Thursday, April 27, 2017

ॐ शांति शांति शांति

क्या ढूँढ़ते हो बरखुरदार
खूनी नक्सलवाद का इलाज
या कश्मीरी पत्थरों का जवाब?
संसद मार्ग पर लेटे हुये
उस अनुभवी बुजुर्ग ने पूछा।
मेरी आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न था
ये बूढ़ा औरों से भिन्न था
मैंने कहा बाबा आप...???

हाँ मुझे पता है,
तुम्हारे दिल में उबाल है
और मन में घुमड़ रहा
वही पुराना सवाल है
आज फिर मैं देख रहा हूँ
तुम्हारे युवा खून को
कल के नेता को और
आज के राजनीतिक भ्रूण को

नहीं पहचाना? मैं वही सिद्धांत हूँ
जिसके ढोल तुम बजाते हो
हरे भगवा लाल सलाम में
जिसके गीत तुम गाते हो
मेरे सर पर पैर रखो
तुम भी आगे बढ़ जाओ
संसद भवन की सीढियाँ
एक ही बार में चढ़ जाओ

लेकिन पहले मेरी आँखों में
इतिहास को पढ़ लो
अपना राजनीतिक भविष्य
सुनहरा सा गढ़ लो
अनुभव को ठुकरा कर यदि
आगे बढ़ जाओगे
सपने कितने भी सजा लो
मंज़िल नहीं पाओगे

जे पी आंदोलन की कथा
मेरे पिता ने सुनाई थी
वो भी यहीं लेटा था
जब इमरजेंसी आई थी
बोफोर्स की कहानी ने
उसके सामने दम तोड़ा था
मेरा बाप आज भी वहीँ है
उन्होंने जहाँ छोड़ा था

मंडल कमीशन के दर्द को
अपनी छाती पर झेला हूँ
मंदिर मस्जिद के तमाशे को
मैं जवानी भर खेला हूँ
जनलोकपाल आंदोलन की
मैं भी एक ईंट हूँ
इन राजनीतिक कौओं की
सूखी हुई बीट हूँ

तुम भी
जनभावनायें उकसाओ
सत्ता का लक्ष्य रखो
बीज कोई और लगाये
फल तुम ही चखो
कोई भी मुद्दा पकड़ो
सिद्धांतो को बिसार दो
समस्या जिंदा रहे
समाधान को मार दो

समाधान के साथ भला
कितनी दूर जाओगे
समस्या से हाथ मिला लो
पुश्तों तक तर जाओगे
सरकारी फण्ड मिलेगा
मिल बाँट कर खाना
सियासत यही कहती है
समस्या मत सुलझाना

इस छोटे से अनुभव में
सीख बहुत बड़ी है
सत्ता बाहें फैलाकर
तुम्हारे लिये खड़ी है
इसी का नाम क्रांति है
बाकी सब भ्रान्ति है
सड़कों पर खून बहे
संसद भवन में शान्ति है

© - प्रशांत सेठ

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