Monday, October 20, 2014

एकलव्य

बहुत आसान है ऊंचा उठना, बस थोडा सा गिर जाइये। यही सच है इस युग में सफलता का। जो जितने बड़े दिखते हैं अक्सर बहुत छोटे लोग होते हैं (अपवादों को छोड़कर)।

सच तो ये है की आज के दौर में एक अर्जुन के पीछे कई एकलव्य बलिदान होते हैं। ना जाने कितनी प्रतिभाओं का शोषण करके, अपनी ऊंची पहुँच का लाभ आज भी कई अर्जुन उठाते रहते हैं। मध्य प्रदेश का पी.एम.टी परीक्षा घोटाला हो या एशियाड में मुक्केबाज़ सरिता देवी का प्रकरण, अंगूठे तो आज भी कट रहे हैं। लाखों रुपयों का डोनेशन लेकर डॉक्टर और इंजिनियर गढ़ने वाले ये गुरु अगर द्रोण नहीं तो और क्या हैं? ऐसे में मन में एक प्रश्न उठता है। क्या भौतिक सफलतायें केवल छल और फरेब से ही अर्जित की जा सकती हैं?

लेकिन अपने स्वार्थ के लिये चरित्र और सिद्धांत बेचने वाले, मासूमों और कमजोरों का शोषण करके सफलता अर्जित करने वाले ये लोग नहीं जानते की इन्होंने क्या खोया है। वास्तव में ये अपना जीवन और आत्मा ही खो देते हैं। गुरु द्रोण की भांति अंत में प्रतिष्ठा और परिवार भी गँवा देते हैं।

"अस्थायी लाभ के लिए किया गया स्थायी नुकसान"। यही परिभाषा है झूठ, फरेब और छल की।

ये भी सच है की सच्चाई का, नैतिकता का रास्ता दुर्गम होता है। अंगूठा भी उसका ही कटता है जिसके जीवन में कुछ सिद्धांत होते हैं। इसलिये सच हमेशा परीक्षा देता हुआ प्रतीत होता है और झूठ अन्दर से खोखला होते हुये भी बाहर से बुलंद दिखता है। लेकिन केवल उनको जो अंतर्दृष्टि से हीन है।

ये पंक्तियाँ समर्पित हैं इसी कड़वे सच को ...

लिबास-ए-झूठ रेशम का, सच को ओढ़े कफ़न देखा
ऊंची हवेलियों के नीचे झोपड़ियों को दफ़न देखा
हमने देखा कटा हुआ अंगूठा एकलव्य का
और दुनिया ने बारहा अर्जुन का फन देखा

© - प्रशांत सेठ

बारहा = हमेशा

Sunday, October 12, 2014

दाम्पत्य

जीवन एक यात्रा है और इसे कई मोड़ से गुज़रना पड़ता है। यह सफ़र अकेले करना पड़े तो इंसान टूट सकता है। और वहीँ अगर कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला कोई साथी हो तो मुश्किलें भी खूबसूरत लगने लगती हैं। लेकिन किसी का साथ चाहिये तो कुछ शर्तें भी निभानी पड़ती हैं।

परिवार वह शक्ति है जो प्रेरित करती है श्रम करने के लिये। और इसका बीज है दाम्पत्य। सफल दाम्पत्य वही है जहाँ परिवार स्वयं प्रेरणा बन जाता है। और ऐसा परिवार बनता है परस्पर प्रेम और विश्वास से, और थोड़े से त्याग से।

करवाचौथ के अवसर पर ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस खूबसूरत रिश्ते को जिसका नाम है दाम्पत्य ....

