Friday, September 2, 2016

ज़िद्दी

आज बस यूँ ही खुद पर प्यार आ गया !!!

हाँ, कठिन है पलते रहना
जीवन का उसूलों में
किन्तु असंभव भी नहीं है
फूल सा खिलना शूलों में

साहस निश्चित है जरूरी
राह सत्य की चलने में
दृढ संकल्प चाहिये मन में
गिरकर फिर सँभलने में
एक सबक छुपा होता है
अक्सर अपनी भूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

पर्वत की चोटी पर हैं तो
कभी खड़े ढलानों पर
प्रशंसा में रहे इतराते
दुःखी हुये उलाहनों पर
है आनंद कितना लेकिन
समय के इन झूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

होते हैं कुछ लोग यकीनन
बैसाखी पर टिके हुये
सरल मार्ग को चुनने वाले
रोम रोम तक बिके हुये
अवसरवादी ही मिलेंगे
झुकते चरण धूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

बस यही एक सूत्र मिला है
खुद से सच्चे रहो सदा
लाख बड़े हो जाओ फिर भी
भीतर बच्चे रहो सदा
मौलिकता मत खो देना
भगत बने बगूलों में
हाँ, असंभव भी नहीं ....

सोने नहीं देता ये जो
आँखों में स्वप्न पड़ा है
थकने नहीं देता हमको
लक्ष्य जीवन का बड़ा है
रोक सकें ये साहस कहाँ
पथ के इन बबूलों में
हां, असंभव भी नहीं ....

© - प्रशांत सेठ


Sunday, August 7, 2016

विषधर भाई

आज नागपंचमी पर शुभकामनाओं सहित पंजाब और उत्तर प्रदेश के भावी चुनावों को समर्पित एक "Nag punch me" स्पेशल पंच।

विषधर भाई

साँप को दूध नहीं पिलाओगे??
बाहर से आवाज़ आई
दरवाज़ा खोला तो खड़े थे विषधर भाई
हमने डरते डरते सोचा, कोई ना कोई बात है ज़रूर
हाथ जोड़कर कहा,
आपने क्यों तकलीफ की, बुलवा लेते हुज़ूर

वो अन्दर आकर बैठे,
फुफकार के साथ फन पटका
किसी अनहोनी की आशंका से, हमने थूक गटका
वो बोले विद्वान होकर भी तुम कमाल करते हो
अजीब अजीब से बेतुके सवाल करते हो
भई आज नागपंचमी है, हम आज ही निकलते हैं
वरना साल भर तो तुम्हारी आस्तीन में पलते हैं

तुम बड़े जल्दी भूल जाते हो
इसलिए बार बार डसे जाते हो
आज व्रत की मजबूरी में दूध पी रहे हैं
वैसे तो तुम्हारा खून पीकर ही जी रहे हैं
खैर छोडो ये सब फिजूल की बातें हैं
तुम दूध पिलाओ फिर हम जाते हैं

हमने जैसे तैसे थोड़ी हिम्मत बटोरी
काँपते हाथ से उठाई खाली कटोरी
हमने कहा हुज़ूर आप अन्नदाता हैं
और हम मामूली से मतदाता हैं
पांच साल में एक बार वोट देते हैं
और आप साल में पांच बार चोट देते हैं

आपने पाल रखी है एक डायन महंगाई
वो चट कर गई हमारे घर की दूध मलाई
हमारे बच्चे ही अब दूध नहीं पी पाते हैं
आजकल हम साँपों को दूध नहीं पिलाते हैं
हमने सोच लिया है, अब नहीं चलेगी लुच्चाई
हम पियें छाँछ और तुम खाओ मलाई?

