उच्च स्तरीय सफेद के गठजोड़ से बड़ी फार्मा कंपनियों ने अच्छा खासा पीला हजम कर लिया। इसको स्वामीजी संवैधानिक पद्धति बताते हैं। यह पद्धति दो देशों को लड़वाकर हथियार बेचने से लेकर, कौड़ियों के दाम में कीमती जमीन अलॉट करने, निजी भवनों को अपनी ही सरकार को ऊंचे किराए पर देने, मीडिया को सरकारी विज्ञापन देकर खरीदने, भय का माहौल बनाकर उत्पाद बेचने और गमलों में गोभी उगाकर करोड़ों रुपये कमाने तक में काम आती है। सरकारी सब्सिडी, वजीफे और अनुदानों को वर्ग विशेष के लोगों को भी संवैधानिक तरीके से बांटा जा सकता है और संवैधानिक रूप से ही नोट के साथ वोट भी कमाये जा सकते हैं। स्वामीजी यह भी बताते हैं कि सफेद की आड़ में पीला पचाने वाले लक्ष्मीपुत्रों को ही शास्त्रों में सफेदपोश कहा गया है।

- ठेठवाणी फ्रॉम प्रशांत सेठ

Wednesday, October 28, 2020

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

प्रकृति के गर्भ में अपने जन्म की प्रतीक्षा में एक चिरपंथी की प्रार्थना ...

हे आदिशक्ति! हे जगजननी!

चलता रहा युगों से पर अब
रहा समर्थ ना चल पाने को
किसी वृक्ष की घनी छाँव में
ठहर गया तब सुस्ताने को

थकी देह कुछ क्षण बैठी पर
मन का पथिक नहीं रुक पाया 
हे माँ! तेरे गर्भ में फिर से
यह चिर पंथी वापिस आया 

सौंप पिता की गोद में मुझको
जिस क्षण तू मुस्काई थी
अमर सनातन जीव को फिर से
देह नयी मिल पाई थी

यही अधूरापन ही मुझको 
फिर फिर दुनिया में लाया है
देह शेष, निःशेष कामना
जननी! ये कैसी माया है?

सोच रहा यह पथिक आज फिर,
बैठा बोध वृक्ष की छाँव
युगों युगों तक चलते चलते
थके नहीं इस मन के पाँव

गंतव्य क्या? अभी तो सच्चा
पथ ही नहीं दृष्टि में आया 
पितृ मिलन की व्याकुलता में
क्षीण हुई अब फिर से काया 

धारण किया गर्भ में प्रकृति
ने स्वरूप जो मानव तन का
सुप्त पड़ा क्यों मोह पाश में
अंश हूँ मैं ही जब चेतन का

कितने पथिक गए इस पथ से
विरला कोई समझ पाया है
मातृ कृपा बिन कब कब किसने
यहाँ शाश्वत जन्म पाया है

अपूर्णता को पूर्ण बना
अब अंश पुरुष का लौटा दे
परम पिता की गोद मुझे दे
प्रकृति तू फिर मुस्कुरा दे

मैंने चिरकाल से जागृत
शिव को प्रतीक्षित पाया है
हे आदिशक्ति! हे जगजननी, तू
जन्मदात्री महामाया है

© - प्रशांत सेठ



Tuesday, October 27, 2020

दृष्टा

मैंने पढ़ा था कभी,
प्रकाश की किरण 
करती है गमन सीधी रेखा में  
और बदल लेती है कोण
एक माध्यम से दूसरे माध्यम तक जाते जाते,
घनत्व में भेद के प्रभाव से

बहुत तो नहीं, 
किंतु समझ ली थी बचपन में ही
यह छोटी सी बात
कि
किसी वस्तु को जानने के लिए
देखना पड़ता है, 
उसे भिन्न कोणों से
समग्र दृष्टि से

आज भी
विषय वस्तु पर पड़ने वाले
अलग अलग दृष्टिकोण को
देख लेता हूँ मैं,
चैनल बदल बदल कर

मुझे पता है
मसले क्यों बदल लेते हैं कोण 
सोशल मीडिया पर
एक प्रोफाइल से दूसरी प्रोफाइल तक

