Saturday, May 6, 2017

न्याय???

निर्भया कहो या मुझे दामिनी
मैं तुम्हारी वही लाडो
जिससे कभी तुम मिल नहीं पाये
क्योंकि
तुमने देखा ही नहीं
नज़र उठा के आस पास
दम तोड़ती हैं
कितनी निर्भयायें।

सुना है
तुमने मुझे न्याय दिया है
किन्तु
मैं तो जा चुकी हूँ
पाने और खोने की परिधि से
बहुत दूर
न्याय मुझको नहीं
शायद तुमने दिया है खुदको
मेरी कीमत पर लेकिन
आज भी अधूरा सा

मृत्यु देकर
सिर्फ अपराधी को
मुक्त नहीं हो सकते तुम
अपने दायित्व से
चार विषैले फल
तोड़ देने से
इन्साफ नहीं होगा पूरा
सोचो
इस वृक्ष की जड़ कहाँ है
बीज कहाँ है
कौन देता है इसको पोषण
कैसे ऊग आते हैं ये झाड़
सभ्य समाज की धरा पर

ये उगते हैं तब
जब तुम्हें फुरसत नहीं होती
अपनी भूख से,
नहीं नहीं हवस से
फिर ये पनप जाते हैं
पोषित होकर
इसी दूषित वातावरण से
बढ़ जाते हैं बेतरतीब
बिना किसी नियम के
क्योंकि
तुम नहीं कर सके
अपने हिस्से की बारिश

न्याय करना है यदि
थोड़ी सी फाँसी दो
उन माता पिता को
जो नहीं देते
अपनी संतान को कुछ भी
सिवाय उत्पत्ति के
थोड़ी सी फाँसी दो
उस साहित्य और कला को
जो परोस देते हैं
समाज में नग्नता
और बताते हैं खुदको
समाज का दर्पण

थोड़ी सी फाँसी दो
उस शराब को
जिसे पीकर
मनुष्य मनुष्य नहीं रहता
थोड़ी सी फाँसी दो
उस अपराधिक वयस्क मन को
जो छुपा बैठा है
किसी नाबालिग देह में
लेकिन
सबसे पहले फाँसी दो
अपनी मूकदर्शिता को
जो देती है जन्म भी
और साहस भी
इन अपराधों को

बोलो
क्या तुम न्याय कर सकोगे?
दे सकोगे मृत्युदंड
बीज को
जड़ को और वृक्ष को
या फिर तुम्हारे भीतर ही कहीं
छुपकर बैठे
एक नाकारा माली को...??

© - प्रशांत सेठ

Sunday, April 30, 2017

चौराहा

1
तुमने देखा होगा
सीढियाँ चढ़ते हुये
जल्दी जल्दी में
अक्सर
नीचे कुछ छूट जाता है
कई बार
वो होता है मन
कई बार कुछ संकल्प
कभी कभी चरित्र भी
और छूट जाता है हर बार
उम्र भर के लिये
कोई हाथ

यही छूटी हुई चीज़
होती है चाबी
एक बंद दरवाज़े की
जिसके खुलने से खुलती है
आगे की राह
तब विवशता में
उतरना पड़ता है वापस
या फिर
बदल लेना पड़ता है
अपना रास्ता

अक्सर
ये बदला हुआ रास्ता
होता है पहले से अधिक
लंबा और दुष्कर
भटक जाती है तब
लक्ष्य से दृष्टि
खो जाती है फिर
सफ़र की खूबसूरती
और ये रास्ता
कभी नहीं पहुँचता
कहीं भी

2
तुमने देखा होगा
रूठ कर जाते हो जब
किसी अपने से
निकल जाते हो बहुत दूर
एकाकी राह पर
फिर एक दिन
मुड़कर देखते हो
वो
वहाँ नहीं होता

अक्सर
देर हो जाती है
मुड़कर देखने में
क्योंकि
जल्दी नहीं मुड़ती
गुरूर में
अकड़ी हुई गर्दन
जल्दी नहीं लौटते
क्रोध की रफ़्तार में
बढ़े हुये कदम
बाहें नहीं फैला पाते
ज़िद से बँधे हुये
हाथ

समय की लहर
ले जाती है
ह्रदय की शीतलता
छोड़ जाती है
सर के ऊपर कड़ी धूप
नीचे तपती हुई रेत
तब
तुमसे कहते हैं
जलते हुये पैर
वो जूता
फटा सही मगर
बुरा नहीं था