हमने विश्वास को पाला, श्रद्धा को गले में लटकाया है
मगर तुम साँप हो, बहुत देर से समझ में आया है
तुम ही हो जिसने नफरत का ज़हर फैलाया है
तुम ही तो हो जिसने मुल्क को बँटवाया है
आज आँख में आँख डालकर बोलने का वक़्त आया है
जिसका फन कुचलना था, हमने सर पर बिठाया है

दोस्तो, ये थे हमारे नेता विषधर भाई
चुनाव का मौसम है सो हमारी याद आयी
अपने शाकाहार की दे रहे थे दुहाई
हमारे वोट को समझ रहे थे मलाई
ये खेल बरसों बाद हम आज समझ पाये हैं
विषधरों की बीन पर अब तक हम ही नाचते आये हैं

© - प्रशांत सेठ

Friday, August 5, 2016

आत्म-हत्या

साहब! एक कागज़ कलम मिलेगा?
उस वृद्ध ने मुझे आवाज़ दी

फटे पुराने कपड़ों में जर्जर शरीर
फुटपाथ के हिंदुस्तान की तस्वीर
एक पल को लगा, ये भी कोई लेखक या कवि है
इसमें मेरी गलती नही है, कवियों की यही छवि है

मैंने कहा,
हे 1947 की जर्जर ईमारत
तुम्हें इस दशा में भी सूझ रही है शरारत
कागज़ कलम लेकर बोलो क्या करोगे?
कविता लिखोगे या व्यवस्था से लड़ोगे?

वो बोला,
मैं एक जीता जागता संताप हूँ
एक सौ चालीस करोड़ बच्चों का अभिशप्त बाप हूँ
मुझे मेरे बच्चों ने दी है बहुत चोट
और मैं लिखना चाहता हूँ सुसाइड नोट

मुझे ऐसा जीवन नहीं भाता
मैं घिसट घिसट कर जीना नहीं चाहता
या तो मेरी खोयी हुई पहचान लौटा दो
या फिर तुम ही मुझे शमशान पहुँचा दो

मैंने कहा,
तुम्हारे एक सौ चालीस करोड़ हैं, यहाँ दो नहीं पलते
तुम्हें शर्म नहीं आती बच्चों पर दोष मलते
जिसका दायित्व रहेगा एक सौ चालीस करोड़ पर
उसको तो आना ही था एक दिन रोड पर

हमारे देश में मनुष्य की कई श्रेणियाँ हैं
हमारी सोच पर जाति और धर्म की बेड़ियाँ हैं
मैंने पूछा,
बता किस गोत्र का है, क्या तेरा कुल है?
जातिगत जनगणना के लिए देश व्याकुल है

वो बोला,
बस इतनी ही मेरी खता रही है
गोत्र जाति कुल कुछ पता नहीं है
मैं तो मृत स्वप्न हूँ किसी समाज सेवी का
मैं पुत्र हूँ इंसाफ की अंधी देवी का

आज मैं दम तोड़ रहा हूँ सत्ता के गलियारों में
मैं चीख रहा हूँ हत्या में, बलात्कारों में
शोर में राष्ट्रविरोधी नारों की
मैं गुम हो रहा हूँ भीड़ में, गद्दारों की

खानदानी न्यायधीशों के हाथ का खिलौना हूँ
मैं भ्रष्टाचार का चेहरा घिनौना हूँ
मेरी क्षमता को रिश्वत दबा देती है प्यार से
मैं टॉपर की डिग्री हूँ साहब, बिहार से

मुझसे बेहतर सुरक्षा तो अपराधी पाते हैं
आतंकवादी जेल में बिरयानी खाते हैं
मेरे सेवक जो सत्ता की सेवा करते हैं
मैं भूखा मरता हूँ, और वो मेवा चरते हैं

मैं अदालत में सत्य की टूटी हुई टाँग हूँ
मैं किसी गरीब के हक़ की अनसुनी माँग हूँ
द्वेष की निरंतर बढ़ती हुई आग हूँ
मैं ही राजनीति का कुत्सित दिमाग हूँ

मैं न्याय का हो चुका खात्मा हूँ
मैं ही काले हिरण की आत्मा हूँ
मैं ग़ज़नी का बयान हूँ, सहिष्णुता के सवाल पर
मैं दबंग का थप्पड़ हूँ, व्यवस्था के गाल पर

यूँ तो वाहक हूँ तुम्हारे संविधान का
तथाकथित रक्षक हूँ, मनुष्य के सम्मान का
मुझे पहुँचा दिया है हालत में दरवेश की
साहब, मैं क़ानून व्यवस्था हूँ तुम्हारे देश की

