Friday, July 8, 2016

एक था कुत्ता

इंसानो की बस्ती में, आज हम भी झाँक लिये
सूट बूट और टाई में सब, अपना कुत्तत्व ढाँक लिये
चाँद तक यूँ पहुँच गई है, हवस विकास के पुत्रों की
प्रयाग कोई जा पहुंचे ज्यूँ, इंसानियत की राख लिये

कभी स्कूल में पढ़ा था कि मनुष्य भी एक जानवर ही है और उसका बायोलॉजिकल नाम है "होमो सेपियन्स"।
चेन्नई में तीसरी मंज़िल की छत से जब उसने एक कुत्ते को फेका तो स्कूल में पढाई गई बात पर पहली बार मुझे विश्वास हुआ। आदमी और कुत्ते में ज़्यादा कुछ फर्क नहीं है, बस इतना है की आदमी स्कूल में पढ़ लिख गया है और कुत्ता....

एक था कुत्ता

कैं कैं की आवाज़ सुनकर
तीसरी मंज़िल से गिरते हुये
उस कुत्ते को हमने रोका
और रोक कर टोका

इतना क्यों चिल्ला रहे हो मित्र
ऐसी क्या बात हो गई विचित्र
तुमको इस कृत्य में क्यों दिखता अत्याचार है?
क्या आदमियत से तुम्हारा पहला साक्षात्कार है?

तुम्हारी चीखों में सहानुभूति की आशा है
हमारे लिये तो ये रोज़ का तमाशा है
अगर तुम्हें सच में न्याय की अभिलाषा है
मिमियाना छोडो, काटना सीखो, वही उचित भाषा है

लात खाते हो फिर भी दुम हिलाते हो
तभी तो इस तरह से फेके जाते हो
हम दोपाये इसलिये तुमसे अधिक श्रेष्ठ हैं
संवेदनाहीन हैं, पशुता में भी ज्येष्ठ हैं

गिरते गिरते भी वो रुक गया
मेरी आदमियत के आगे झुक गया
उस गिरते हुये कुत्ते में एक कमाल था
उसकी कातर आँखों में एक सवाल था

आज उसने गिरते हुये इंसान
और इंसानियत के उसूल देखे
उसके अंतिम अनुभव ने
आदमियत के मुखौटे उतार फेके

वो बोला,
मैंने सुना था ये हिंदुस्तान है
यहाँ पशुओं का बड़ा सम्मान है
विधाता ने जब पूछा, मैंने यही कहा था
मुझे अपने भारतीय कुत्तत्व पर अभिमान है

हे मनुज श्रेष्ठ, मैं तुम्हारा वंदन करता हूँ
और मीडिया की इस बात का खंडन करता हूँ
की इस देश में
पशु का जीवन आसान नहीं है
कौन कहता है,
यहाँ पशुओं के संरक्षण का इंतज़ाम नहीं है?

अगर तुम्हारी परम्पराओं को समझ पाते
तो आज हम चौपाये भी पनप जाते
हम पशु होकर भी पशुता से वंचित हैं
सारी पशुता तो मनुष्यों में संचित है

इस देश में,
पशुओं का चारा मंत्री जी निगलते हैं
तिहाड़ के सिक्के चुनावों में चलते हैं
नशे में धुत्त रईसजादे, फुटपाथियों को कुचलते हैं
और गरीब के जनाजे रोज़ निकलते हैं

ओवरटेक करने पर गोली मिलती है
आतंक के साये में जनता पलती है
फिर इंसाफ की अंधी देवी, जब हाथ मलती है
तब शरीफ को अपनी शराफत बहुत खलती है

अपनी हवस को तुमने गिद्ध कर लिया है
मनुष्य ने पशुता को सिद्ध कर लिया है
जो बहा लेता है खून धर्म की बात पर
वही राज करता है आदम की ज़ात पर

पशुओं के समान रोज़ कृत्य करते हैं
सत्ता के वो पुत्र खुले विचरते हैं
उनकी सुरक्षा का यहाँ पुख्ता इंतज़ाम है
मनुष्य रूप में जो भी पशुओं के समान हैं

जिसमें पशुता का लेशमात्र भी अंश नहीं है
इस धरती पर आज उसका वंश नहीं है
इसलिये
अपने जीवन की डोर मैं तोड़ जाता हूँ
ये संसार तुम्हारे लिये ही छोड़ जाता हूँ

मेरा उठा हुआ सर झुक गया है
वो कुत्ता गिरकर भी उठ गया है
अब आईना भी मुझसे चौंक रहा है
मेरे भीतर का कुत्तत्व, मुझ पर ही भौंक रहा है

मुझे दुःख नहीं है उसके मरने का
दुःख है तो आदमियत के गिरने का
आँख मिलाकर खुदसे, आईना तो देख पाते
काश हम कुत्ता नहीं, कुत्तत्व को फेक पाते

© - प्रशांत सेठ

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