Monday, May 22, 2017

पद-अर्थ विज्ञान

मैंने सुना है
अत्यधिक दाब में
कोई भी ठोस पदार्थ
बन जाता है द्रव
शायद इसीलिए
पिघल जाता है अक्सर
मजबूत से मजबूत इंसान
और बह पड़ते है कभी कभी
आँखों के रस्ते
पाषाण ह्रदय भी

विज्ञान के इस सिद्धांत को
मानता है शायद
अर्थशास्त्र भी
तभी तो भूख के दाब में
पसीने सी पिघलकर
जब बहती है
एक मज़दूर की देह
तब बढ़ती है समाज में
तरलता
अर्थात लिक्विडिटी

मैंने सुना है
और अधिक दाब में
द्रव भी उड़ जाता है
भाप बनकर
तभी तो
एक अंतराल के बाद
स्वार्थ के नीचे दबे
समाज का
मर जाता है पानी
और सूख जाते हैं
ज़रूरतों के दाब में
गरीब के आँसू

अफसरशाही भी समझती है
विज्ञान के इस नियम को
और दबा लेती है
मुआवजे की फ़ाइल
तब भाप बन उड़ जाती है
क़र्ज़ में दबे किसान की आशा
शहीद की विधवा के सपने
उसके बच्चों का भविष्य
फिर समय के साथ
ओझल हो जाती है शहादत
हमारी दृष्टि और स्मृति पटल से
किसी सरकारी रिकॉर्ड में
सदा के लिये
दफ़न होने

इस वैज्ञानिक सिद्धांत को
खूब समझता है समाज
शायद इसलिये
दबा लेता है संवेदनायें
तब उड़ जाती है
भाप बनकर मानवता
बहुत सूक्ष्म होता है
ये परिवर्तन
नहीं दिखता कोरी आँख से
समाज से होता
इंसानियत का वाष्पीकरण

मैं सोच रहा हूँ
इसी सिद्धांत पर
चलती होगी नियति
जब कूटती है
जीवन की ओखली में
वक़्त की मूसल से
हमारा अहंकार
इतना महीन कि
निकल सके बाहर
छद्म आवरण के बारीक
भ्रम रुपी छिद्रों से
बह जाये तरल रूप में
आँख से
या उड़ जाये किसी दिन
धुआँ बनकर
मन के पात्र से

© - प्रशांत सेठ

Monday, May 15, 2017

भज गोविन्दम् तज संदेशम्

व्यक्ति को भज लेना किन्तु विचार को कभी मत भजना। अन्यथा जीवन में तिरस्कार और क्षोभ के अतिरिक्त कुछ प्राप्त ना होगा।

संसार में चिरकाल से नेतृत्व दो ही प्रकार के रहे हैं, विचारवादी और लक्ष्यवादी। किन्तु राजनेता एक ही प्रकार के पाये जाते हैं, लक्ष्यवादी। यहाँ इस बात पर बहस नहीं हो रही कि किसका विचार सही और किसका गलत। वो विचारवादियों का आंतरिक मसला है और किसी के अंदरूनी मामले में दखल देना हमारे हिंदुस्तानी संस्कारों में नहीं है। इसी संस्कार के तहत हम पडोसी के घर में लगी आग को उनका अंदरूनी मामला बताकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।

बहरहाल विचारवादी किसी विचार को लेकर संघर्ष करते हैं और लक्ष्यवादी किसी लक्ष्य को लेकर। यानि की विचारवादियों का उद्देश्य यदि विचार की स्थापना होता है तो लक्ष्यवादियों का उद्देश्य होता है लक्ष्य की प्राप्ति। यह लक्ष्य येन केन प्रकारेण स्वयं को स्थापित करने और स्थापित रखने का होता है। विचारवादी परोक्ष रूप से अपने विचार के साथ खड़ा दिखता है और लक्ष्यवादी भी परोक्ष रूप में ही खड़ा दिखता है मगर किसी मुद्दे के साथ। कृपया भ्रमित ना हों, मुद्दे के साथ खड़ा होना और हल के साथ खड़े होने में फर्क है। चूँकि हमारे और आपके जैसे समर्थक किसी विचार के ही हो सकते हैं और सफलता भी समर्थकों पर ही निर्भर करती है, लिहाजा लक्ष्यवादियों को भी अस्थायी रूप से भेड़ की खाल रुपी एक विचार तो ओढ़ना ही पड़ता है। वो विचार सेकुलरिज्म, राष्ट्रवाद, जातिवाद, आपवाद कुछ भी हो सकता है।

