Friday, June 27, 2014

माँ झूठी है

इश्वर किसी माँ को ये दो चीज़ें एक साथ ना दे। या तो औलाद ना दे या गरीबी ले ले।

फूटपाथ पर एक भूख से बेहाल मासूम को बहलाते हुए जब उस माँ को देखा तो अन्दर तक हिल गया। एक ख्याल उभरा और फिर एक क़ता हो गया...

ना जाने पाप था उसके झूठ में, या पुण्य दिलासों में !
मासूम भूख को बहलाती, बेबस माँ की आहों में !!
सच से मचलते बचपन को, फिर एक झूठ ने सुला दिया !
मैं सोचता रहा और वो बढ़ गयी, लिये जिंदगी बाहों में !!

और इसी बात पर मासूम बचपन का जवाब देखिये...

झूठे दिलासों से जब वो बहलाती है
खाली बर्तन में चमचा हिलाती है
खाने के पहले माँ लोरी सुनाती है
तब मैं भी सो जाता हूँ,
वर्ना भूखे पेट किसे नींद आती है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, June 4, 2014

भगीरथ


समय की लहरें ले जायेंगी
अक्षर अक्षर जो है तट पर
निराशा को रेत पर लिखना
आशा लिखना पत्थर पर

जीवन है अभी शेष बहुत
चल पथिक साहस रथ पर
सुगमता ढूँढ़ रहा जग सारा
तू चल केवल दुर्गम पथ पर

ढूँढ़ कहीं वो निश्चित होगा
कोई भगीरथ तेरे अन्दर
उतर आयेगी धरती पर गंगा
संकल्प दृढ रख, स्वप्न सच कर

चुनौतियों से मत घबराना
प्रलोभनों से चलना बचकर
अवरोधों से निखर आयेगी
प्रतिभा जो सोती है छुपकर

क्षणिक सफलता बहकाये तो
कह देना तुम उससे हंसकर
संकल्प अभी कहाँ पूर्ण हुआ है
समर शेष है, उत्सव मत कर

सच पूछो तो यही लक्ष्य है
सतत चलना मिथ्या से हटकर
बोध होने को क्षण ही बहुत है
सत्य स्वयं आता है चलकर

© - प्रशांत सेठ

Monday, June 2, 2014

बस इतनी है जीवन की रीत

एक बहुत ही प्रिय मित्र को समर्पित यह कविता, उन सभी लोगों के लिए प्रेरक है, जो जीवन में नैराश्य भाव से ग्रसित होकर हार मान लेते हैं....

जीवन के हरित उपवन में
प्रकृति के विभिन्न रंगों के बीच
रिश्तों की प्यासी धरती को
प्रेम की पावन गंगा से सींच
गरजते मेघों से सुर लेकर
गा रे ह्रदय कोई शाश्वत गीत

श्वांसों की आती जाती पुरवाई
कहे ऋतुओं को बाहों में भींच
नैनों में नये स्वप्न उभरे हैं
मन गया है स्वयं पर रीझ
चीर धरती की छाती फिर
अंकुरित हुआ आशा का बीज

बांह पसारे नील गगन भी
राह तक रहा जैसे मनमीत
मन वीणा के तारों ने भी
छेड़ दिया मधुर मिलन संगीत
बढ़ चला एक नन्हा पौधा
आकाश पथ पर अकेला निर्भीक

वृक्ष बनकर खड़ा होगा कल
और याद करेगा अपना अतीत
यही संदेश देगा वो जग को
दही मथा तब मिला नवनीत
सुख में दुःख में हर मौसम में
निभाते रहना जीवन से प्रीत

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 26, 2014

अविस्मरणीय छुट्टियाँ

स्वार्थ, मतलब, कारण से तो अनगिनत रिश्ते बनते हैं मगर कुछ रिश्ते अकारण बनते हैं। इन रिश्तों में इसलिये जान होती है क्योंकि ये हर कारण से मुक्त और अनजान होते हैं। इसको ही मित्रता कहते हैं।

बहुत दिन बाद इतना हँसे और इतना जिये। अपनों के साथ दो दिन की छुट्टी में समझ लीजिये वक़्त को लूट लिया। जितना कुछ वो दे सकता था उससे अधिक ले लिया। अब सब अपने अपने शहर और अपने अपने काम पर लौट गये मगर सुखद स्मृतियाँ शेष हैं और सदैव ऊर्जा देती रहेंगी

दूरियाँ मजबूरियाँ दिल कुछ भी गाता रहे
याद के पंख लगाकर मन का पंछी आता रहे
कैद कर लो इन लम्हों को एहसास के पिंजरे में
ताउम्र ये परिंदा पंख ही फड़फड़ाता रहे

© - प्रशांत सेठ

Sunday, May 18, 2014

दो टूक

आम आदमी पार्टी को चार सांसदों की बधाई। कुछ अन्य दलों के समर्थक जो इसे बहुत कम बता कर व्यंग कस रहे हैं वो शायद इससे ज़्यादा की उम्मीद लगाये बैठे थे. इस उम्मीद के लिए उनको धन्यवाद दिया जाना चाहिए। देश की जनता ने केजरीवाल जी की ईमानदारी पर विश्वास तो किया है मगर साथ ही अपरिपक्व भी माना है. और ये सही भी है. मोदी जी ने इस चुनाव में अपनी परिपक्वता और प्रबंधन के सामने बड़े बड़े दिग्गजों को बौना साबित कर दिया।

आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों में कोई खामी ना होने के बावजूद उनको अपने ही संगठन में विरोध भी सहना पड़ा. कारण ये की संगठन में प्रमुख ज़िम्मेदारियाँ संभाले हुये कार्यकर्ता स्वयं के लिए उम्मीद लगाये बैठे थे. जो राजनीति को बदलने की बात अरविन्द केजरीवाल करते हैं उसका ज़रा भी अंश जिले और प्रदेश स्तर के अधिकांश कार्यकर्ताओं में नहीं दिखता। स्वार्थ की वजह से स्वयं से अधिक योग्य लोगों को स्वीकार करने की क्षमता ख़त्म हो जाती है. संगठन को खड़ा करने और समाज को जागरूक करने की बजाय आज भी यदि पहले प्राथमिकता चुनावी राजनीति को दी गयी तो यह परिणाम बार बार आएंगे। सत्ता केंद्रित राजनीति मुद्दों से भटकाव का कारण बनती है.

सचमुच व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए, संगठन की ज़िम्मेदारियों से सत्ता लोलुप और अपरिपक्व व्यक्तियों को हटाने का साहस करना पड़ेगा। साथ ही प्रत्येक प्रदेश में हिवरे बाजार जैसे ग्राम विकास कार्यक्रमों को करके दिखाना पड़ेगा। सिर्फ पोपट राव पवार (सरपंच हिवरे बाज़ार) की CD दिखाने से काम नहीं चलेगा। धैर्य और मेहनत का काम है मगर जल्दी क्या है? जल्दी वो करता है जो अपने लिये पेड़ लगा रहा हो. जो भविष्य का निर्माण कर रहा हो उसमे स्वार्थ और अधीरता नहीं होती।

उपरोक्त सुझाव विगत दो वर्षों से दिये जा रहा हूँ मगर भ्रम के रास्ते पर अक्सर चिंतन छूट जाता है. शोर भी बहुत पाल लिया है आस पास, इसलिए शायद सुन नहीं पा रहे है. कीचड को साफ़ करने के लिए कीचड में उतरना पड़ता है. ज़रूर उतरिये, मगर मन को कीचड मुक्त करने के और संगठन का कीचड साफ़ करने के बाद. आज भी पुन: सुझाव यही सोचकर दिया है की शायद अब चिंतन का दौर शुरू हो चुका होगा।

वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन की उम्मीद अन्य किसी राजनीतिक दल से नहीं रखी जा सकती। क्या "आप" से रखी सकती है?

उजालों के इंतज़ार में, बहुत अँधेरे देखे हैं,
सारी रात का जागा हूँ, अब सवेरे देखे हैं !
आज फिर उगा है सूरज, एक नई उम्मीदों का,
आज फिर आँखों ने मेरी, ख्वाब सुनहरे देखे हैं !!

© - प्रशांत सेठ

Friday, May 16, 2014

रुक जाना नहीं....

यह सफ़र ना हार पर ख़त्म होता है, ना ही जीत पर ख़त्म होता है। जीवन संघर्ष के दौरान मिलने वाले अनुभवों का नाम है। प्रयास करने के आनंद का नाम है "जीवन"। हार मिले तो पुन: प्रयास, जीत मिले तो और बड़े लक्ष्य के लिये प्रस्थान। जीवन सतत चलने का नाम है। हार से लेकर जीत तक के अनुभव जिसने संजोये नहीं, उसने जीवन को जाना ही नहीं।

जिंदगी हार नहीं, जिंदगी जीत नहीं,
जिंदगी मिलती है इसके बीच कहीं !!

- प्रशांत सेठ

Friday, May 9, 2014

जिंदगी आ रहा हूँ मैं...

पिछले कुछ दिनों से सफ़र में हूँ। कुछ सीखने और जिंदगी को समझने के लिये सफ़र में रहना ज़रूरी है। लोगों से मिलने मिलाने में जिंदगी निकल जाती है और जिंदगी बिना मिले ही निकल जाती है। इसलिये इस बार का सफ़र जिंदगी से मिलने के लिए। इस दौरान लिखी गयी कुछ पंक्तियाँ....

ज़िन्दगी एहसास का सफ़र, तुम मीलों चले,
और हमसे नहीं मिले, तो फिर क्या मिले !
हम समंदर के मानिंद हैं, मुद्दतों से प्यासे,
तुम दरिया की तरह कभी, लग जाओ गले !!
....

बेकरारियों को बरकरार रहने दो
कुछ अधूरा सा ये प्यार रहने दो
ख़त्म ना हो जाये कहीं मोहब्बत का सफर
वस्ल छोडो, मंजिलें दुश्वार रहने दो
....

ये ना पूछो क्यों, कैसे, कब किधर हैं,
बहता हुआ दरिया हम, इंतज़ार में समंदर है !
मुसाफिर का मज़हब कहो, या हालात की मजबूरी
ठहरे तो गुनाह है, चलना ही मुक़द्दर है !!

© - प्रशांत सेठ