मैं जानता हूँ
तुम्हारे ज्ञान का आधार है
तुम्हारी बुद्धि में "ग्रे मैटर" का घनत्व
जितना अधिक घनत्व
उतना ट्विस्टेड सत्य

तभी तो बहुत से बुद्धि-जीभी
ज़िंदगी जी नहीं पाते
चल देते हैं उम्र गुज़ारकर
अनुभव के नाम पर, 
दृष्टिकोण में उलझकर
और अक्सर, 
पीढ़ियों को उलझाकर
किसी नए "वाद" में

© - प्रशांत सेठ







Tuesday, October 6, 2020

सॉरी बापू

जमूरे!!
बुरा मत देखो
बुरा मत सुनो
बुरा मत बोलो

और मैंने मूंद ली आंखें
बंद कर लिए कान
सी लिया अपने होठों को
मेरे आस पास चुपचाप
वो पैर पसारती रही ...

जमूरे!!
जब तक मैं ना कहूँ
आँख मत खोलना
बाहर बहुत बुराई है
अपने भीतर उतर जा,
समाधि लगा ले, संत बन जायेगा

मगर एक दिन
आँख खुलनी थी, सो खुल गई
मैंने पूछा उससे
तू यहाँ कैसे, मेरे बापू के हिंदुस्तान में?
हंसकर बोली, अपने बापू ने कब कहा?
"बुरा मत करो"

अब मैं, बुरा देख लेता हूँ
बुरा सुन भी लेता हूँ
सच पूछो तो, बुरा सूंघ भी लेता हूँ
और बुरा बोलने लगा हूँ उसे
मेरे आसपास फटकने से पहले
दस बार सोचती होगी वो, क्योंकि
मैं बुरा लगने लगा हूँ अब
खुद बुराई को ही

क्षमा करना बापू
मैंने सीख लिया है,
चरखे के साथ साथ, लाठी चलाना
और हाँ!
चलाने लगा हूँ थोड़ा थोड़ा
स्कूल की किताबों से परे
अपना दिमाग भी

सॉरी बापू
तुम्हारा जमूरा शायद
सचमुच भीतर उतरने लगा है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, August 18, 2020

बृजबाला

सब कुछ नहीं होता शब्दों से
परिभाषित
शुद्ध प्रेम में नहीं होता संसार
अभिलाषित

संसार की व्यवहारिकता से परे
गोपियों के निश्छल प्रेम की तरह
भाव समक्ष मूक हो जाती हैं
समस्त भाषाएं

© - प्रशांत सेठ


Monday, August 17, 2020

शबरी

सब कुछ देखा नहीं जा सकता
इन आँखों से
सब कुछ सुना नहीं जा सकता
इन कानों से

बुद्धि की असहजता से बहुत दूर
शबरी के जूठे बेरों की तरह
भक्त और भगवान का सहज प्रेम
विषय है केवल अनुभूति का

© - प्रशांत सेठ




Sunday, August 9, 2020

मैं बैरी सुग्रीव पियारा?

 कई शताब्दियों के वनवास के पश्चात और तमाम आसुरी प्रवृत्तियों को परास्त कर अंततः प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए हैं। बाली का आहत हुआ अहंकार आज भी मन ही मन फिर वही प्रश्न कर रहा होगा। परंतु श्रीराम का उत्तर तो हर युग में वही होगा, क्योंकि सत्य तो कहा ही उसको जाता है, जो किसी भी देश काल परिस्थिति में अपरिवर्तनीय है।


मैं बैरी सुग्रीव प्यारा?

भेद ये मन का, खेल है सारा ।
जिसने सत्य को ना स्वीकारा ।
वरना निश्छल हृदय से मेरे,
बाली कभी नहीं था न्यारा ।

अपने भीतर मेरे अंश का,
तुमने तिरस्कार किया है ।
सब में भी अस्तित्व मेरा,
पर तुमने कब स्वीकार किया है ।

लघुता को अपने अंतस में,
जब भी अंगीकार किया है ।
अहंकार ने शत्रु रूप ही,
प्रभुता का स्वीकार किया है ।

मन की भ्रामक दृष्टि केवल,
निज स्वभाव का है विस्तार ।
त्याग सत्य को गढ़ा है तुमने,
कल्पनाओं का यह संसार ।

खुद से तुमने कब पूछा है,
क्यों दृष्टा का भाव नहीं है?
युग युग से क्यों निज दृष्टि में,
समग्रता का प्रभाव नहीं है?

