मेरी अपनी मंज़िल, अपना ही रस्ता है
मैं जब ये कहता हूँ, ज़माना हँसता है
वो कहते हैं जुनूँ में, जाँ निकल जाती है
मैं हंसकर ये कहता हूँ, सौदा सस्ता है
क्यों ठहरें समंदर से, होगा क्या हासिल
ये जुनूँ है कि दिल में, दरिया सा बसता है
इक बूँद गालों पर, आकर ये कहती है
दिल का एहसास ये, आँखों से रिसता है
इक सफ़र है ज़िन्दगी, मुश्किलें आनी जानी
कब एक ही मंज़र से, ये भी वाबस्ता है
ज़िद छोडो, घर से निकलो, नज़ारे और भी हैं
ठहरे तो दीवारें, चल दिये तो रस्ता है
© - प्रशांत सेठ
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