Sunday, May 10, 2015

मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना

सृष्टि की सबसे सुंदर रचना, या स्वयं सृष्टि ही होती है माँ। ईश्वर की साक्षात अनुभूति होती है माँ। मातृ दिवस पर संसार की सभी माँओं को नमन के साथ एक रचना, अपनी माँ के नाम, हालांकि...

कितना भी कुछ लिख लें लेकिन
मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना
कलम की छोटी नाव लेकर
माँ रुपी सागर को लांघ लेना

अथक परिश्रम और अदम्य साहस
अपने सृजन पर अटूट विश्वास
घुटनों पर चलते जीवन की
ऊँगलियों को उसका थाम लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

दर्द मेरा आंसू उसके थे
सुख मेरा था, दुःख उसके थे
मेरी पीड़ा के काजल को
उसका वो आँखों में आंज लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

जाने कैसे कर लेती थी
क्रोध घृणा सब हर लेती थी
मेरे मन का मैला बर्तन
ममता से उसका वो मांज लेना
ह्रदय के इस भाव को बोलो
क्या संभव है शब्दों में बाँध लेना

देह संग स्मृति जलायें कैसे
माँ यहीं है भुलायें कैसे
खुद बेसुध थी, पर मेरी सुध
उसका सवेरे और साँझ लेना
ह्रदय के इस भाव को मुश्किल
मुश्किल है शब्दों में बाँध लेना

© - प्रशांत सेठ

Thursday, May 7, 2015

Being Abhijeet

#salmanverdict

वो कहते हैं की फुटपाथ पर सोना है तो ज़िन्दगी की उम्मीद मत रखिये। क्योंकि किसी रईस की बहका हुआ अहंकार आपको कभी भी रौंद सकता है।

गरीब होना अपने आप में एक जुर्म है। उस पर से किसी रईस के अहंकार से टकराना, यानि महापाप। इस जुर्म की सजा तो मिलनी ही थी। गरीब को 13 साल पहले ही मिल गई।

अभिजीत का कमेंट और कुछ नहीं बस दिल और दिमाग के बीच की दूरी है। और दिल के हिसाब से इस दिमागी दुनिया में तो रहा नहीं जा सकता। इसलिए Being Human नहीं अब Being Abhijeet होने का दौर है। एक ग़ज़ल इसी बात पे.....

आब-ए-चश्म की मानिंद, निकल चलते हैं
सिर्फ़ एहसास लिये, अये दिल, चल चलते हैं

पर क़तर देगी ओ पैरों पे ना टिकने देगी
उल्टी दुनिया है, चलो सर के ही बल, चलते हैं

हैं ये खोटे सही, पर जेब तो खनकाते हैं
नहीं बाज़ार में, सिक्के अब, असल चलते हैं

धुंध है याकि, तेज़ रोशनी है, दौलत की
अंधे जज़्बात हैं, तो हम भी,सम्हल चलते हैं

दिल को छोड़े कि हम, अक्ल का दामन थामें
साथ इस दौर के, चुपचाप, बदल चलते हैं

फिर कोई 'सेठ' ना फ़ुटपाथ को ज़ख़्मी कर दे
है अमीरों का शहर, इसमें शगल चलते हैं।

© - प्रशांत सेठ

आब-ए-चश्म = आंसू, शगल = चोंचले

Friday, May 1, 2015

श्रमवीर

मज़दूर दिवस पर दुनिया के तमाम मज़दूरों को मज़दूर होने और रहने की बधाई। तुम्हारा मर्ज़ दूर होगा या नहीं, ये तो मैं नहीं बता सकता; लेकिन इतना ज़रूर बता सकता हूँ कि दुनिया के हर ख्वाब की नींव में तुम्हारा पसीना होगा। तुम्हारे ख्वाबों की कब्र पर बड़े बड़े ताजमहल खड़े होंगे। तुम्हारे कांधों पर चढ़कर ही दुनिया चाँद पर पहुंचती रहेगी ...

तुम्हारे कांधों पर टिका जहान है
इस संसार का यही गूढ़ विज्ञान है
तेरे अरमानों की लाश पर श्रमवीर
हमारे सपनो का सुन्दर मकान है

एक व्यंग रचना...

