निर्भया कहो या मुझे दामिनी
मैं तुम्हारी वही लाडो
जिससे कभी तुम मिल नहीं पाये
क्योंकि
तुमने देखा ही नहीं
नज़र उठा के आस पास
दम तोड़ती हैं
कितनी निर्भयायें।
सुना है
तुमने मुझे न्याय दिया है
किन्तु
मैं तो जा चुकी हूँ
पाने और खोने की परिधि से
बहुत दूर
न्याय मुझको नहीं
शायद तुमने दिया है खुदको
मेरी कीमत पर लेकिन
आज भी अधूरा सा
मृत्यु देकर
सिर्फ अपराधी को
मुक्त नहीं हो सकते तुम
अपने दायित्व से
चार विषैले फल
तोड़ देने से
इन्साफ नहीं होगा पूरा
सोचो
इस वृक्ष की जड़ कहाँ है
बीज कहाँ है
कौन देता है इसको पोषण
कैसे ऊग आते हैं ये झाड़
सभ्य समाज की धरा पर
ये उगते हैं तब
जब तुम्हें फुरसत नहीं होती
अपनी भूख से,
नहीं नहीं हवस से
फिर ये पनप जाते हैं
पोषित होकर
इसी दूषित वातावरण से
बढ़ जाते हैं बेतरतीब
बिना किसी नियम के
क्योंकि
तुम नहीं कर सके
अपने हिस्से की बारिश
न्याय करना है यदि
थोड़ी सी फाँसी दो
उन माता पिता को
जो नहीं देते
अपनी संतान को कुछ भी
सिवाय उत्पत्ति के
थोड़ी सी फाँसी दो
उस साहित्य और कला को
जो परोस देते हैं
समाज में नग्नता
और बताते हैं खुदको
समाज का दर्पण
थोड़ी सी फाँसी दो
उस शराब को
जिसे पीकर
मनुष्य मनुष्य नहीं रहता
थोड़ी सी फाँसी दो
उस अपराधिक वयस्क मन को
जो छुपा बैठा है
किसी नाबालिग देह में
लेकिन
सबसे पहले फाँसी दो
अपनी मूकदर्शिता को
जो देती है जन्म भी
और साहस भी
इन अपराधों को
बोलो
क्या तुम न्याय कर सकोगे?
दे सकोगे मृत्युदंड
बीज को
जड़ को और वृक्ष को
या फिर तुम्हारे भीतर ही कहीं
छुपकर बैठे
एक नाकारा माली को...??
© - प्रशांत सेठ