Friday, July 29, 2016

काव्य-कथा

कविता यदि आपका पेशा नहीं है तो कविता करने के लिए बहुत से समझौते करने पड़ते हैं। आज के व्यस्त समय में कविता के लिए वक़्त निकालने की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन इसी जूनून में मन का सुकून भी है।
कवि की कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं होती मगर वास्तविक जीवन की अपनी मर्यादा होती है; क्योंकि दुनिया दिल से नहीं दिमाग से चलती है। कविता हर बंधन से मुक्त होती है और कवि अनेक बंधनों में जकड़ा हुआ व्यक्तित्व। इसलिये अधिकांश कवियों में उनकी कविता की झलक नहीं मिलती। वो विरले ही होते हैं जो कविता को जीते हैं या जो जीते हैं वही लिखते हैं।
कल्पना और व्यवहारिकता के बीच इस द्वंद के चित्रण की एक कोशिश...

काव्य-कथा

आवश्यकता लिख लिख नोक
कलम की टूट गई
जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

कितने कितने बोझ लिये मन
चला जगत के दुर्गम पथ पर
कविता लेकिन विचरण करती
कल्पनाओं के स्वर्णिम रथ पर
दो लोकों के फेर में पड़कर
दुनिया रूठ गई

भावों का पंछी उड़कर नित
शब्द नए ले आता है
स्वर सुबास से गीत महक कर
जन मानस को भाता है
लेकिन सच्चाई गीतों की 
सरगम लूट गई

सामर्थ्यों की चादर से नित
इच्छाओं का होता रण 
बहुत कठिन है पा जाना तब
इक बहुमूल्य सृजन का क्षण 
सब मोती संवेदनाओं के
नियति कूट गई

मन बहलाने को कब तक
कविता कोई लिख सकता है
वर्तमान से आँख मूंद, कैसे
भविष्य दिख सकता है
भावों की मटकी यथार्थ के 
घट में फूट गई

जीवन की आपा धापी में
कविता छूट गई

© - प्रशांत सेठ

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