कोई इतना क्यों मजबूर होता है
पापा, एक आदमी क्यों मज़दूर होता है
आज फिर मैं एक कठोर सच से जूझा
जब स्कूल से आकर मेरी बेटी ने पूछा

ये शख्स पत्थरों पर क्यों सोता है
इसका बच्चा भूख से क्यों रोता है
क्यों ये हर सुख सुविधा से दूर होता है
बताओ ना पापा इसका क्या कुसूर होता है

बच्चों की अलग दुनिया, अलग भाषा होती है
उसमें संवेदना, प्रेम, विश्वास और आशा होती है
ये जो बाहर दिखते हैं, वही अंदर से होते हैं
हमारी सोने की लंका में ये बन्दर से होते हैं

मैं घबराया, ऐसी भावनायें इस युग में महापाप हैं
लोग हमें धिक्कारेंगे, आप किस तरह के बाप हैं
इन फ़िज़ूल बातों को इसके मन से मिटाना होगा
अभी ये बन्दर है इसे इंसान बनाना होगा

मैंने कहा, कौन कहता है ये मजबूर होता है
सरकारी फाइलों में ये बड़ा मशहूर होता है
इसके लिए देेश में योजनायें हैं बहुत सारी
मगर इसको है नहीं सुधरने की बीमारी

इन योजनाओं में अफसर मंत्री सब पनप जाते हैं
गली मोहल्ले के छुटभैये नेता भी खप जाते हैं
एक यही है जो जस का तस रहता है
खट्टे अंगूरों को ताकता बस रहता है

इस प्रजाति में एक बात ख़ास होती है
इसे ना भूख लगती है, ना प्यास होती है
इसके जिस्म में खून नहीं, पानी बदस्तूर होता है
जिस दिन बहता नहीं पसीना, आँखों में ज़रूर होता है

आधी ज़िन्दगी ये व्रत रखता है
इसको अपनी भूख पर गुरूर होता है
फुटपाथों पर ये चैन से सोता है
बिस्तरों का इसको कहाँ शऊर होता है

इसको अस्पतालों की ज़रूरत नहीं है, ये बीमार नहीं होता
ये पढ़ लिख जाता तो आज ताजमहल और क़ुतुब मीनार नहीं होता
इन बातों को हमारा समाज अच्छी तरह समझता है
इसलिये इन सुविधाओं से इसको वंचित रखता है

इसकी आमदनी भी बड़ी भारी होती है
तभी तो इसकी बस्ती में कलारी होती है
भौतिक सपनों से दूर ये त्यागी महान होता है
संसार की नश्वरता का इसको पूर्ण ज्ञान होता है

आज मई दिवस है, नेताजी ने यूँ ही भाषण दिया होगा
स्कूल वालों ने गरीबों को मुफ़्त में राशन दिया होगा
तुम फ़िक्र मत करो, आज के दिन का ये राजनैतिक दस्तूर है
ये तो कल भी मज़दूर था बेटी, ये आज भी मज़दूर है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 29, 2015

उत्तरदायी कौन?

भूकंप को लेकर तमाम विचार पढ़ने मिले। उनमे से कुछ ईश्वर के अस्तित्व अथवा शक्ति पर संदेह करने वाले भी थे। कोई कह रहा था की इस तबाही को रोक पाना ईश्वर के बस में भी नहीं है।

शिकायतें और मांगें, इसके अलावा कुछ और लेकर परमशक्ति के समक्ष पहुँचने वाले विरले ही होंगे। ये कटु सत्य है की शिकायतें लेकर जीने वाले लोग, स्वयं के दोषों के प्रति अंधे होते हैं। ऐसे लोगों को मेरी सलाह है के ईश्वर के अस्तित्व को बिलकुल नकार दें। जब वो है ही नहीं, या बेबस और लाचार है तो फिर शिकायत क्यों और किससे। शिकायतों में जीने से बेहतर यही होगा क्योंकि तब शिकायतें नहीं कर पाओगे। शिकायत के समाप्त होते ही नव निर्माण की राह खुलेगी और स्वयं के प्रयास शुरू होंगे।

किस्मत/प्रारब्ध में लिखे हुये किसी भी कष्ट से सम्बंधित प्रश्न को लेकर जब मैं अपने ईश्वर के समक्ष होता हूँ तो हर बार जवाब में यही प्रतिप्रश्न मिलता है...

चार सू ये तबाही का मंज़र, कौन लिख गया
शहर आबाद गाँव को खंडहर, कौन लिख गया
हक़ से ज़ियादा ले रहा कौन, खुद से पूछो
कतरे जैसी प्यास को समंदर, कौन लिख गया

© - प्रशांत सेठ

चार सू = चारों तरफ

Monday, April 27, 2015

पर्याहरण

माफ़ करना दोस्तो। ज़रा सी ज़मीन क्या हिली, हम भी हिल गये। इसलिये आज फिलोस्फी झाडेंगे। दो चार दिन में, हम खुद ही भूल जायेंगे और आप भी कहाँ तक याद रखेंगे।

हम कितने बेबस हैं दोस्त
अपने ही हाथों में
लातों के भूत हैं हम
कहाँ मानते बातों में
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कल हम बतिया रहे थे इंसान की बेहिसाब भूख पर। अब पेट हो तो भर भी दे ये धरती। मगर तृषणा? उसको तो भगवान भी तृप्त नहीं कर सकता।

देह से देहरी तक। बस इतनी ही तो सोच है हमारी। और जैसे हम हैं, वैसी ही हमारी दुनिया होगी। नहीं है तो बना देंगे, "भीतर से खोखली"। आज इसी बात पर कुछ अलग अंदाज़ में...

