Sunday, April 27, 2014

बलिदान

44 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर मुकुंद वरदराजन आज शोपियां (कश्मीर) में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। आपकी शहादत को हज़ार बार नमन

भारत की तुम सच्ची संतान
हे वीर तुम्हें सहस्त्र प्रणाम
जिस माँ के लाल हो तुम
ऋणी है उसका हिंदुस्तान

देख रहा हूँ सजल नेत्र से
मन पटल पर अमर बलिदान
चिरनिद्रा में जाने के पहले
अंतिम तुम्हारा वह संग्राम

देह तुम्हारी टूट रही है
अधरों पर किन्तु है मुस्कान
और माटी से कहा तुमने
आज न्योछावर तुझ पर प्राण

हौले से पूछ रही धरती है
छोड़ चले तुम क्यों मैदान
युद्ध जी कर जीते जाते हैं
इस सत्य से क्या तुम हो अंजान

हंसकर तुमने कहा उससे है
मेरी किस्मत बड़ी बलवान
माँ की गोद में जन्म लिया है
गोद से ही करूँगा प्रयाण

फिर धरती ने चूमा तुमको
और बाहों में लिया है थाम
सेज बन गयी गोद उसकी
चादर बन गया आसमान

एक बूँद निकल आँखों से
कर गयी अंतिम प्रणाम
और तुमने मूँद ली आँखें
अब देह हो चली निष्प्राण

कर्त्तव्य की बलिवेदी पर
कर दिया जीवन बलिदान
उस राष्ट्र का क्या कोई अनिष्ट करेगा
जहाँ तुम जैसे हों वीर जवान

© - प्रशांत सेठ

Friday, April 25, 2014

दोस्ती

दोस्ती एक बेशकीमती एहसास है। जो पास है उसे खोना नहीं और कोई हाथ बढ़ाये तो छोड़ना नहीं।

मेरी दोस्ती के तलबगार, तुम हो ये मैंने माना
कहो तो खुलकर आज, अपने भी एहसास रख दूं !
तकदीर में बची हुई, वो हर सांस रख दूं,
आ तेरे हाथों में, जो कुछ है पास रख दूं !!

©-प्रशांत सेठ

कल के लिए ज़िंदा रहें

कल के लिए कुछ तो यहाँ ईमान ज़िंदा रहे,
दिल में रिश्ते और वफ़ा का नाम ज़िंदा रहे !
मोहब्बत, यकीन, रहम, इबादत रहे किरदार में,
हर शख्स में ज़रा ज़रा सा इंसान ज़िंदा रहे !!

गुम ना पाये तजुर्बों की भीड़ में बचपन,
मासूमियत हर चेहरे पर यूँ ताबिन्दा रहे !!

ज़िंदा रहे और ज़िंदगी मुस्कुराये लबों पर,
गम जो टकराये कभी तो वो भी शर्मिंदा रहे !!

उड़े, मगर लौट आये मन, शाम ढलने तक,
रात घर में, अपनी ख्वाहिश का परिंदा रहे !!

लाशों के ढेर पर सब छूने चले आसमान,
कोई तो इस शहर में ज़मीन का बाशिंदा रहे !!

© - प्रशांत सेठ

ताबिन्दा = चमकता, बाशिंदा = रहने वाला

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Wednesday, April 23, 2014

जो मन देखा अपना...

मन चंचल होता है। कभी लोभ में, कभी भावुकता में, या अन्य भावनाओं के वशीभूत होकर, अनेक ऐसे प्रलोभन देता है कि बुद्धि और विवेक दोनों समर्पण कर देते है। मन की इच्छा पूरी करने के लिये, अनेक बार हम सत्य को भी नकार कर निर्णय लेते हैं। कालांतर में यही निर्णय दुःख का कारण बनते हैं।

अधिकार करना है तो अपने मन पर किया जाए। जीतने की चीज़ तो अपना मन है। जिसने खुद पर नियंत्रण कर लिया उसने संसार पर कर लिया।

एक मुक्तक

जो औरों पर की, तो बिखर जाओगे,
हुकूमत खुद पर कर लो, निखर जाओगे !
दुनिया से भागे तो ठिकाने और भी हैं,
खुद से भाग कर मगर किधर जाओगे !!

© - प्रशान्त सेठ

Saturday, April 19, 2014

अंदर बाहर एक ही मौसम

मन में सामाजिक आंदोलन रहे और राजनीति को शस्त्र की तरह प्रयोग करें। ऐसे ही साथियों से दिल मिलता है। उनको बहुत दूर रखता हूँ जिनके मन में राजनीति है और आंदोलन को शस्त्र बनाना चाहते हैं। स्वयं को स्थापित करने का उद्देश्य छोड़िये और मूल्यों को स्थापित करने की बात सोचिये। छोटी सी बात है मगर फर्क बड़ा पड़ जाता है।

एक मुक्तक...

तेरे अंदर जिस दिन सारा खुदगर्ज़ मौसम बदलेगा,
झूठ फरेब नफरत ज़ुल्म, ये सारा आलम बदलेगा !
अंदर बाहर का तुम अपने, एक ही मौसम कर चलो,
खुद का मन बदलेगा तो गुलशन गुलशन बदलेगा !!

© - प्रशांत सेठ

Monday, April 14, 2014

सुबह तक तो जलना होगा

भोर की पहली किरण से, सूरज सबसे पहले उस दीप को प्रणाम करता है जो रात भर जला है। सुबह होती है और रोज़ होती है, कल फिर होगी। भोर की प्रतीक्षा सो कर करने वालों के जीवन में अंधकार रोज आता है, मगर जिसने जलना सीख लिया, वह अंधकार मुक्त हो गया। इस अन्यायपूर्ण भ्रष्ट व्यवस्था को ललकारने वाले हर सिपाही को समर्पित...

कुछ दूर तक तो चलना होगा
शौर्य को, त्याग को
सुबह तक तो जलना होगा
संघर्ष की आग को

आँधियों बरसातों में भी
खिलना होगा बाग को
गीत क्रांति का लिख चुका है
गढ़ना होगा राग को

हर तरफ जुल्म हो तब
उठना होगा समाज को
राष्ट्र के दामन पर है जो
मिटना होगा दाग को

दी जिसने है चुनौती
इस अंधियारी रात को
नतमस्तक है सूरज भी
छोटे से चिराग को

© - प्रशांत सेठ

Thursday, April 10, 2014

थप्पड़ों की राजनीति

हालाँकि हिंसा गलत है मगर केजरीवाल पहले ऐसे नेता हैं जो जनता की पहुँच के इतने अंदर हैं। और कुछ हो न हो आम लोगों का साहस तो जागा है। दुआ कीजिए की जनता इतनी समझदार और शिक्षित भी हो जाये कि अपने आक्रोश को शब्दों से और वोटों से व्यक्त करना सीख जाये।
बाकी छोड़ो इस थपड़ियाई की कुछ तो कीमत उस गरीब आदमी को मिली ही होगी। चलो किसी गरीब का भला यूँ ही सही।

अवाम-ए-हिंद इतनी औकात तक पहुँचे
नेताओं के गिरेबाँ तक हाथ तो पहुँचे
मेरे गालों पर तेरे हाथ के निशाँ सही
मुझ तक मेरे दोस्त, तेरे जज़बात तो पहुँचे

- प्रशांत सेठ