Saturday, December 7, 2019

रुक जाना नहीं ...

राह बड़ी हो मुश्किल
हो दूर नज़र से मंजिल
ऊँची-नीची डगर से
यूँ ना तुम डरो
ओ दूर के मुसाफिर, तुम चलना शुरू करो

मिले ना कोई साथ
बढ़े ना कोई हाथ
तन्हाई पर रंज
ज़रा भी ना करो
चेहरे हों अनजाने, तुम मिलना शुरू करो

हवाओं में ज़हर हो
निगाहों में कहर हो
इस मौसम की ज़रा भी
ना परवाह तुम करो
ओ मासूम सी कली, तुम खिलना शुरू करो

ताक़तवर हो दुश्मन
कमज़ोर होता हो मन
लड़ने से पहले ही
यूँ हथियार ना धरो,
ओ कलयुग के अर्जुन, तुम लड़ना शुरू करो

हौसले कड़े हों
फलक से बड़े हों
मृत्यु से पहले ही,
क्योंकर तुम मरो,
ओ नीड़ परिंदे, तुम उड़ना शुरू करो

© - प्रशांत सेठ


Saturday, October 26, 2019

चॉक एंड डस्टर

तुमने देखा होगा
दुनिया लिखती है
तुम्हारे मन के ब्लैकबोर्ड पर
अपना अपना गणित

समय की सफेद चॉक
छोड़ जाती है बहुत से निशान
अनुभव के
और धीरे धीरे यही निशान
बन जाते हैं "जीवन दर्शन"

बस इतना करना
अगली कक्षा में जाने के पहले
मिटाते जाना हर एक निशान
प्रेम के डस्टर से

शून्य से शून्य तक
सृष्टि का विस्तार और सिमटना
निर्भर है तुम्हारी कला पर
क्या सौंप सकोगे वापस?
मन का ब्लैकबोर्ड
ज्यों का त्यों, कोरा ही

जीवन के स्कूल में
बुद्धत्व के पाठ से उपजा
एक प्रश्न

© - प्रशांत सेठ

Friday, October 25, 2019

गुरु भजन

गुरु की वाणी में कल कल
धार गंगा सी बहती है
चारों वेद अठारह पुराण की
बात यहीं तो रहती है

सतयुग में हरिश्चंद्र ने
गुरु को ही सर्वस्व दिया
त्रेता में रामचंद्र ने फिर
मर्यादा को प्रशस्त किया

द्वापर की तो बात कहें क्या
केशव की बलिहारी है
गुरु का ध्यान धरे हृदय में
स्वयं कृष्ण मुरारी है

कलिकाल का नर्तन देखो
धर्म कहाँ विलुप्त हुआ
लोभ विलास में पड़े मानव
ज्ञान भी ऐसा सुप्त हुआ

पापों का है वेग प्रचंड
बुद्धि इनसे हारी है
गुरु चरणों की सेवा ही
इस युग में तारणहारी है

किस दिशा में चलते हम हैं
लक्ष्य का हमको ज्ञान नहीं
सत्य को क्या जानें जबकि
स्व का हमको भान नहीं

परम सत्य के पथ पर उसकी
चलने की तैयारी है
गुरु शरण मे रहकर जिसने
दृष्टि भीतर उतारी है

अहं अपना कर समर्पित
गुरु चरणों को लीजे थाम
पथ का आनंद ना रोके तो
दूर नहीं है परम धाम

भक्ति भाव से श्रद्धा जिसने
गुरु पर अपनी वारी है
उसकी नैया भवसागर की
लहरों से कब हारी है?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 24, 2019

!!सावधान!!

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
तर्क करती है
अब नहीं बहलती किताबी ज्ञान से
समझने लगी है यथार्थ

मैं समझाता हूँ प्रेम
तो करती है प्रश्न अस्तित्व पर
प्रेम के लिए अनिवार्य है अस्तित्व

मैं समझाता हूँ
"अहिंसा परमो धर्म:"
कहती है
"धर्म हिंसा तथैव च:"

मैं समझाता हूँ "वसुधैव कुटुम्बकम"
वह कहने लगी है
"धर्मो रक्षति रक्षितः"

मैं जगाना चाहता हूँ
श्रद्धा और विश्वास
वो दिखाती है
इतिहास के आईने में
पीठ पर निशान "विश्वासघात" के

मैं सुनाता हूँ किस्से, देता हूँ दिलासा
पाप बढ़ने पर, ईश्वर के अवतार के
कहती है, अवतरित है सदा से
मेरे भीतर मेरा ईश्वर