इस देश में मेरा कोई सहारा नहीं है
अब ख़ुदकुशी के सिवा कोई चारा नहीं है
ये कहकर उसने लगा ली खुद को आग
मैं अलापता रह गया, न्यायतंत्र का राग

यूँ कहने को तो, अपनी भी छप्पन इंच छाती है
लेकिन ये बात कभी कभी कचोट जाती है
आप और मैं,
रोज़ व्यवस्था को जलता हुआ देख रहे हैं
दुःख इस बात का है, हम भी हाथ सेक रहे हैं

© - प्रशांत सेठ



Friday, July 29, 2016

काव्य-कथा

कविता यदि आपका पेशा नहीं है तो कविता करने के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं। आज के व्यस्त समय में कविता के लिए वक़्त निकालने की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन इसी जूनून में मन का सुकून भी है।
कवि की कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं होती मगर वास्तविक जीवन की अपनी मर्यादा होती है; क्योंकि दुनिया दिल से नहीं दिमाग से चलती है। कविता हर बंधन से मुक्त होती है और कवि अनेक बंधनों में जकड़ा हुआ व्यक्तित्व। इसलिये अधिकांश कवियों में उनकी कविता की झलक नहीं मिलती। वो विरले ही होते हैं जो कविता को जीते हैं या जो जीते हैं वही लिखते हैं।
कल्पना और व्यवहारिकता के बीच इस द्वंद के चित्रण की एक कोशिश...

काव्य-कथा

आवश्यकता लिख लिख नोक
कलम की टूट गई
जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

कितने कितने बोझ लिये मन
चला जगत के दुर्गम पथ पर
कविता लेकिन विचरण करती
कल्पनाओं के स्वर्णिम रथ पर
दो लोकों के फेर में पड़कर
दुनिया रूठ गई

भावों का पंछी उड़कर नित
शब्द नए ले आता है
स्वर सुबास से गीत महक कर
जन मानस को भाता है
लेकिन सच्चाई गीतों की 
सरगम लूट गई

सामर्थ्यों की चादर से नित
इच्छाओं का होता रण 
बहुत कठिन है पा जाना तब
इक बहुमूल्य सृजन का क्षण 
सब मोती संवेदनाओं के
नियति कूट गई

मन बहलाने को कब तक
कविता कोई लिख सकता है
वर्तमान से आँख मूंद, कैसे
भविष्य दिख सकता है
भावों की मटकी यथार्थ के 
घट में फूट गई

जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

© - प्रशांत सेठ

Monday, July 11, 2016

अखबारी दुःख फेसबुकीय चिंता

दुःख दो प्रकार के होते हैं, व्यक्तिगत और सामाजिक/राष्ट्रिय। व्यक्तिगत दुःख वे होते हैं जो किसी अखबार में नहीं छपते। सामान्य तौर पे कोई भी व्यक्ति इनके प्रदर्शन से बचता है। ये वो दुःख होते हैं जिनसे समाज अथवा राष्ट्र को कोई लेना देना नहीं होता। ये वही दुःख होते हैं जिन्हें गीता में कर्मों का फल कहा गया है। जैसे गरीब की जमीन पर दबंग का कब्ज़ा, बिना इलाज के गरीब का मर जाना, पिट पिट कर मज़दूर की मौत, इत्यादि। चूंकि देश, समाज और अन्य लोगों की दृष्टि में इन दुखों का अस्तित्व ही नहीं होता, इसलिये इन दुखों की कोई उम्र भी नहीं होती। जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसकी उम्र कैसी? ये दुःख भले ही किसी के लिए सदियों के बराबर हों परंतु वर्तमान व्यावसायिक भौतिक युग में अन्य लोगों का इससे कोई सरोकार नहीं होता। अतः इन पर चर्चा करना फिजूल है।