हरी भरी रहे दरख़्त पर पत्ती पत्ती एहसास की
रिश्तों पर एक छतरी हो यूँ परस्पर प्रेम विश्वास की
एक लम्बा सफ़र है जीवन, तन्हा क्यूँकर काटें हम
मिल जुलकर सह लेंगे सारी बारिशें आकाश की

© - प्रशांत सेठ

Sunday, September 21, 2014

इतवार

छुट्टी का दिन किसे अच्छा नहीं लगता। घर में परिवार के साथ फुर्सत का एक दिन नयी ऊर्जा दे जाता है। इस इतवार का इंतज़ार हफ्ते भर रहता है।

हम और आप सौभाग्यशाली हैं क्योंकि ये इंतज़ार सबको नहीं रहता। एक पिता जिसके अरमान जेब की गुंजाईश के सामने दम तोड़ते हों, उसे बिलकुल नहीं रहता। एक गरीब बाप जिसे आज भी रोटी का इंतज़ाम करना हो, उसे भी नहीं रहता। ऐसे भी लोग हैं जो बच्चों से मुंह चुराकर सुबह से निकल जाते होंगे। या फिर बहला देते होंगे मासूम ख्वाहिशों को नये नये बहानों से। या फिर बचपन का गला घोंट देते होंगे एक थप्पड़ से और गाल को सहलाता हुआ बचपन अचानक समझदार हो जाता होगा।

देखिये इतवार का एक रूप ये भी है...

आज फिर दिन है सब्र की आज़माइश का
आज फिर दिन है बच्चों की फरमाइश का
गम-ए-मुफलिस आ गया फिर इतवार की सूरत
आज फिर चेहरा उतरा है मेरी गुंजाइश का

© - प्रशांत सेठ

मुफलिस = गरीब
गुंजाइश = हैसियत

Friday, September 19, 2014

बंधन

जीवन में स्वछंदता को रोकने के लिये ही शायद समाज का, रिश्तों का जन्म हुआ है। मन की अनंत इच्छाओं के वेग में कई बार ये बंधन बोझ लगने लगते हैं। परन्तु इनका महत्व वही जानता है, जिसने इन्हें खो दिया है।

डोर अर्थात बंधन। यानी अनुशासन, मर्यादा, परस्पर प्रेम, सम्मान, विश्वास, आदि आदि। पतंग की भांति जीवन मूल्यों की डोर से बंधकर जीने वाले, कभी दिशाहीन होकर नहीं भटकते।

और जो स्वछन्द होकर भटकना चाहते हैं उनके लिये....

राब्ता डोर से रख, लीजिये मज़ा ऊंचाई का
ख़ाक मज़ा है तर्क-ए-ताल्लुक की रुसवाई का
चीथड़े जिस्म-ओ-जज़्बात के कर देगा ज़माना
पूछियेगा अंजाम कभी पतंग से बेवफाई का

© - प्रशांत सेठ

राब्ता = रिश्ता
तर्क-ए-ताल्लुक = सम्बन्ध टूटना
रुसवाई = बदनामी


Tuesday, August 26, 2014

आ अब लौट चलें...

अच्छे दिनों की तलाश में ना कितने ख्वाब, रोज़ गाँव से निकलते हैं शहर की तरफ। कच्ची उम्र का भोला और नादान युवक जब शहर पहुँचता है तो ये दुनिया सबसे पहले छुड़ा लेती है उसकी मासूमियत। फिर शुरू होता है झूठी कामयाबियों का वो सफ़र, जिसमे इंसानियत के एहसास धीरे धीरे दम तोड़ते जाते हैं।

लेकिन कहीं ना कहीं आत्मा कचोटती है। जिंदगी की असलियत से रूबरू होकर आँखों पर से रंगीन पर्दा हटता है। दुनिया भर का नाम, शोहरत, रुतबा और दौलत भी वो सुकून नहीं दे पाती जो अपनी मिटटी अपने लोगों में मिलता है। इस रफ़तार भरी जिंदगी में दौड़ते दौड़ते घायल जज्बातों के रिसते घावों को, कभी ना कभी ठहर कर धोना ही पड़ता है।

अपनी जड़ों से कोई कब तक भाग सकता है। आसमानों को छूने की चाह में जड़ों से दूर हो चुके दरख़्त को, मामूली हवायें भी गिरा जाती हैं। ज़रूरी है कि इंसान ऊंचाई पाने के साथ साथ गहराई से भी अछूता न रहे। और ना भूले अपनी ज़मीन को और ज़मीन से जुड़े लोगों को।

अपनी जड़ों की और लौटते इन एहसासों को शब्दों में बांधने की एक कोशिश...