चिंतन पर मकड़ी के जाले,
वहम रूप क्यों तुमने पाले ।
बोध वहां तक पहुंचे कैसे,
पड़े दृष्टि पर अहम के ताले ।

अनुभव रूप चित्त की वृत्ति,
ज्ञान रहित अनुभूति मन में ।
जन्म जन्म से संचित प्रारब्ध,
स्मृति शेष उस अवचेतन में ।

आत्म तत्व के रूप में मैं ही,
सदा सत्य का रहा हूँ प्रहरी ।
मन विकार का तभी तो बाली, 
युगों युगों से मैं हूँ बैरी ।

भाव समक्ष जब मन का बाली,
शस्त्र अहम के तज पाएगा ।
बोध स्वरूप तभी जीवन में,
सदा मित्र बन राम आएगा ।

तुम भी प्रिय ज्यों अनुज तुम्हारा,
तुमको मैं नहीं, "मैं" ने मारा ।
फिर ना कहना कभी भूल से,
मैं बैरी सुग्रीव पियारा ।

© - प्रशांत सेठ


Friday, July 31, 2020

काव्यमदूत - आह-कवि जालीदासों को समर्पित

"यमपुरी में नए यमदूतों की आवश्यकता
केवल कवियों को ही प्राथमिकता"

अखबार में ये विज्ञापन पढ़कर मैं चौंका
ये सत्य है या केवल आँखों का धोखा?
मैंने आंखों को मला, फिर से पढ़ा, यही सच था
आगे जो लिखा था वो और भी "टू मच" था

मृत्युलोक से यमलोक की 86000 योजन की दूरी है
और लंबी यात्रा में मनोरंजन भी जरूरी है
छोड़ो सारे किंतु, परंतु, अगर, मगर, पर
बेरोजगारी के दौर में नहीं मिलेगा ये अवसर
इसलिए आज ही ऑनलाइन अप्लाई कीजिये
योग्यता कोई नहीं, बस कवि होने का प्रमाण दीजिये

मैंने श्रीमती जी को आवाज़ लगाई
भाग्यवान, क्या मैं भी आएं बाएं अल्लम गल्लम बकता हूँ?
बताओ क्या मैं भी आधुनिक काल का कवि लगता हूँ?
उनकी सहमति पाकर मेरा कॉन्फिडेंस जागा
और मैं मनीष तिवारी जी के घर की ओर भागा
अपनी भड़ास का ये जो नित्य वमन करते हो
सुना है तुम भी ऑनलाइन कविता पढ़ते हो
एक से भले दो होते हैं, ये बात बुजुर्ग बताते हैं
चलो हम दोनों मिलकर ये दायित्व उठाते हैं

अगले ही दिन हम इंटरव्यू की लाइन में खड़े थे
देखा तो वहां बड़े बड़े दिग्गज पहले से पड़े थे

चित्रगुप्त बता रहे थे कि
कोरोना के कारण यमपुरी में फुल हैं समस्त सीटें
समझ में नहीं आ रहा अब पापियों का कहाँ पीटें
हम लोगों ने नरक की एजुकेशन पॉलिसी में चेंज किया है
और ये आईडिया हमने भारत के शिक्षा मंत्री से एक्सचेंज किया है
अब नरकगामियों की यात्रा को यंत्रणा बनाना है
इसलिए तुम कवियों को यमदूत की ड्यूटी निभाना है

हमने कहा हुजूर आप चिंता मत कीजिये
एक बार सेवा का यह अवसर तो दीजिये
यम-योग्य कवि लेखक तो हिंदुस्तान में सर्वत्र हैं
लेकिन हमारे पास कई संस्थाओं के सम्मान पत्र हैं
मंचों पर निकाली हमेशा भड़ास और खीज है
जिंदों को सताया है, ये मृतक क्या चीज है