इसके विपरीत सामाजिक/राष्ट्रीय दुःख वे होते हैं जो अख़बार में छपते हैं, जैसे JNU के कन्हैया का भाषण, ढाका में आतंकवादी हमला, केजरीवाल जी के बयान, सलमान की फ़िल्म, कश्मीर समस्या, मोदी जी की विदेश यात्रा, इत्यादि। इनसे आपका सरोकार होना नितांत आवश्यक होता है अन्यथा अपने आस पास एवं सोशल मीडिया में आप पिछड़े, अपढ़ और गैर जागरूक माने जाते हैं। इन दुखों पर विचलित होने जैसी पोस्ट आपके संवेदनशील होने की निशानी मानी जाती है। ये दुःख नित नये होना चाहिए क्योंकि सुबह का अखबारीय दुःख अधिक से अधिक शाम तक आपके ज़हन में ज़िंदा रहता है। दफ्तर और चौराहों पर चर्चा करने और फेसबुक पर एक पोस्ट डालने के उपरान्त यह दुःख स्वतः मर जाता है। इस बात को समझते हुए मीडिया भी रोज़ नए दुःख परोसने के कार्य में ईमानदारी से संलग्न रहती है।

देश और समाज के प्रति आपकी फेसबुकीय चिंता आपके जागरूक होने की निशानी है। इस मीडियाई दुःख पर फेसबुकीय चिंता से आपको ये आत्म बोध भी होता है कि समाज बदल रहा है और इसको बदलने में आपका बहुत बड़ा हाथ है। और यदि आप उक्त दुःख पर कविता अथवा व्यंग लिख कर पोस्ट करते हैं तो आपका डिजिटल सम्मान कई गुना प्रगति कर जाता है। किन्तु यह परम आवश्यक है की शाम की चाय के साथ सम्बंधित दुःख को भी घोल कर पी जायें, क्योंकि बासी दुःख का प्रदर्शन सोशल मीडिया में उसी प्रकार अर्थहीन और उपेक्षित हो जाता है जैसे आपके घर में कोई बुजुर्ग।

एक ही दुःख से चिपके रहना बोरिंग हो जाता है और फिर लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते। अतः कोई दुःख मरने से इनकार कर दे तो भी रात होने से पहले उसका गला घोंट दें। कहीं कोई सामाजिक/राष्ट्रिय दुःख आपके साथ एक रात के लिए सो गया तो सुबह तक आपके सामाजिक कार्यकर्ता बन जाने का खतरा है।

© - प्रशांत सेठ

Friday, July 8, 2016

एक था कुत्ता

इंसानो की बस्ती में, आज हम भी झाँक लिये
सूट बूट और टाई में सब, अपना कुत्तत्व ढाँक लिये
चाँद तक यूँ पहुँच गई है, हवस विकास के पुत्रों की
प्रयाग कोई जा पहुंचे ज्यूँ, इंसानियत की राख लिये

कभी स्कूल में पढ़ा था कि मनुष्य भी एक जानवर ही है और उसका बायोलॉजिकल नाम है "होमो सेपियन्स"।
चेन्नई में तीसरी मंज़िल की छत से जब उसने एक कुत्ते को फेका तो स्कूल में पढाई गई बात पर पहली बार मुझे विश्वास हुआ। आदमी और कुत्ते में ज़्यादा कुछ फर्क नहीं है, बस इतना है की आदमी स्कूल में पढ़ लिख गया है और कुत्ता....

एक था कुत्ता

कैं कैं की आवाज़ सुनकर
तीसरी मंज़िल से गिरते हुये
उस कुत्ते को हमने रोका
और रोक कर टोका

इतना क्यों चिल्ला रहे हो मित्र
ऐसी क्या बात हो गई विचित्र
तुमको इस कृत्य में क्यों दिखता अत्याचार है?
क्या आदमियत से तुम्हारा पहला साक्षात्कार है?

