Thursday, February 27, 2020

एक राष्ट्र की मौत

आक्रोश, बुरा नहीं होता
जब जन्म लेता है
करुणा की कोख से,
तब पढ़ता है, निर्बलों की पीड़ा
पलता है, वेदना के आंसुओं पर
और अभिव्यक्त होता है
अन्याय के विरुद्ध

आक्रोश, बुरा है वही
जो जन्म लेता है
अहंकार की कोख से,
तब पढ़ता है, स्वार्थ का गणित
पलता है, परजीवी की तरह समाज में
और अभिव्यक्त होता है
अनुशासन के विरोध में

बुरी नहीं होती
गैर मजहब की हर अभिव्यक्ति
बुरी है वही
जिसने जन्म लिया है
धर्मांधता और जिहाद की कोख से
जिसने तय कर रखे हैं मापदंड
दूसरों की आस्थाओं के
जिसे तकलीफ है, औरों के खुदा से

तभी तो
उधर तुम्हारी धर्मांधता हामला* है तो
इधर मेरी करुणा ने भी कर लिया है गर्भ धारण
और मृत्युशैया पर लेटा है
एक बूढ़ा राष्ट्र
पुनर्जन्म की प्रतीक्षा में

© - प्रशांत सेठ

*हामला = गर्भवती

Thursday, February 20, 2020

प्रयाग

प्रयाग

पर्वतों से गिरकर
विस्तार की तलाश में बहती
ये नदियां
होती हैं महत्वकांक्षाओं की तरह
एक दिन खो देती हैं अपनी मिठास
समा जाती हैं खारेपन में

क्योंकि
धाराएं बनाती हैं रास्ता
दो पाटों में बांटकर, धरा को
धाराएं ठुकरा देती हैं थिर को
और समेटना चाहती हैं आगोश में
वो सब कुछ, जो है जड़हीन

मैंने देखा है
सियासत के बंटवारे से प्रदूषित है
प्रेम की यमुना
लुप्त है नश्वर के मोह में पड़कर
सत्य की सरस्वती
और मैली हो चुकी है मन की गंगा
अपनी जड़ों को भूलकर

हे महामानव!!
सुना है
तुम भी उतरे हो पहाड़ों से
किसी महासागर की तलाश में?

© - प्रशांत सेठ

Friday, February 14, 2020

नमन पुलवामा

पुलवामा

हम हताश नहीं
हम निराश नहीं,
मिट जाएँ क्षणिक अंधेरों से
ऐसा हम प्रकाश नहीं
हम सूर्य नहीं जो
उदय होकर फिर अस्त हुआ
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं

मानवता को कर कलंकित
लोभी शत्रु जब बढ़ते हैं
हम सीमा के रक्षक उसकी
छाती पर जा चढ़ते हैं

मृत्यु को भी वधू बनाकर
वरने से हमको संत्रास नहीं

हृदय में धधका अनवरत
राष्ट्रभक्ति का ज्वाल हैं हम
आज तिरंगा ओढ़ के निकले
भारत माँ के लाल हैं हम

राजतिलक चले ठुकरा कर
हमको अप्रिय वनवास नहीं

मातृभूमि के प्रहरी हम
हैं नींव राष्ट्र की गहरी हम
सोया हुआ देश जगाने
छोड़ के निकले देह-री हम

है नष्ट हमारी काया किन्तु
संबल का हुआ विनाश नहीं

यूँ तो शत्रु के लिए
प्रलयंकारी काल हैं हम
मगर तुम्हारे समक्ष खड़ा
अनसुलझा एक सवाल हैं हम

कुछ प्रश्नों का उत्तर लेकिन
है अपने भी पास नहीं

दुश्मन की संगीनें अपनी
छाती पर सम्हाले है
किन्तु पीठ सदा तुम्हारे
विश्वासों के हवाले है

घर में भी बैठे हैं शिखंडी
था हमको आभास नहीं

हम बाली से अधिक सबल
थे भीष्म प्रतिज्ञा से अटल
स्मृतियों में जिंदा रखना
हम होंगे ना यहाँ जब कल

मिले शहादत कर्तव्य पथ पर
इससे बढ़कर सन्यास नहीं
हम अंधकार से लड़ते जुगनू
जिनके सपनों को अवकाश नहीं

© - प्रशांत सेठ

Saturday, February 8, 2020

आव्हान

वर्तमान का मौन कहीं ना, युगों युगों का हो संताप
मूक न रहना जब तुम्हारी,  सहिष्णुता पे हो आघात

आव्हान

पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा
अब मुरली का काम नहीं
शंखों को बजना होगा

रोके ना वृन्दावन तुमको
टोके यमुना का तट नहीं
गोरी के कुंतल की काली
उलझाये ना लट कहीं

कर्तव्य की राह में मेरा
प्रेम कभी ना होगा बाधा
मैं शक्ति हूँ तेरी मोहन
बंधन कभी नहीं थी राधा

मुक्त प्रेम को कर बैठी तब
बरसाने की वह किशोरी
मुरलीधर के हाथ थमाकर
संकल्पों की पावन डोरी

त्याग रहित प्रेम हुआ तो
कंसों का वध ना होगा
अब मुरली का काम नहीं
शंखों को बजना होगा

2
मुड़ मुड़ के वो देख रहा
दुविधा में क्यों पग उसके?
रोक रहे रणबांकुरे को
प्रणय निवेदन ये किसके?