यहाँ मैं आपको स्पष्ट कर दूँ की समर्थक किस चिड़िया का नाम होता है। समर्थक वह विश्वासु जीव होता है जो किसी विचार विशेष की स्थापना का स्वप्न देखता है और उसके लिए व्यक्ति विशेष को स्थापित करने में जी जान लगा देता है। व्यक्ति के स्थापित होते ही, विचार को स्थापित मानकर वह स्थापित व्यक्ति के समर्थन में सोशल मीडिया पर सक्रीय हो जाता है। अब जब नेता दो प्रकार के होते हैं तो समर्थक भी दो ही प्रकार के होते हैं, भक्त और अंधभक्त। और जो इन दोनों में से कोई नहीं होता वो जनता होती है। अंधभक्त एक ही प्रकार का होता है। समर्थन के एग्रीमेंट के तहत वो अपने नेतृत्व से प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं माँगता।

किन्तु भक्त दो प्रकार के होते हैं, जागरूक और स्वार्थचुक (नया शब्द है, मैंने भी पहली बार सुना है अपने मुँह से)। जागरूक अर्थात वो जो व्यक्ति के स्थापित होते ही समय समय पर प्रोग्रेस रिपोर्ट माँगते हैं। ये लक्ष्यवादी नेतृत्व के आचरण में उसके ही वक्तव्य को ढूँढने की भूल कर बैठते हैं और प्रथम चरण में ही अलग अलग तरीकों से सिस्टम से बाहर कर दिये जाते हैं। तदुपरांत उन्हें यह बोध होता है कि व्यक्ति की स्थापना और विचार की स्थापना दोनो अलग बातें हैं।

दूसरे प्रकार के भक्त कहलाते हैं स्वार्थचुक, अर्थात वो जिनका स्वार्थ चुकते ही उनकी भक्ति भी चुक जाती है। ये लेखा जोखा (हिस्सा माँगने से पूर्व माँगे जाने वाला आय व्यय का ब्यौरा) माँगने का दुस्साहस करते हैं। ये अलग अलग राजनीतिक दलों में अलग अलग नामों से पाये जाते हैं। ये द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, आदि चरणों में स्टेप बाय स्टेप बाहर किये जाते हैं। कालान्तर में, ये विलंब से जागने वाले स्वार्थचुक समर्थक, उसी गति को प्राप्त करते हैं, जिस गति को साहित्य जगत में एक चौपाये विशेष द्वारा धोबी के समर्थक होने की दशा में प्राप्त किया जाता है।

एक ओर जहाँ अंधभक्तों को सत्ता की नज़दीकी का भ्रम रहता है वहीँ भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान का वृद्धावस्था से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। अतः ज्ञान प्राप्त होते होते भक्तगण राजनैतिक रूप से वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुके होते है। इस बीच स्थापित व्यक्ति के भक्तों की नई फसल ऊग चुकी होती है। अब आप प्रकृति को अपना काम करने से तो नहीं रोक सकते ना।