तुम्हारी चीखों में सहानुभूति की आशा है
हमारे लिये तो ये रोज़ का तमाशा है
अगर तुम्हें सच में न्याय की अभिलाषा है
मिमियाना छोडो, काटना सीखो, वही उचित भाषा है

लात खाते हो फिर भी दुम हिलाते हो
तभी तो इस तरह से फेके जाते हो
हम दोपाये इसलिये तुमसे अधिक श्रेष्ठ हैं
संवेदनाहीन हैं, पशुता में भी ज्येष्ठ हैं

गिरते गिरते भी वो रुक गया
मेरी आदमियत के आगे झुक गया
उस गिरते हुये कुत्ते में एक कमाल था
उसकी कातर आँखों में एक सवाल था

आज उसने गिरते हुये इंसान
और इंसानियत के उसूल देखे
उसके अंतिम अनुभव ने
आदमियत के मुखौटे उतार फेके

वो बोला,
मैंने सुना था ये हिंदुस्तान है
यहाँ पशुओं का बड़ा सम्मान है
विधाता ने जब पूछा, मैंने यही कहा था
मुझे अपने भारतीय कुत्तत्व पर अभिमान है

हे मनुज श्रेष्ठ, मैं तुम्हारा वंदन करता हूँ
और मीडिया की इस बात का खंडन करता हूँ
की इस देश में
पशु का जीवन आसान नहीं है
कौन कहता है,
यहाँ पशुओं के संरक्षण का इंतज़ाम नहीं है?

अगर तुम्हारी परम्पराओं को समझ पाते
तो आज हम चौपाये भी पनप जाते
हम पशु होकर भी पशुता से वंचित हैं
सारी पशुता तो मनुष्यों में संचित है

इस देश में,
पशुओं का चारा मंत्री जी निगलते हैं
तिहाड़ के सिक्के चुनावों में चलते हैं
नशे में धुत्त रईसजादे, फुटपाथियों को कुचलते हैं
और गरीब के जनाजे रोज़ निकलते हैं

ओवरटेक करने पर गोली मिलती है
आतंक के साये में जनता पलती है
फिर इंसाफ की अंधी देवी, जब हाथ मलती है
तब शरीफ को अपनी शराफत बहुत खलती है

अपनी हवस को तुमने गिद्ध कर लिया है
मनुष्य ने पशुता को सिद्ध कर लिया है
जो बहा लेता है खून धर्म की बात पर
वही राज करता है आदम की ज़ात पर

पशुओं के समान रोज़ कृत्य करते हैं
सत्ता के वो पुत्र खुले विचरते हैं
उनकी सुरक्षा का यहाँ पुख्ता इंतज़ाम है
मनुष्य रूप में जो भी पशुओं के समान हैं

जिसमें पशुता का लेशमात्र भी अंश नहीं है
इस धरती पर आज उसका वंश नहीं है
इसलिये
अपने जीवन की डोर मैं तोड़ जाता हूँ
ये संसार तुम्हारे लिये ही छोड़ जाता हूँ

मेरा उठा हुआ सर झुक गया है
वो कुत्ता गिरकर भी उठ गया है
अब आईना भी मुझसे चौंक रहा है
मेरे भीतर का कुत्तत्व, मुझ पर ही भौंक रहा है

मुझे दुःख नहीं है उसके मरने का
दुःख है तो आदमियत के गिरने का
आँख मिलाकर खुदसे, आईना तो देख पाते
काश हम कुत्ता नहीं, कुत्तत्व को फेक पाते

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, July 6, 2016

जूनून

मेरी अपनी मंज़िल, अपना ही रस्ता है
मैं जब ये कहता हूँ, ज़माना हँसता है

वो कहते हैं जुनूँ में, जाँ निकल जाती है
मैं हंसकर ये कहता हूँ, सौदा सस्ता है

क्यों ठहरें समंदर से, होगा क्या हासिल
ये जुनूँ है कि दिल में, दरिया सा बसता है

इक बूँद गालों पर, आकर ये कहती है
दिल का एहसास ये, आँखों से रिसता है

इक सफ़र है ज़िन्दगी, मुश्किलें आनी जानी
कब एक ही मंज़र से, ये भी वाबस्ता है

ज़िद छोडो, घर से निकलो, नज़ारे और भी हैं
ठहरे तो दीवारें, चल दिये तो रस्ता है

© - प्रशांत सेठ