हमारी कविताएं सुन सुनके आत्माएं घायल हैं
यहाँ सभी चित्रगुप्त के मैनेजमेंट के कायल हैं
एक्सपर्ट्स का कहना है, नए यमदूत बहुत होनहार हैं 
गुप्ताजी की हो रही जय जयकार है 
सारी यमपुरी में हमारी भूरी भूरी प्रशंसा है
हमारी नियुक्ति में यमराज की अनुशंसा है 

लोग कह रहे हैं
आपने साहित्यकारों को नहीं, सही-हत्याकारों को चुना है
बाकी सब तो थोथा चना बाजे घना हैं
इनके हत्थे जो भी चढ़ेगा, स्वर्ग का पात्र हो जाएगा
अपने पापों के लिए वो हज़ार बार पछतायेगा
इस जनम की छोड़िए, अगले जन्म की एडवांस सजा पायेगा
क्योंकि यहां तक आते आते वो कई बार मर जायेगा

© - प्रशांत सेठ


Sunday, June 21, 2020

मैं अज्ञानी अधजल गागर - गुरु प्रार्थना

मैं अज्ञानी अधजल गागर
गुरुवर तुम हो ज्ञान का सागर
धन्य जीवन है तुमको पाकर
श्री चरणों की शरण में आकर

ज्ञान दीप हृदय में जलाकर
दृष्टि दो अंधकार मिटाकर
तुम से आलोकित है ये जीवन
सूर्य से जैसे रहता सुधाकर

घट श्वासों का रीत रहा है
राह दुर्गम है थाम लो आकर
तृष्णा में संसार की डूबे
मेरे मन को उबारो प्रभाकर

ध्येय तुम हो और मार्ग भी तुम
तुम ही नैया हो तुम ही सागर
जो डूबा वो पार हुआ है
स्नेह सिंधु में डुबकी लगाकर

© - प्रशांत सेठ

Friday, June 19, 2020

हम बहुत याद आएंगे

शौर्य पथ पर बलिदानों की
गाथा हम लिख जाएंगे
तुम्हारे नयन अश्रु भी तब
श्रद्धा सुमन बन जाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

सर उठाकर जीने की भी
शर्त यही बतलाते थे
हमसे पहले जो गए वो
गीत यही तो गाते थे

यह पथ है स्वाभिमान का
यहां पर सर कट जाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

भारी उनकी संगीनों पे
फौलादी ये सीना था
तुम्हें अमृत पिलाने को
हमको विष तो पीना था

घाव वीरों की छाती के
पुष्प को भी लजाएंगे
हम बहुत याद आएंगे ...

नहीं सिर्फ सीमा के रक्षक
स्वप्नों के रखवाले हैं
जल गई दीपक की बाती
तभी तो ये उजाले हैं

ओस की बूंदें बनकर हम
सुबह सुबह जब आएंगे ...
हम बहुत याद आएंगे

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, May 13, 2020

कुकुरतंत्र

किसी पद विहीन नेता की तरह आवारा घूमते उस कुत्ते पर मुझे तरस आ गया। सभी जीवों में ब्रह्म की उपस्थिति की बात मुझे धार्मिक चिंतन की घुट्टी में जन्म से ही पिलाई गई थी। ये अलग बात है कि विषधरों के ब्रह्मतत्त्व को स्थूल दृष्टि से देख पाना बहुत कठिन जानकर, मैंने ब्रह्म को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाना ही हमेशा श्रेयस्कर समझा था। मगर उस आवारा कुत्ते की निरीह आँखों में से शायद उसके ब्रह्म ने ही मेरे भीतर के ब्रह्म को कॉल किया होगा। तभी तो सनातनी दया भाव ने जोर मारा।

मैंने श्रीमतीजी को आवाज़ लगाई और निवेदन किया कि मेरे और अपने हिस्से का एक एक वोट इसको दे देते हैं। माफ कीजिये वोट नहीं, रोटी कहना चाहता था मगर लॉक डाउन में सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने का परिणाम है कि बुद्धि में राजनीति के विषाणु प्रवेश कर गए हैं। श्रीमतीजी भी मेरी तरह से सनातनी परंपरा से हैं, मगर है तो पत्नी ही। इसलिए थोड़े बहुत औपचारिक ना-नुकुर के बाद मान गईं। हालांकि उन्होंने मुझे चेताया भी कि अब ये रोज़ आने लगेगा।