आप सोच रहे होंगे कि सेठ जी इतने लंबे व्याख्यान के माध्यम से आखिर कहना क्या चाहते हैं? तो मैं आपको बता दूँ कि सेठ जी सोच रहे थे की भगवान ने सतयुग से लेकर कलयुग तक कई अवतार लिए, पैगम्बर भी भेजे और पुत्र भी भेजा। अनेक प्रतिनिधि संत भी सदा से विचरण कर रहे हैं। फिर भी यह संसार पतनोन्मुख क्यों है? शायद इसलिए की वही गलती अवतरित शक्तियों ने भी की। ये सभी व्यक्ति विशेष की स्थापना कर के निकल लिए। अब देखिये ना, लंका में विभीषण, हस्तिनापुर में पांडव, इत्यादि। इसके बाद ना तो कोई फीडबैक रिपोर्ट ली गई ना प्रोग्रेस रिपोर्ट। मैनेजमेंट की इस बड़ी चूक के कारण धर्म स्थापना का सिद्धांत कुछ दिन तक चला हो तो पता नहीं लेकिन आज तो...?? प्रोग्रेस रिपोर्ट लेना वो भूल गए या उन्हें मिली नहीं, इस विषय में कहीं उल्लेख नहीं मिलता। इतिहास में व्यक्ति के स्थापित होने के बाद का उल्लेख कम ही मिलता है। कदाचित इसलिए की इतिहास रचियता भी वही लोग हैं जो उक्त काल में स्थापित हुये थे।

सार ये है मित्रो, भाइयो और बहनो; यदि आप भी किसी नमो, सर जी या रागा को स्थापित करके प्रोग्रेस रिपोर्ट की उम्मीद लगाये हैं, तो आइये और राजनीतिक बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए, मेरी तरह चुपचाप लाइन में खड़े हो जाइये।

- ठेठ वाणी

Thursday, May 11, 2017

पत्थर के सनम

दुष्यंत कुमार जी ने कहा था...

"कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं होता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो"

लेकिन ज्ञान यदि गलत कानों में पड़ जाये तो दुरूपयोग की सम्भावना बढ़ जाती है और परिणाम वही होता है जैसे पाकिस्तान के हाथ में परमाणु बम। अब देखिये ना, यही शेर एक कश्मीरी पत्थर ने सुन लिया। फिर क्या, वही हुआ जिसका डर था। वह पूरी तबियत से उछलता हुआ आया और एक सुराख कर गया हमारी अखंडता में। सफलता एक ऐसी चीज़ है जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करती है। लिहाजा एक पत्थर की सफलता देखकर बहुत से पत्थरों ने उछलना शुरू कर दिया। आज हमारी अखंडता के आसमान में सुराख ही सुराख हैं।

आजादी को बरस हो गए हैं सत्तर
लेकिन बरसना बंद नहीं हुये पत्थर
मैंने अपनी अस्मिता पर उछाले गए
उस पत्थर से पूछा
तू किधर से आया है, तुझे किसने उछाला है?
यूँ ही बड़ा हो गया या किसी ने पाला है?

बोला, मुझे नहीं पता
तुम्हारी उनकी किस बात पे ठनी है
ये परंपरा तो यहाँ बरसों की बनी है
मैं मुफ़्त में बदनाम हूँ बिना बात के
मैं तो इशारे पर चलता हूँ किसी हाथ के
नहीं मालूम ठिकाने पे हैं या खिसके हैं
इन हाथों के पीछे दिमाग किसके हैं

फिर मैंने हौले से एक हाथ को थामा
और पूछ ही लिया खरामा खरामा
बोला, हम तो निरंकुश और आज़ाद हैं
पके हुए फोड़े का बहता हुआ मवाद हैं
इतिहास की गलती से उपजा हुआ विवाद हैं
आप की ख़ामोशी से भड़कता उन्माद हैं

तब मैंने उन्माद से पूछा क्या चाहते हो?
क्यों मासूम नौजवानों को बहकाते हो?
बोला, हम तो जूनून का बहता एक दरिया हैं
मनुष्य की मूढ़ता के प्रदर्शन का जरिया हैं
हमने ऊँगली पकड़ी, सर चढ़ते चले गए
तुमने रोका नहीं तो हम बढ़ते चले गए