आ अब लौट चलें...

सर की ज़द से बाहर चले दिल की ठांव हो लिये
बाद मुद्दत के शहर से निकले वापस गाँव हो लिये

अरमानों को पंख लगे थे कभी सुनहरे ख्वाबों के
सच से रूबरू यूँ हुये कि फिर से पाँव पाँव हो लिये

कामयाबी के मौसम में शोहरतों की बारिश थी
रिश्ते भी कागज़ की जैसे बरसाती नांव हो लिए

बचपन के वो गीत थे जितने कोयल जैसी तानो में
इस जद्दोज़हद में जिंदगी की कांव कांव हो लिये

हक़ीक़तों की कड़ी धूप में जज्बातों की खैर कहाँ
हम अपने एहसास थाम कर छाँव छाँव हो लिये

©- प्रशांत सेठ

ज़द=दायरा

कैसे समझूं प्रेम की भाषा

विगत जन्माष्टमी पर मैं कुछ ढूँढ रहा था। मैं ढूँढ रहा था वो कारण जो मनुष्य और परमात्मा के बीच दूरी उत्पन्न करता है। इस चिंतन ने एक रचना को जन्म दिया ...

जीवन में है शेष कदाचित
अभिलाषा निज सम्मान की
भटक रहा हूँ जगत में लेकर
आशा मिथ्या पहचान की
मैं क्या समझूं प्रेम की भाषा
मुरलीधर घनश्याम की

मन बसी स्वार्थ की नगरी
सत्ता जिसमें अभिमान की
हूँ आकंठ नदिया में डूबा
माया मोह और अज्ञान की
मैं क्या...

शोर बहुत हुआ इच्छाओं का
भीड़ लोभ मद और काम की
दौड़ा रही नित स्वप्नों के पीछे
भूख दिन रात सुबह शाम की
मैं क्या ....

लालसाओं में लिप्त ह्रदय ज्यों
रण भूमि जीवन संग्राम की
गुंजित कैसे फिर कानों में होगी
ध्वनि मधुर मुरली के तान की
मैं क्या ...

© - प्रशांत सेठ

Monday, August 25, 2014

मैं इन्कलाब हूँ !!!

जनकवि स्व. विपिन मणि  जी की 12वीं पुण्यतिथि पर कोटा (राजस्थान) में उनकी स्मृति में आयोजित कवि सम्मलेन में सम्मिलित हुए। काव्य रस की अदभुत धारा बहाने के लिये इस कार्यक्रम के आयोजक प्रिय मित्र डॉ. उदय मणि, कपिल मणि और लोकेन्द्र मणि को हार्दिक बधाई।
संसार में कुछ एक ही ऐसे किरदार होते हैं जो खुद के लिये नहीं जिया करते। इसलिये उनका जीवन देह की सीमाओं से परे जाकर मृत्यु के लिये भी चुनौती बन जाता है। मृत्यु का अधिकार केवल देह पर हो सकता है, विचारों पर नहीं।

श्रद्धेय बाबूजी स्व. विपिन मणि जी को श्रद्धांजलि...

अपनी औलाद पर कब अपना असर नहीं होता
सच की ज़मीन पर कभी झूठ का शज़र नहीं होता
लो देख लो मेरा अक्स अब मेरे बच्चों में
एक जागता ख्वाब हूँ मैं, जो कभी नहीं सोता
...
और ये पंक्तियाँ समर्पित हैं उस अदभुत प्रेम और अपनेपन को जो मणि परिवार के हृदय में बसता है

तिजारत का हुनर मेरा, शायद मुझसे रूठ गया
बरसों से मुनाफे का सिलसिला यूँ टूट गया
दिल के कारोबार में अबकि घाटे की आमद हुई
जिस्म फकत ले आया हूँ, मैं वहीँ छूट गया

© - प्रशांत सेठ