मैंने सुना है कि पत्नी की बात को ब्रह्माजी भी नहीं काट सकते, लिहाजा वही हुआ जो भविष्यवाणी उन्होंने कर दी थी। अब वह कुकुर कुलदीपक अपने हिस्से की मुफ्त की सब्सिडी लेने रोज आने लगा था। उसके लिए अब चार रोटी सुबह शाम मेरे गाढ़े पसीने की कमाई में से बनने लगी थीं। यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ के समस्त आवश्यक वस्तुओं को क्रय करते समय दिए गए GST के अलावा आयकर, गृहकर, जल कर, इत्यादि देने के पश्चात भी यदि आपके बटुए में कुछ बच पाता है, तो उसे ही शास्त्रों में गाढ़े पसीने की कमाई कहा गया है। यदि आपके बटुए के भाग्य में यह सुख नहीं है तो आपकी संतुष्टि के लिए ही भगवद गीता में यह श्लोक कहा गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकमज़्णि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)

अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर अधिकार पहले देश की सरकार का है, उसके पश्चात ईश्वर नाम की किसी बड़ी सरकार का।

कुछ ही सप्ताह में स्थिति यह थी कि सब्सिडी, क्षमा कीजियेगा, रोटी मिलने में विलंब उसे बर्दाश्त नहीं था। और अब उसने स्थायी डेरा मेरे घर के द्वार पर बना लिया था। उसको देख देख कर मेरे पालक होने के अहंकार को तृप्ति भी मिल रही थी।

यह सच है कि सृष्टि में स्वाभिमान नाम की कोई चीज़ भी सृष्टा ने रची थी। संभवतः उसी की वजह से कभी कभी कर्तव्यबोध भी जागता है। वरना इस देश में जीने के लिए अधिकार बोध का होना ही पर्याप्त है। कदाचित ऐसी ही कोई क्रांति उस कुकुर कुलदीपक के जीवन में घटी हो। कर्तव्यबोध के चलते उसने हर राह चलते व्यक्ति से अपनी प्रकृति जन्य वाणी और मातृभाषा में वार्तालाप शुरू कर दिया था। पड़ोसियों ने उक्त कृत्य को "भौंकने" का नाम दिया था।

शीघ्र ही पड़ोस के वकील साहब के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय डेलीगेशन आपत्ति लेकर मुझसे मिलने आया। मैंने उन्हें अवगत कराया कि मेरे घर की रक्षा के तहत भौंकने का अधिकार इसको संविधान देता है। उन्होंने मुझे इतिहास दर्शन के माध्यम से समझाया कि अक्सर संविधान की छोटी सी चूक से राष्ट्रों के भूगोल बिगड़ जाया करते हैं। इसलिए आप अपनी इस सैन्य शक्ति को लाइन ऑफ कंट्रोल के अंदर रख लीजिए, यही आपके लोकतंत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। प्रेम की अपेक्षा तर्कसंगत बात व्यक्ति को जल्दी समझ में आती है। लिहाजा सबकी राय से मैंने उसे अपनी घर की संसद में एक बोरी बिछाकर उचित स्थान दे दिया। अब वह हमारा निर्वाचित प्रतिनिधि बन चुका था और भौंकलाहट का लोकतांत्रिक अधिकार उसे प्राप्त हो गया था।

वकील साहब अनुभवी व्यक्ति थे। एक दिन उन्होंने कहा सेठजी, आप इसको समय समय पर बांध कर भी रखा कीजिये, क्योंकि यह मित्र और शत्रु के भेद को नहीं समझता है। यह आपके हर मित्र को और उसके प्रत्येक कृत्य को भी शक की दृष्टि से ही देखेगा। किसी दिन काट भी सकता है, यही इसका धर्म है। आपके यहाँ इसकी अराजकता के चलते फॉरेन इन्वेस्टर तो छोड़िए, आपके अपने मित्र भी आने से कतराने लगेंगे। और तो और कहीं इसके मित्र-मित्राणियों ने आना शुरू कर दिया तो जनसंख्या बढ़ते देर नहीं लगेगी। तब इतनी सी सब्सिडी से काम नहीं चलेगा। अतः आप कोई पार्ट टाइम काम भी बढ़ा लीजिए। वरना आपकी अर्थव्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगेगी और घर का सारा लोकतंत्र ढह जाएगा।

