दुःख दो प्रकार के होते हैं, व्यक्तिगत और सामाजिक/राष्ट्रिय। व्यक्तिगत दुःख वे होते हैं जो किसी अखबार में नहीं छपते। सामान्य तौर पे कोई भी व्यक्ति इनके प्रदर्शन से बचता है। ये वो दुःख होते हैं जिनसे समाज अथवा राष्ट्र को कोई लेना देना नहीं होता। ये वही दुःख होते हैं जिन्हें गीता में कर्मों का फल कहा गया है। जैसे गरीब की जमीन पर दबंग का कब्ज़ा, बिना इलाज के गरीब का मर जाना, पिट पिट कर मज़दूर की मौत, इत्यादि। चूंकि देश, समाज और अन्य लोगों की दृष्टि में इन दुखों का अस्तित्व ही नहीं होता, इसलिये इन दुखों की कोई उम्र भी नहीं होती। जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसकी उम्र कैसी? ये दुःख भले ही किसी के लिए सदियों के बराबर हों परंतु वर्तमान व्यावसायिक भौतिक युग में अन्य लोगों का इससे कोई सरोकार नहीं होता। अतः इन पर चर्चा करना फिजूल है।
इसके विपरीत सामाजिक/राष्ट्रीय दुःख वे होते हैं जो अख़बार में छपते हैं, जैसे JNU के कन्हैया का भाषण, ढाका में आतंकवादी हमला, केजरीवाल जी के बयान, सलमान की फ़िल्म, कश्मीर समस्या, मोदी जी की विदेश यात्रा, इत्यादि। इनसे आपका सरोकार होना नितांत आवश्यक होता है अन्यथा अपने आस पास एवं सोशल मीडिया में आप पिछड़े, अपढ़ और गैर जागरूक माने जाते हैं। इन दुखों पर विचलित होने जैसी पोस्ट आपके संवेदनशील होने की निशानी मानी जाती है। ये दुःख नित नये होना चाहिए क्योंकि सुबह का अखबारीय दुःख अधिक से अधिक शाम तक आपके ज़हन में ज़िंदा रहता है। दफ्तर और चौराहों पर चर्चा करने और फेसबुक पर एक पोस्ट डालने के उपरान्त यह दुःख स्वतः मर जाता है। इस बात को समझते हुए मीडिया भी रोज़ नए दुःख परोसने के कार्य में ईमानदारी से संलग्न रहती है।
देश और समाज के प्रति आपकी फेसबुकीय चिंता आपके जागरूक होने की निशानी है। इस मीडियाई दुःख पर फेसबुकीय चिंता से आपको ये आत्म बोध भी होता है कि समाज बदल रहा है और इसको बदलने में आपका बहुत बड़ा हाथ है। और यदि आप उक्त दुःख पर कविता अथवा व्यंग लिख कर पोस्ट करते हैं तो आपका डिजिटल सम्मान कई गुना प्रगति कर जाता है। किन्तु यह परम आवश्यक है की शाम की चाय के साथ सम्बंधित दुःख को भी घोल कर पी जायें, क्योंकि बासी दुःख का प्रदर्शन सोशल मीडिया में उसी प्रकार अर्थहीन और उपेक्षित हो जाता है जैसे आपके घर में कोई बुजुर्ग।
एक ही दुःख से चिपके रहना बोरिंग हो जाता है और फिर लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते। अतः कोई दुःख मरने से इनकार कर दे तो भी रात होने से पहले उसका गला घोंट दें। कहीं कोई सामाजिक/राष्ट्रिय दुःख आपके साथ एक रात के लिए सो गया तो सुबह तक आपके सामाजिक कार्यकर्ता बन जाने का खतरा है।
© - प्रशांत सेठ
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