मैं बहुत समझाता हूँ मगर
अब नहीं आती छलावे में
"धर्म निरपेक्ष" जैसे छद्म शब्दों के

सावधान!
अब यह मेरे बस की बात नहीं
तुम्हारी भी जिम्मेदारी हो चली है
मेरी "सहिष्णुता"
अब सयानी हो गई
जवाब देने लगी है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, October 22, 2019

गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल

घर के बाहर
गीला-सूखा कचरा समेटे
दो डस्टबिन, हरे और नीले
बैठे रहते हैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
मेरे घर की पवित्रता, ऋणी है तुम्हारी

लेकिन
हृदय की दहरी के भीतर
मेरे मन का गीला-सूखा कचरा
अब भी गंधाता है समाज को
इसे नहीं ले जाता कोई गाड़ीवाला

काश!
हमेशा खुला रहे
हमारी समझ का द्वार
हमारी दृष्टि जाए
अहं के दरवाजे से बाहर
हमारे मन का हो विस्तार
स्वार्थ की चौखट के उस पार भी
हमारे हृदय में समा जाए
क्षितिज के इस छोर से उस छोर तक
समूचा संसार

तब शायद
हम भी करने लगें प्रबंध
अपने नकार का

मैंने सुना है
कुछ लोग बना लेते हैं
मन के गीले-सूखे कचरे से खाद
फिर उगाते हैं फूल, जीवन की बगिया में
और महक जाता है उनका घर
भीतर भी, बाहर भी

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, September 11, 2019

शतरंज का खिलाड़ी

तुमने भी खेला होगा ये खेल
कभी काले
तो कभी सफेद मोहरों से
और चखा होगा स्वाद
हार का भी, जीत का भी

आमने सामने डटी दो सेनाएं
अपने अपने अहंकार की
मन के चौंसठ खानों की बिसात पर
काम क्रोध मद लोभ रूप
हाथी घोड़े ऊँटों से सुसज्जित
प्रतिद्वंदी से युद्ध को तत्पर

अधर्म के पासों से, जीत के प्रयास में
तुमने भी दाँव पर लगाई होगी
धर्म की द्रौपदी
तुम्हारी ज्ञान इंद्रियों ने भोगा होगा
जन्म, फिर पुनर्जन्म का लम्बा वनवास
मन की सौ इच्छाओं के चक्रव्यूह में
तुम्हारी समझ का अभिमन्यु
मरा होगा कई बार

एक बार फिर से खेल कर देखना
इस बार दोनों तरफ से ....
खुद ही खुद का प्रतिद्वंदी बनकर
चलना चालें, अपने ही विरुद्ध
फिर सोचना
कौन जीता और कौन हारा?

शायद तुम समझ सको
कुरुक्षेत्र के मैदान में बिछी
शतरंज की बिसात को
और पहचान पाओ उस खिलाड़ी को
जिसने कहा था
"मैं" ही मरता हूँ
"मैं" ही मारता हूँ

शायद अबकी बार
सारे द्वंद भूलकर
खेलना सीख जाओ तुम भी
संसार के कुरुक्षेत्र में
जीवन की शतरंज

© - प्रशांत सेठ


Sunday, September 8, 2019

हे सत्य के वाहक !!

मैं देखता रहा उम्र भर
तुम्हें जीते हुए
ठीक उसी समय जी रहा था
घुट घुट कर, कोई और
तुम्हारे मन के भीतर
तुम्हारा सत्य

अभिव्यक्ति
मर जाती है कई बार
व्यक्त हुए बिना ही
व्यक्ति के भीतर ...
जैसे गर्भ में ही मर जाया करती हैं
अजन्मी बेटियाँ

सत्य
मर जाता है अक्सर
जब खोखले शब्द उठा लेते हैं दायित्व
उसे जन्म देने का ...
अंधत्व और
"ओढ़े हुए अंधत्व" के संयोग से जैसे
उत्पन्न हो जाया करता है
दुर्योधन

अभिव्यक्ति
पा लेती है पूर्णता
जब अहंकारी सींखचों में कैद
प्रतिकूलताओं की बेड़ियों में जकड़ी
धर्म की देवकी करती है संकल्प
उसे जन्म देने का
और साहस का वसुदेव
निष्काम कर्म की टोकरी में रख
पहुँचा देता है उसे
जीवन के थपेड़ों से उस पार ...
प्रेम की यशोदा की गोद में
बाबा (आ)नंद के आँगन में
ज्ञान रूप गोकुल में
अनुभूति के वृंदावन में

© - प्रशांत सेठ