मैं सोच रहा हूँ,
ये कायरता है या हमारा मिजाज़ ही नर्म है
यदि खून में बाकी थोड़ी सी भी शर्म है
ईंट का जवाब पत्थर, पत्थर का पहाड़ से
सिंहपुत्र का परिचय तो होता है दहाड़ से
अहिंसा का त्याग करो, यही वीर का कर्म है
उन हाथों को काट दो, अब यही राष्ट्रधर्म है

हे सत्ताधारी हे राष्ट्र ऋषि
तुम मूक होकर क्यों देख रहे हो
सैनिक की कीमत पर सियासती
रोटियाँ क्यों सेक रहे हो
तुम रोक नहीं रहे पत्थर तो यकीन मानो
वो तुम ही हो जो फेक रहे हो

© - प्रशांत सेठ

Saturday, May 6, 2017

न्याय???

निर्भया कहो या मुझे दामिनी
मैं तुम्हारी वही लाडो
जिससे कभी तुम मिल नहीं पाये
क्योंकि
तुमने देखा ही नहीं
नज़र उठा के आस पास
दम तोड़ती हैं
कितनी निर्भयायें।

सुना है
तुमने मुझे न्याय दिया है
किन्तु
मैं तो जा चुकी हूँ
पाने और खोने की परिधि से
बहुत दूर
न्याय मुझको नहीं
शायद तुमने दिया है खुदको
मेरी कीमत पर लेकिन
आज भी अधूरा सा

मृत्यु देकर
सिर्फ अपराधी को
मुक्त नहीं हो सकते तुम
अपने दायित्व से
चार विषैले फल
तोड़ देने से
इन्साफ नहीं होगा पूरा
सोचो
इस वृक्ष की जड़ कहाँ है
बीज कहाँ है
कौन देता है इसको पोषण
कैसे ऊग आते हैं ये झाड़
सभ्य समाज की धरा पर

ये उगते हैं तब
जब तुम्हें फुरसत नहीं होती
अपनी भूख से,
नहीं नहीं हवस से
फिर ये पनप जाते हैं
पोषित होकर
इसी दूषित वातावरण से
बढ़ जाते हैं बेतरतीब
बिना किसी नियम के
क्योंकि
तुम नहीं कर सके
अपने हिस्से की बारिश

न्याय करना है यदि
थोड़ी सी फाँसी दो
उन माता पिता को
जो नहीं देते
अपनी संतान को कुछ भी
सिवाय उत्पत्ति के
थोड़ी सी फाँसी दो
उस साहित्य और कला को
जो परोस देते हैं
समाज में नग्नता
और बताते हैं खुदको
समाज का दर्पण

थोड़ी सी फाँसी दो
उस शराब को
जिसे पीकर
मनुष्य मनुष्य नहीं रहता
थोड़ी सी फाँसी दो
उस अपराधिक वयस्क मन को
जो छुपा बैठा है
किसी नाबालिग देह में
लेकिन
सबसे पहले फाँसी दो
अपनी मूकदर्शिता को
जो देती है जन्म भी
और साहस भी
इन अपराधों को

बोलो
क्या तुम न्याय कर सकोगे?
दे सकोगे मृत्युदंड
बीज को
जड़ को और वृक्ष को
या फिर तुम्हारे भीतर ही कहीं
छुपकर बैठे
एक नाकारा माली को...??

© - प्रशांत सेठ

Sunday, April 30, 2017

चौराहा

1
तुमने देखा होगा
सीढियाँ चढ़ते हुये
जल्दी जल्दी में
अक्सर
नीचे कुछ छूट जाता है
कई बार
वो होता है मन
कई बार कुछ संकल्प
कभी कभी चरित्र भी
और छूट जाता है हर बार
उम्र भर के लिये
कोई हाथ

यही छूटी हुई चीज़
होती है चाबी
एक बंद दरवाज़े की
जिसके खुलने से खुलती है
आगे की राह
तब विवशता में
उतरना पड़ता है वापस
या फिर
बदल लेना पड़ता है
अपना रास्ता

