किसी शायर ने क्या खूब लिखा है...
"बादलों के दरमियाँ कुछ ऐसी साज़िश हुई
मेरा घर मिट्टी का था, मेरे ही घर बारिश हुई"
मेरा घर मिट्टी का था, मेरे ही घर बारिश हुई"
दुनिया का दस्तूर है, गमगीनों को और सताने का। मगर फलक भी इसी राह पर चलता है, ये ताज्जुब की बात है। दरअसल कच्चे मकानों में लोगों के रिश्ते और हौसले दोनों पक्के होते हैं। खुद्दारी से जीने की जुर्रत करते हैं। शायद इसलिये....
पक्के मकानों पर यूँ गिरना फ़िज़ूल है
बिजलियों का अलग अपना ही उसूल है
हौसले बड़े होते हैं मिट्टी के घरों में, और
ये ज़ुर्रतों पर कुदरती इक महसूल है
बिजलियों का अलग अपना ही उसूल है
हौसले बड़े होते हैं मिट्टी के घरों में, और
ये ज़ुर्रतों पर कुदरती इक महसूल है
© - प्रशांत सेठ
महसूल=कर (टैक्स)
और पक्के मकानों में कच्चे रिश्तों के लिये कुछ यूँ ...
गुरूर की कुरसी का सिर्फ पाया बड़ा है
रिश्ते और एहसास नहीं, सरमाया बड़ा है
अना अपनी औकात से ऊंची हुई है यूँ
यहाँ कद से ज्यादा सबका साया बड़ा है
रिश्ते और एहसास नहीं, सरमाया बड़ा है
अना अपनी औकात से ऊंची हुई है यूँ
यहाँ कद से ज्यादा सबका साया बड़ा है
© - प्रशांत सेठ
सरमाया=पूँजी, दौलत
अना=अहं
अना=अहं