3
तुमने देखा होगा
अपनी ही कहते कहते
अक्सर
नहीं सुन पाते
बहुत करीब से आती
एक दबी दबी सी आवाज़
जो होती है
तुम्हारे ह्रदय की

हर बार
तुम बढ़ जाते हो
गला घोंटकर
इस आवाज़ का
और धीरे धीरे
सूख जाता है समंदर
तुम्हारी आँखों का
फिर तड़प तड़प कर
मर जाती हैं
मछलियाँ एहसास की

शायद
सुन लेते
तो ठहर जाते
या कम कर लेते
ज़िन्दगी की दौड़ में
कामनाओं की रफ़्तार
और
मिला लेते कदम उनसे
जो निकल नहीं पाये
तुम्हारी तरह
ज़रूरतों की भीड़ से

4
तुम नहीं देख पाये
निरर्थकता
उस मंज़िल की
जिसपर तुम खड़े हो
और सार्थकता
उस क्षण की
जो तुम खो चुके हो
तुम चले आये
ख्वाहिशों के बाज़ार में
नहीं जान पाये लेकिन
शेष थीं बटुये में
कितनी साँसें

अब
जब तुम्हारी आँखें बंद हैं
ह्रदय मौन है
बेचैन हैं तब भी
कुछ अधूरी सी इच्छायें
मगर तुम
लेटे हो निष्क्रिय
वो सारे क्षण खोकर
जिनका नाम था
जीवन

इसके पहले
ये कल्पना
यथार्थ हो जाये
देख लो एक बार
वो सब कुछ खोकर
जो पा लिया है
वो सब कुछ पाकर
जो खो दिया है
शायद
तुम समझ सको
अब तक तुम
खो रहे थे व्यर्थ में
खुदको

© - प्रशांत सेठ

Thursday, April 27, 2017

ॐ शांति शांति शांति

क्या ढूँढ़ते हो बरखुरदार
खूनी नक्सलवाद का इलाज
या कश्मीरी पत्थरों का जवाब?
संसद मार्ग पर लेटे हुये
उस अनुभवी बुजुर्ग ने पूछा।
मेरी आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न था
ये बूढ़ा औरों से भिन्न था
मैंने कहा बाबा आप...???

हाँ मुझे पता है,
तुम्हारे दिल में उबाल है
और मन में घुमड़ रहा
वही पुराना सवाल है
आज फिर मैं देख रहा हूँ
तुम्हारे युवा खून को
कल के नेता को और
आज के राजनीतिक भ्रूण को

नहीं पहचाना? मैं वही सिद्धांत हूँ
जिसके ढोल तुम बजाते हो
हरे भगवा लाल सलाम में
जिसके गीत तुम गाते हो
मेरे सर पर पैर रखो
तुम भी आगे बढ़ जाओ
संसद भवन की सीढियाँ
एक ही बार में चढ़ जाओ

लेकिन पहले मेरी आँखों में
इतिहास को पढ़ लो
अपना राजनीतिक भविष्य
सुनहरा सा गढ़ लो
अनुभव को ठुकरा कर यदि
आगे बढ़ जाओगे
सपने कितने भी सजा लो
मंज़िल नहीं पाओगे

जे पी आंदोलन की कथा
मेरे पिता ने सुनाई थी
वो भी यहीं लेटा था
जब इमरजेंसी आई थी
बोफोर्स की कहानी ने
उसके सामने दम तोड़ा था
मेरा बाप आज भी वहीँ है
उन्होंने जहाँ छोड़ा था

मंडल कमीशन के दर्द को
अपनी छाती पर झेला हूँ
मंदिर मस्जिद के तमाशे को
मैं जवानी भर खेला हूँ
जनलोकपाल आंदोलन की
मैं भी एक ईंट हूँ
इन राजनीतिक कौओं की
सूखी हुई बीट हूँ

तुम भी
जनभावनायें उकसाओ
सत्ता का लक्ष्य रखो
बीज कोई और लगाये
फल तुम ही चखो
कोई भी मुद्दा पकड़ो
सिद्धांतो को बिसार दो
समस्या जिंदा रहे
समाधान को मार दो

समाधान के साथ भला
कितनी दूर जाओगे
समस्या से हाथ मिला लो
पुश्तों तक तर जाओगे
सरकारी फण्ड मिलेगा
मिल बाँट कर खाना
सियासत यही कहती है
समस्या मत सुलझाना

इस छोटे से अनुभव में
सीख बहुत बड़ी है
सत्ता बाहें फैलाकर
तुम्हारे लिये खड़ी है
इसी का नाम क्रांति है
बाकी सब भ्रान्ति है
सड़कों पर खून बहे
संसद भवन में शान्ति है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, April 12, 2017

