Sunday, April 30, 2017

चौराहा

1
तुमने देखा होगा
सीढियाँ चढ़ते हुये
जल्दी जल्दी में
अक्सर
नीचे कुछ छूट जाता है
कई बार
वो होता है मन
कई बार कुछ संकल्प
कभी कभी चरित्र भी
और छूट जाता है हर बार
उम्र भर के लिये
कोई हाथ

यही छूटी हुई चीज़
होती है चाबी
एक बंद दरवाज़े की
जिसके खुलने से खुलती है
आगे की राह
तब विवशता में
उतरना पड़ता है वापस
या फिर
बदल लेना पड़ता है
अपना रास्ता

अक्सर
ये बदला हुआ रास्ता
होता है पहले से अधिक
लंबा और दुष्कर
भटक जाती है तब
लक्ष्य से दृष्टि
खो जाती है फिर
सफ़र की खूबसूरती
और ये रास्ता
कभी नहीं पहुँचता
कहीं भी

2
तुमने देखा होगा
रूठ कर जाते हो जब
किसी अपने से
निकल जाते हो बहुत दूर
एकाकी राह पर
फिर एक दिन
मुड़कर देखते हो
वो
वहाँ नहीं होता

अक्सर
देर हो जाती है
मुड़कर देखने में
क्योंकि
जल्दी नहीं मुड़ती
गुरूर में
अकड़ी हुई गर्दन
जल्दी नहीं लौटते
क्रोध की रफ़्तार में
बढ़े हुये कदम
बाहें नहीं फैला पाते
ज़िद से बँधे हुये
हाथ

समय की लहर
ले जाती है
ह्रदय की शीतलता
छोड़ जाती है
सर के ऊपर कड़ी धूप
नीचे तपती हुई रेत
तब
तुमसे कहते हैं
जलते हुये पैर
वो जूता
फटा सही मगर
बुरा नहीं था

3
तुमने देखा होगा
अपनी ही कहते कहते
अक्सर
नहीं सुन पाते
बहुत करीब से आती
एक दबी दबी सी आवाज़
जो होती है
तुम्हारे ह्रदय की

हर बार
तुम बढ़ जाते हो
गला घोंटकर
इस आवाज़ का
और धीरे धीरे
सूख जाता है समंदर
तुम्हारी आँखों का
फिर तड़प तड़प कर
मर जाती हैं
मछलियाँ एहसास की

शायद
सुन लेते
तो ठहर जाते
या कम कर लेते
ज़िन्दगी की दौड़ में
कामनाओं की रफ़्तार
और
मिला लेते कदम उनसे
जो निकल नहीं पाये
तुम्हारी तरह
ज़रूरतों की भीड़ से

4
तुम नहीं देख पाये
निरर्थकता
उस मंज़िल की
जिसपर तुम खड़े हो
और सार्थकता
उस क्षण की
जो तुम खो चुके हो
तुम चले आये
ख्वाहिशों के बाज़ार में
नहीं जान पाये लेकिन
शेष थीं बटुये में
कितनी साँसें

अब
जब तुम्हारी आँखें बंद हैं
ह्रदय मौन है
बेचैन हैं तब भी
कुछ अधूरी सी इच्छायें
मगर तुम
लेटे हो निष्क्रिय
वो सारे क्षण खोकर
जिनका नाम था
जीवन

इसके पहले
ये कल्पना
यथार्थ हो जाये
देख लो एक बार
वो सब कुछ खोकर
जो पा लिया है
वो सब कुछ पाकर
जो खो दिया है
शायद
तुम समझ सको
अब तक तुम
खो रहे थे व्यर्थ में
खुदको

© - प्रशांत सेठ

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