मैं वकील साहब की अनुभवी दृष्टि का कायल हो गया था। मैंने उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया कि जब आपने इतना किया है तो एक कृपा और कर दीजिये। अब आप ही इसका नामकरण भी कर दीजिए। उन्होंने कहा कि इस कुकुर कुलदीपक के स्वभाव को देखते हुए मैं ये जानता हूँ कि, अपने कुत्तत्व के अहम की संतुष्टि के लिए और कर्तव्यबोध के दबाव में, इसकी कार्यप्रणाली तो बदलने से रही। यह समय समय पर आपकी शांति भंग करके, अपने जीवित होने का प्रमाण देता रहेगा।  आपकी अर्थव्यवस्था और संवैधानिक निर्णयों में इसका योगदान केवल गति अवरोधक का होगा। हो सकता है कि जब आप किसी समस्या से जूझ रहे हों, उसी समय इसका कर्तव्यबोध प्रबल हो। देखने वालों को प्रतीत होगा कि यह पूरी निष्ठा के साथ आपके लोकतंत्र की रक्षा कर रहा है, परंतु इसे स्वयं यह ज्ञान भी नहीं होगा कि वह हित कर रहा है या अहित। इन सारे गुणों को देखते हुए इसका एक ही नाम मुझे उचित प्रतीत होता है "विपक्ष"।

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 11, 2020

माँ तुझे सलाम

सर पर उम्मीदों का सूरज
अधरों पर खिलती मुस्कान
देखो हाथ थामे कल का
तनकर चल रहा वर्तमान

अभावों की इस टोकरी में
शेष बहुत से सपने हैं
बांध लिए आँचल में उसने
भाव हृदय में जितने हैं

हंसती है लाली चेहरे की
राह की उड़ती धूल पे
रीझ गई है खुद ही डाली
अपने खिले फूल पे

दुनिया भर के अवरोधों से
राह ना उसकी रुक पाएगी
देखना इसके सपनों को
एक दिन मंज़िल मिल जाएगी

वो जननी है उसके आगे
आसमान भी झुक जाते हैं
एक दिवस उमड़ी श्रद्धा से
ऋण नहीं ये चुक पाते हैं

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, May 6, 2020

मद्य-प्रीति

डेढ़ माह का संयम आखिर
एक तलब में टूट गया
मदिरा के प्रिय आकर्षण में
राष्ट्र का वंदन छूट गया

अर्थशास्त्र ने पांसे फेके
धर्म द्यूत पे वार गए
अपनों के प्रति निष्ठारत थे
लेकिन संयम हार गए?

निष्फल हुई राम कथाएं
मर्यादा के पाठ भुलाए
मद्य की लहरों में हाये
गीता के सब श्लोक बहाए

रोक ना पाई ममता तुमको
ना रसोई की ही पुकार
ऐसे बंधन तोड़ के भागे
धन्य हो तुम हे पालनहार

पल भर का जो होश मिले तो
सोचो किस पथ चलते हो?
संस्कार अपने ही तजकर
भला किसे तुम छलते हो?

किए सदा अर्थ को अर्पित
तुमने जीवन मूल्य सभी
राजधर्म से चूके तुम भी
हे कौटिल्य के स्वप्न ऋषि

तुम्हें राष्ट्र का रथ सौंपा है
सारथी धर्म निभा पाओगे?
सिद्धांतों को ऐसे तज कर
विश्वगुरु की विभा पाओगे?