अक्सर
ये बदला हुआ रास्ता
होता है पहले से अधिक
लंबा और दुष्कर
भटक जाती है तब
लक्ष्य से दृष्टि
खो जाती है फिर
सफ़र की खूबसूरती
और ये रास्ता
कभी नहीं पहुँचता
कहीं भी

2
तुमने देखा होगा
रूठ कर जाते हो जब
किसी अपने से
निकल जाते हो बहुत दूर
एकाकी राह पर
फिर एक दिन
मुड़कर देखते हो
वो
वहाँ नहीं होता

अक्सर
देर हो जाती है
मुड़कर देखने में
क्योंकि
जल्दी नहीं मुड़ती
गुरूर में
अकड़ी हुई गर्दन
जल्दी नहीं लौटते
क्रोध की रफ़्तार में
बढ़े हुये कदम
बाहें नहीं फैला पाते
ज़िद से बँधे हुये
हाथ

समय की लहर
ले जाती है
ह्रदय की शीतलता
छोड़ जाती है
सर के ऊपर कड़ी धूप
नीचे तपती हुई रेत
तब
तुमसे कहते हैं
जलते हुये पैर
वो जूता
फटा सही मगर
बुरा नहीं था

3
तुमने देखा होगा
अपनी ही कहते कहते
अक्सर
नहीं सुन पाते
बहुत करीब से आती
एक दबी दबी सी आवाज़
जो होती है
तुम्हारे ह्रदय की

हर बार
तुम बढ़ जाते हो
गला घोंटकर
इस आवाज़ का
और धीरे धीरे
सूख जाता है समंदर
तुम्हारी आँखों का
फिर तड़प तड़प कर
मर जाती हैं
मछलियाँ एहसास की

शायद
सुन लेते
तो ठहर जाते
या कम कर लेते
ज़िन्दगी की दौड़ में
कामनाओं की रफ़्तार
और
मिला लेते कदम उनसे
जो निकल नहीं पाये
तुम्हारी तरह
ज़रूरतों की भीड़ से

4
तुम नहीं देख पाये
निरर्थकता
उस मंज़िल की
जिसपर तुम खड़े हो
और सार्थकता
उस क्षण की
जो तुम खो चुके हो
तुम चले आये
ख्वाहिशों के बाज़ार में
नहीं जान पाये लेकिन
शेष थीं बटुये में
कितनी साँसें

अब
जब तुम्हारी आँखें बंद हैं
ह्रदय मौन है
बेचैन हैं तब भी
कुछ अधूरी सी इच्छायें
मगर तुम
लेटे हो निष्क्रिय
वो सारे क्षण खोकर
जिनका नाम था
जीवन

इसके पहले
ये कल्पना
यथार्थ हो जाये
देख लो एक बार
वो सब कुछ खोकर
जो पा लिया है
वो सब कुछ पाकर
जो खो दिया है
शायद
तुम समझ सको
अब तक तुम
खो रहे थे व्यर्थ में
खुदको

© - प्रशांत सेठ

Thursday, April 27, 2017

ॐ शांति शांति शांति

क्या ढूँढ़ते हो बरखुरदार
खूनी नक्सलवाद का इलाज
या कश्मीरी पत्थरों का जवाब?
संसद मार्ग पर लेटे हुये
उस अनुभवी बुजुर्ग ने पूछा।
मेरी आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न था
ये बूढ़ा औरों से भिन्न था
मैंने कहा बाबा आप...???

हाँ मुझे पता है,
तुम्हारे दिल में उबाल है
और मन में घुमड़ रहा
वही पुराना सवाल है
आज फिर मैं देख रहा हूँ
तुम्हारे युवा खून को
कल के नेता को और
आज के राजनीतिक भ्रूण को

नहीं पहचाना? मैं वही सिद्धांत हूँ
जिसके ढोल तुम बजाते हो
हरे भगवा लाल सलाम में
जिसके गीत तुम गाते हो
मेरे सर पर पैर रखो
तुम भी आगे बढ़ जाओ
संसद भवन की सीढियाँ
एक ही बार में चढ़ जाओ