जाने खुद से कब बिछड़ गये
इस क़दर बसे, उजड़ गये

नदी नाले पहाड़ जंगल
प्रगति की भेंट चढ़ गये

विज्ञान के युग में हम तुम
देखो प्रकृति से लड़ गये

चाँद सूरज कहें पृथ्वी से
माँ तेरे मुंडे बिगड़ गये

घर से मकाँ, मकाँ से महल
जाने कैसे इतने बढ़ गये

गाँव से तो आ गये शहर
रास्ते में रिश्ते सड़ गये

बारिश धन की खूब हुई, पर
संवेदना के पत्ते झड़ गये

भूख नहीं यूँ दौड़ाती है
लोभ के कुत्ते पीछे पड़ गये

चाह कर भी लौटें कैसे
पाँव हवस में गहरे गड़ गये

© - प्रशांत सेठ

Saturday, April 25, 2015

आज के भूकंप पर...

शायद फिर कोई धरतीपुत्र तड़पा होगा
भूकंप नहीं था, माँ का दिल धड़का होगा ।

ये तो हुई किसानों के दर्द की बात लेकिन धरती की इस कंपकपाहट में, उन ज़ख्मों का भी हाथ है, जो इंसानों ने प्रगति के नाम पर वसुंधरा को दिये हैं। इंसानी हवस ने पहाड़ खोद दिये, जंगल उजाड़ दिये, जल और वायु को प्रदूषित कर दिया। इसका भुगतान समूचे समाज को करना होगा, विशेषकर आने वाली पीढ़ियों को।

मगर विडम्बना ये है की अपराध कोई करता है, सज़ा किसी को मिलती है। अमीर के अपराध की सजा अक्सर गरीब के हिस्से आती है। अमीर और गरीब में एक फर्क ज़रूर होता है। अमीर की भूख बेहिसाब रहती है और गरीब की भूख हिसाब से रहती है। भूख जब हद से बढ़ जाये तो हवस कहलाती है। और इसी हवस ने दुनिया का मीजान बिगाड़ रखा है। इस पर फिर कभी..

फिलहाल ये पंक्तियाँ समर्पित उन संवेदनशील लोगों को जो नरम मिट्टी से बने हैं, पत्थरों से नहीं...

मिटटी से जो बना हो, वो मकान टूटता है
इस खेल में सच में है जो इंसान, टूटता हैं ।
धरती तो थरथराये,अमीरों की भूख से,पर
मुफ़लिस के सर पे ही ये आसमान टूटता है ।।

© - प्रशांत सेठ

मुफ़लिस = गरीब


Thursday, April 16, 2015

मुट्ठी भर ज़िन्दगी

बड़े भाई सूरज राय "सूरज" जी के जन्मदिन पर कुष्ठ आश्रम में 'तेरा तुझको अर्पण' करने का सौभाग्य इस वर्ष मुझको भी मिला।

भूख, मुफलिसी अपने आप में बड़ा रोग है। उस पर से गलते हुये हाथ पाँव यानी तिल तिल मरना। दुआयें देने के लिये इनके हाथ भले ही सलामत नहीं थे मगर इनके आंसुओं में दर्द भी था और दुआ भी। आज हम लोग वही समेट लाये झोली भर के। जो दे पाये वो बहुत थोडा था और ज़रूरत कहीं ज़्यादा बड़ी थी।

टूटे हुये टपरे में टपकती हुई बूंदों के बीच, सूरज का इंतज़ार (और ज़रूरत) जितना इनको था, उतना शायद किसी और को नहीं होगा। बारिश की बूँदें तो थम जायेंगी मगर आँखों की बरसात कब थमेगी, ये नहीं मालूम। बेबसी और लाचारी के ये आंसू देखकर यूँ लगा जैसे...

भूखों को उम्मीद दो कौर मिल गई
चंद लम्हात की दौलत और मिल गई
कह दो मौत से के ठहरे ज़रा अभी
मुट्ठी भर ज़िन्दगी इन्हें और मिल गई

© - प्रशांत सेठ