हाड़ा वंश की वह तरुणी
कह उठी तब प्रियतम से
बलिदानों की राह पे चलना
मोह ना रखना अब हमसे

क्षत्राणी का प्रेम कभी ना
रोके तुमको निज धर्म से
शीश अपना भेज रही हूँ
प्रिय, विमुख ना हो कर्म से

रहें सतीत्व पौरुष सहगामी
लज्जित धर्म ध्वज ना होगा
पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा

3
सुनो हिन्द की ऐ तरुणाई
तुमपर धरा को रंज ना हो
जिसने तुमको जन्म दिया
उस माँ पर अब तंज ना हो

क्षीरसागर के सुख तभी तक
जब ताण्डव की क्षमता हो 
है वैभव संग शक्ति उसकी
जिसका लहू उबलता हो

करुणा के नेत्रों से छलके
क्रोध के फिर भरे कलश क्यों?
मानवता की जननी अब ना
काली बनने को विवश हो

प्रेम प्राण रस रंग के सारे
मोहों को तजना होगा
पुष्प नहीं शोभित तुमको
शस्त्रों से सजना होगा

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 28, 2020

उठो शाहीन अब आँखें खोलो

भारत माँ की तरफ से अपने प्यारे मगर ढीठ बच्चों के लिए सुबह सवेरे वाली कविता। सोहनलाल द्विवेदी जी से क्षमा सहित 🙏🏼😄

उठो शाहीन अब आँखें खोलो
बहुत हुआ तुम घर को हो लो

दिल्ली में ना कमल दल फूले
तुम्हारा वोट बैंक ना झूले

गंदी हवा खूब फैलाई
बहुत मिली बिरयानी भाई

रुपये पाँच सौ खूब बंटे हैं
महीने भर से सब डटे हैं

राजनीति ने खेल खिलाया
तुमने खूब माल कमाया

नेताओं ने खाई मलाई
देश कहे बहुत दुःखदायी

देखो फिर से सर ना फूटे
EC (इलेक्शन कमीशन) का कहर ना टूटे

मोदी शाह की अजब माया
उकसावे में कोई ना आया

और ना अब तुम ज्यादा ऐंठो
मेरे प्यारे अब उठ बैठो

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, January 21, 2020

शंखनाद

विद्वता के अधरों पे है
अधर्म सभा ने मौन जड़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

कुरुवंश के सत्ता मोह में
उपवन में आ गिद्ध डटे
ज्ञान नहीं है जिन्हें धर्म का
नकली सारे सिद्ध जुटे

चीर पर माँ भारती के
अहंकार ने पग धरा
फिर पाञ्चजन्य ....

कर्तव्य का गांडीव त्याग
सामर्थ्य आज हताश क्यों?
पार्थ के संकल्प को बांधे
भावुकता बाहुपाश क्यों?

धर्म-अधर्म के बीच निर्णय
असमंजस में क्यों पड़ा?
फिर पाञ्चजन्य ....

निज स्वार्थ में धर्मपथ से
हुआ च्युत जब राजवंश
युगों युगों तक मानवता ने
झेला उसका है विषदंश

आज भी तो प्रश्न वही
समक्ष राष्ट्र के पुनः खड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

सुनियोजित शनैः शनैः
किया नष्ट वेद भाष को
षडयंत्रों ने दिया प्रश्रय
संस्कृति के विनाश को

बूंद बूंद से कलिकाल ने
पाप का भर दिया घड़ा
फिर पाञ्चजन्य ....

नवनिर्माण के शौर्य रथ की
थाम सकेगा रास कौन?
तुम ही हो सारथी जिसके
बाहर विध्वंस भीतर मौन

शस्त्र शास्त्र के संगम का
तुमने ही दृष्टांत गढ़ा
फिर पाञ्चजन्य फूँको केशव
प्रतीक्षा में धर्म खड़ा

© - प्रशांत सेठ




Wednesday, January 15, 2020

मकरसंक्रांति

सम्पूर्ण मानवता को सनातन संस्कृति की शुभकामनाएं देता पर्व 🙏🏼

मुझे नहीं पता
तुम्हारे इस राशि से उस राशि में
प्रवेश का अर्थ
मगर, हे सूर्यदेव!
मैं देख रहा हूँ
माँ नर्मदा की गोद में
सर्द मौसम को पिघलते हुए

काश पिघल जाए इसी के साथ
संबंधों के पहाड़ पर पसरी
बर्फ सी सफेद चादरें
अहंकार की

इच्छाओं की पतंगे
खूब छुएँ आसमान
मगर बंधी रहें
सिद्धांतों की डोर से

ज्ञान का उदित सूर्य
मुक्त करे अस्तित्व को
माया के संक्रमण से
हम करें दान
अज्ञान से संचित सारे संग्रह

मुक्त हो जाए ये बूँद
पृथकता के संकल्प से
कर सके समर्पण
उस शाश्वत सागर की
अनंत गहराई में

छूट जाएं आज
शरशैया पर लेटे जीवन की
हठीली भीष्म प्रतिज्ञाएं
और मानवता हो चले मुक्त
अधर्म के पाश से

© - प्रशांत सेठ