Friday, August 5, 2016

आत्म-हत्या

साहब! एक कागज़ कलम मिलेगा?
उस वृद्ध ने मुझे आवाज़ दी

फटे पुराने कपड़ों में जर्जर शरीर
फुटपाथ के हिंदुस्तान की तस्वीर
एक पल को लगा, ये भी कोई लेखक या कवि है
इसमें मेरी गलती नही है, कवियों की यही छवि है

मैंने कहा,
हे 1947 की जर्जर ईमारत
तुम्हें इस दशा में भी सूझ रही है शरारत
कागज़ कलम लेकर बोलो क्या करोगे?
कविता लिखोगे या व्यवस्था से लड़ोगे?

वो बोला,
मैं एक जीता जागता संताप हूँ
एक सौ चालीस करोड़ बच्चों का अभिशप्त बाप हूँ
मुझे मेरे बच्चों ने दी है बहुत चोट
और मैं लिखना चाहता हूँ सुसाइड नोट

मुझे ऐसा जीवन नहीं भाता
मैं घिसट घिसट कर जीना नहीं चाहता
या तो मेरी खोयी हुई पहचान लौटा दो
या फिर तुम ही मुझे शमशान पहुँचा दो

मैंने कहा,
तुम्हारे एक सौ चालीस करोड़ हैं, यहाँ दो नहीं पलते
तुम्हें शर्म नहीं आती बच्चों पर दोष मलते
जिसका दायित्व रहेगा एक सौ चालीस करोड़ पर
उसको तो आना ही था एक दिन रोड पर

हमारे देश में मनुष्य की कई श्रेणियाँ हैं
हमारी सोच पर जाति और धर्म की बेड़ियाँ हैं
मैंने पूछा,
बता किस गोत्र का है, क्या तेरा कुल है?
जातिगत जनगणना के लिए देश व्याकुल है

वो बोला,
बस इतनी ही मेरी खता रही है
गोत्र जाति कुल कुछ पता नहीं है
मैं तो मृत स्वप्न हूँ किसी समाज सेवी का
मैं पुत्र हूँ इंसाफ की अंधी देवी का

आज मैं दम तोड़ रहा हूँ सत्ता के गलियारों में
मैं चीख रहा हूँ हत्या में, बलात्कारों में
शोर में राष्ट्रविरोधी नारों की
मैं गुम हो रहा हूँ भीड़ में, गद्दारों की

खानदानी न्यायधीशों के हाथ का खिलौना हूँ
मैं भ्रष्टाचार का चेहरा घिनौना हूँ
मेरी क्षमता को रिश्वत दबा देती है प्यार से
मैं टॉपर की डिग्री हूँ साहब, बिहार से

मुझसे बेहतर सुरक्षा तो अपराधी पाते हैं
आतंकवादी जेल में बिरयानी खाते हैं
मेरे सेवक जो सत्ता की सेवा करते हैं
मैं भूखा मरता हूँ, और वो मेवा चरते हैं

मैं अदालत में सत्य की टूटी हुई टाँग हूँ
मैं किसी गरीब के हक़ की अनसुनी माँग हूँ
द्वेष की निरंतर बढ़ती हुई आग हूँ
मैं ही राजनीति का कुत्सित दिमाग हूँ

मैं न्याय का हो चुका खात्मा हूँ
मैं ही काले हिरण की आत्मा हूँ
मैं ग़ज़नी का बयान हूँ, सहिष्णुता के सवाल पर
मैं दबंग का थप्पड़ हूँ, व्यवस्था के गाल पर

यूँ तो वाहक हूँ तुम्हारे संविधान का
तथाकथित रक्षक हूँ, मनुष्य के सम्मान का
मुझे पहुँचा दिया है हालत में दरवेश की
साहब, मैं क़ानून व्यवस्था हूँ तुम्हारे देश की

इस देश में मेरा कोई सहारा नहीं है
अब ख़ुदकुशी के सिवा कोई चारा नहीं है
ये कहकर उसने लगा ली खुद को आग
मैं अलापता रह गया, न्यायतंत्र का राग

यूँ कहने को तो, अपनी भी छप्पन इंच छाती है
लेकिन ये बात कभी कभी कचोट जाती है
आप और मैं,
रोज़ व्यवस्था को जलता हुआ देख रहे हैं
दुःख इस बात का है, हम भी हाथ सेक रहे हैं

© - प्रशांत सेठ



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