स्वप्न राष्ट्र गौरव के जिसके
सदा नेत्र में पलते हैं
सुनो सारथी, वर्तमान क्या
युग उसके पीछे चलते हैं

© - प्रशांत सेठ

Monday, April 27, 2020

बुद्धम शरणं गच्छामि। धम्मं शरणं गच्छामि। संघं शरणं गच्छामि।

बुद्धम शरणं गच्छामि - आध्यात्मिकता
धम्मं शरणं गच्छामि - धार्मिकता
संघं शरणं गच्छामि - साम्प्रदायिकता

लेख लंबा है परंतु आज के समय मे व्याप्त आध्यात्मिकता/धार्मिकता/साम्प्रदायिकता के भ्रम को चिह्नित करने का प्रयास है। इस लेख का संबंध लेखक के ज्ञानी अथवा आध्यात्मिक होने से ना जोड़ा जाए, क्योंकि यह अनेक विद्वजनों और मनीषियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर है।

1. आध्यात्मिकता - बुद्धम शरणं गच्छामि

अध्यात्म आपके भीतर का जगत है और आध्यात्मिकता इसी अंतर्जगत की यात्रा का नाम है। आध्यात्मिकता वही है जो बुद्ध को विलास के महलों की परिधि से दूर दुर्गम वन की ओर ले जाती है। इस ज्ञान यात्रा का लक्ष्य उस सत्य की खोज है जो खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता। कोई इसे आत्मतत्व के बोध की, तो कोई नश्वर-अनश्वर के भेद की तो कोई ईश्वरीय स्वरूप को जानने की यात्रा कहता है। अतः बंद आँखों से ध्यानावस्था में बैठकर ज्ञान की प्राप्ति और अपने स्वरूप का बोध आध्यात्मिक व्यक्ति का लक्ष्य होता है। अपनी पहचान से पलायन करने को आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं कहते। बल्कि अपनी छोटी सी पहचान को उस विराट में समाहित करने का नाम आध्यात्मिकता है। यदि सांसारिक पहचान मिट गई है तो द्वंद भी समाप्त हो गया होगा, और यदि जीवन में द्वंद शेष है तो अभी आध्यात्मिकता अपूर्ण है।आध्यात्मिक व्यक्ति का ना कोई मित्र होता है ना शत्रु। ज्ञान ही मित्र है और अज्ञान ही उसका शत्रु है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपूर्ण आध्यात्मिक व्यक्ति आँख खोलता है और सामने यथार्थ को खड़ा पाता है। ज्ञान को उपलब्ध होकर जो कुछ नश्वर या अज्ञान के रूप में जाना, वही सामने संसार बनके खड़ा है। यहाँ इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है वह आपकी अंतर्दृष्टि में है, बाहर जगत में नहीं। बाह्य जगत को आपके भीतरी परिवर्तन और ज्ञान से क्या सरोकार? मात्र अपने अज्ञान का नाश कर लेना, किसी अन्य पर कोई उपकार नहीं है। यह कर्म का जगत है और प्राप्त ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह कर्म के रूप में सबके लाभ का विषय बने। यहीं से धर्म की उत्पत्ति होती है।

2. धार्मिकता - धम्मं शरणं गच्छामि
इस संसार के प्रति आपके कर्तव्य का नाम ही धर्म है; जैसे कि एक पिता, पति अथवा पुत्र के रूप में पारिवारिक धर्म, या जीविकोपार्जन के लिए व्यावसायिक धर्म, समाज के प्रति सामाजिक धर्म, राष्ट्रीय धर्म या प्रकृति के प्रति प्राकृतिक (मानव) धर्म। वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति अपने समक्ष अनेक अज्ञानियों को भी पाता है तो घृणा नहीं, सहानुभूति रखता है। यदि वास्तव में थोड़ा बहुत भी बोध जागा होगा तो इस सत्य से भली भांति परिचित होगा कि अज्ञानियों में भी उसी का अंश है, जिस चेतना अथवा आत्मा का दर्शन उसने अपने भीतर किया है। और इस बात की भी स्वीकृति होगी कि बोध होने से पहले वह स्वयं भी अज्ञानी ही था। ऐसे में एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति, अत्यंत धैर्य के साथ सामाजिक चेतना के उत्थान हेतु कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। तब धर्म ही बुद्ध को सघन वन से लौटाकर समाज में वापस ले आता है; जो कुछ पाया है, उसको बांटने। अतः भीतर से वास्तविक आध्यात्मिक व्यक्ति आपको कार्मिक रूप से धार्मिक प्रतीत होता है।