लेकिन पहले मेरी आँखों में
इतिहास को पढ़ लो
अपना राजनीतिक भविष्य
सुनहरा सा गढ़ लो
अनुभव को ठुकरा कर यदि
आगे बढ़ जाओगे
सपने कितने भी सजा लो
मंज़िल नहीं पाओगे

जे पी आंदोलन की कथा
मेरे पिता ने सुनाई थी
वो भी यहीं लेटा था
जब इमरजेंसी आई थी
बोफोर्स की कहानी ने
उसके सामने दम तोड़ा था
मेरा बाप आज भी वहीँ है
उन्होंने जहाँ छोड़ा था

मंडल कमीशन के दर्द को
अपनी छाती पर झेला हूँ
मंदिर मस्जिद के तमाशे को
मैं जवानी भर खेला हूँ
जनलोकपाल आंदोलन की
मैं भी एक ईंट हूँ
इन राजनीतिक कौओं की
सूखी हुई बीट हूँ

तुम भी
जनभावनायें उकसाओ
सत्ता का लक्ष्य रखो
बीज कोई और लगाये
फल तुम ही चखो
कोई भी मुद्दा पकड़ो
सिद्धांतो को बिसार दो
समस्या जिंदा रहे
समाधान को मार दो

समाधान के साथ भला
कितनी दूर जाओगे
समस्या से हाथ मिला लो
पुश्तों तक तर जाओगे
सरकारी फण्ड मिलेगा
मिल बाँट कर खाना
सियासत यही कहती है
समस्या मत सुलझाना

इस छोटे से अनुभव में
सीख बहुत बड़ी है
सत्ता बाहें फैलाकर
तुम्हारे लिये खड़ी है
इसी का नाम क्रांति है
बाकी सब भ्रान्ति है
सड़कों पर खून बहे
संसद भवन में शान्ति है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 12, 2017

अनुभूति

वो,
वो नहीं सुनता
मेरे भजन
श्रृंगार युक्त शब्द
नगाड़े का शोर
मंदिर का घंटा
मस्जिद की नमाज़
मेरी अनगिनत माँगें
अनंत इच्छायें
शायद
उसके कान ही नहीं हैं
वो बहरा है

वो,
वो नहीं देखता
मेरे ढकोसले
कोरा ज्ञान
अहंकारपूर्ण प्रदर्शन
मेरे सुख दुःख
पाप और पुण्य
मेरे कृत्य
सही या गलत
शायद
उसकी आँख भी नहीं है
वो अंधा है

वो,
वो नहीं पकड़ता
मेरा हाथ
कठिनाइयों में
नहीं रोकता
चलने से
गलत रास्तों पर
मैं स्वयं
गिरता संभलता हूँ
शायद
उसके हाथ नहीं हैं
वो लूला है

वो,
वो नहीं आता
मेरे पास
बुलाने से भी
ना ही जाता है
मुझसे दूर कहीं
स्थिर है
इसी जगत में
शांत चित्त
शायद
उसके पैर भी नहीं हैं
वो लंगड़ा है

लेकिन,
वो जान लेता है
हर कृत्य के पीछे
मेरा मंतव्य
दिखावों में छुपा
खोखलापन
मेरी दौड़
भूख से लालच तक
नहीं फँसता
मेरे शब्द जाल में
शायद
अंतरदृष्टि रखता है
ईश्वर दृष्टा है

कैसे
समझ लेता है
मेरी पीड़ा
प्रार्थना और पुकार
मन की गहराई में
उपजते भाव
प्रेम का मूक भाष्य
ह्रदय का
निश्छल स्पन्द
शायद
भाव तरंगों से
ईश्वर अनुभूति है

फिर
इन्हीं तरंगों से
जगा देता है
सोया हुआ साहस
और मैं
चल देता हूँ
एक बार फिर
अनिश्चित राह पर
उसके प्रकाश में
निर्भीक और निश्चिन्त
यकीनन
ईश्वर शक्ति है

© - प्रशांत सेठ