कर्म के द्वारा जब सामाजिक चेतना को जागृत करने कोई तत्वज्ञानी प्रवृत्त होता है तो निश्चित रूप से उसका सामना अज्ञान के वशीभूत, लोभ, भय और मोह से ग्रस्त, अधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से होता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि कर्मयोगियों ने, सामाजिक धर्म के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने वाले अधर्मियों से, शास्त्र अथवा शस्त्र के बल पर धर्म युद्ध भी लड़े हैं। चीन अथवा अन्य उत्तरपूर्व देशों में बौद्ध संतों भिक्षुकों में प्रचलित मार्शल आर्ट क्या इस बात का प्रमाण नहीं है। महाभारत हो या कर्बला की जंग, ईसाइयों के क्रूसेड या गुरु गोविंद सिंह जी का खालसा, सभी संप्रदायों में धर्मयुद्ध के प्रमाण हैं। यह समाज और राष्ट्र के उत्थान के लक्ष्य लेकर चलने वाले धार्मिक व्यक्ति और निजी स्वार्थ में लिप्त अधार्मिक व्यक्ति के बीच निरंतर चलने वाला संघर्ष है।

3. सांप्रदायिकता - संघं शरणं गच्छामि
सम्प्रदाय अथवा पंथ (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, इत्यादि) का जन्म तब होता है जब अपनी विशेष उपासना पद्धतियों और मान्यताओं को लेकर कुछ लोग संगठित होते हैं। ईश्वर तक पहुंचने के या सत्य को जानने के अनेक मार्ग बताए गए हैं। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से किसी ना किसी सम्प्रदाय का होता ही है। उसको अपनी रुचि के मार्ग पर चलने का अधिकार भी है। यहाँ तक कि अनीश्वरवादी सम्प्रदाय का होने का भी अधिकार है। इसमें कोई बुराई नहीं है जब तक एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को कष्ट नहीं देता, या अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपने का प्रयास नहीं करता। जितने भी महात्माओं ने इस धरा पर जन्म लिया, और तत्कालीन संप्रदायों में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया, तो उनके अनुयायियों ने एक नया सम्प्रदाय बना लिया। यहाँ विशेष रूप से गौर करने वाली एक बात ये भी है कि किसी सम्प्रदाय अथवा धारणा का विरोध करते करते भी आप एक नए सम्प्रदाय को जन्म दे देते हैं। अतः स्वीकार करें या ना करें, प्रत्येक व्यक्ति साम्प्रदायिक भी होता है। इस सत्य से पलायन करके कोई समस्या नहीं सुलझने वाली। इसे स्वीकार करना ही समस्या के हल की दिशा में पहला कदम होगा।

अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ होने में कोई बुराई भी नहीं है। आपकी प्रतिबद्धता अपने सम्प्रदाय के प्रति होनी ही चाहिए। परंतु यदि आप अपने सम्प्रदाय के सच्चे हितैषी मित्र हैं, तो उसमें व्याप्त कुरीतियों और ऐसी मान्यताओं का विरोध करें जो दूसरों के कष्ट का कारण बनती हों और मानव धर्म के विरुद्ध हों। सार ये है कि आपके सांप्रदायिक होने में कोई बुराई नहीं है, परंतु आप अपने सम्प्रदाय से कृष्ण जैसी मित्रता रखिये, कर्ण जैसी नहीं; जिससे कि सम्प्रदाय के पतन और तदुपरांत विनाश को रोका जा सके।

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 22, 2020

प्रेम गली अति सांकरी ...

विराट समुद्र की गोद में
तैरती हुई एक छोटी सी मछली
ढूंढती है समुद्र का अस्तित्व
जैसे माँ की कोख में अंगड़ाई लेता जीवन
प्रश्न करता हो
माँ के ही अस्तित्व पर

और थककर एक दिन
छोटी सी मछली करती है घोषणा
"धर्म अफीम है"
और "ईश्वर एक अंधविश्वास"

उधर समुद्र सोच रहा है...
अपने अस्तित्व को सिद्ध करने
मुझे करना होगा खुद से अलग
इस प्यारी सी खूबसूरत मगर जिद्दी मछली को
लेकिन अपनी जीत से अधिक प्रिय है
मुझे इसका जीवन

और तब नकार कर खुद ही खुदको
समर्पण की कोख से
जन्म लेता है संसार में
विराट प्रेम
मगर अदृश्य और निराकार

© - प्रशांत सेठ