अनुभूति

वो,
वो नहीं सुनता
मेरे भजन
श्रृंगार युक्त शब्द
नगाड़े का शोर
मंदिर का घंटा
मस्जिद की नमाज़
मेरी अनगिनत माँगें
अनंत इच्छायें
शायद
उसके कान ही नहीं हैं
वो बहरा है

वो,
वो नहीं देखता
मेरे ढकोसले
कोरा ज्ञान
अहंकारपूर्ण प्रदर्शन
मेरे सुख दुःख
पाप और पुण्य
मेरे कृत्य
सही या गलत
शायद
उसकी आँख भी नहीं है
वो अंधा है

वो,
वो नहीं पकड़ता
मेरा हाथ
कठिनाइयों में
नहीं रोकता
चलने से
गलत रास्तों पर
मैं स्वयं
गिरता संभलता हूँ
शायद
उसके हाथ नहीं हैं
वो लूला है

वो,
वो नहीं आता
मेरे पास
बुलाने से भी
ना ही जाता है
मुझसे दूर कहीं
स्थिर है
इसी जगत में
शांत चित्त
शायद
उसके पैर भी नहीं हैं
वो लंगड़ा है

लेकिन,
वो जान लेता है
हर कृत्य के पीछे
मेरा मंतव्य
दिखावों में छुपा
खोखलापन
मेरी दौड़
भूख से लालच तक
नहीं फँसता
मेरे शब्द जाल में
शायद
अंतरदृष्टि रखता है
ईश्वर दृष्टा है

कैसे
समझ लेता है
मेरी पीड़ा
प्रार्थना और पुकार
मन की गहराई में
उपजते भाव
प्रेम का मूक भाष्य
ह्रदय का
निश्छल स्पन्द
शायद
भाव तरंगों से
ईश्वर अनुभूति है

फिर
इन्हीं तरंगों से
जगा देता है
सोया हुआ साहस
और मैं
चल देता हूँ
एक बार फिर
अनिश्चित राह पर
उसके प्रकाश में
निर्भीक और निश्चिन्त
यकीनन
ईश्वर शक्ति है

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 8, 2017

रफूगर

एक रचना पढ़ने को मिली, जिसमें कवि एक रफूगर से निवेदन करता है की रिश्तों की चादर को रफू कर दो और पहले जैसा बना दो। उस कविता से उपजा एक ख्याल...

रफूगर

आइये बुन देता हूँ
रिश्तों की फटी चादर
शब्द के नाखून से उधड़ा
बिखरा हुआ मन
स्वार्थ की कैंची से कटा
प्रेम का महीन तार
लाइये बना दूँ परिपक्व
संबंधों का संसार

सारे शहर में पूछ लीजिये
मेरा बहुत नाम है
बस यूँ समझ लीजिये
घर की दुकान है
आप भी देखिये हुनर
मेरी जादूगरी का
कुशल कारीगर हूँ
रिश्तों की रफूगरी का

बना सकता हूँ मैं
बिगड़ी हुई बात को
जगा सकता हूँ मैं
सोये हुये जज़्बात को
सुबह का इंतज़ार
मत कीजिये हुज़ूर
मैं सूरज उगा सकता हूँ
आधी रात को

यूँ तो और भी रफूगर
शहर में मिल जायेंगे
झूठी मुस्कुराहटों से
गले मिलवायेंगे
कहने को गिले शिकवे
सारे धुल जायेंगे
रफू तो हो जायेगी साहब
दाग रह जायेंगे

आपकी चादर
पहले से बेहतर होगी
लेकिन मज़दूरी
काम से पेश्तर होगी
एक बार भरोसा कीजिए
इस खाकसार पर
नहीं तो चढ़ा आइये चादर
विश्वास की मज़ार पर

अरे अरे लेकिन ये क्या
यहाँ चादर छोड़कर मत जाइये
शिकायतों की मटकी भी
वापस उठाइये
छोड़ना है तो छोड़ जाइये अपना
क्रोध और गुरूर
मेरी मज़दूरी भी केवल
इतनी सी है हुज़ूर

छोड़ जाइये कड़वाहटें
ले जाइये सुकून
आइये छाँट दूँ
शब्द के पैने नाखून
भावों की जादुई सुई देता हूँ
रिश्ते आप खुद टाँक लीजिये
इस दुकान का पता बस यही है
ज़रा सा भीतर झाँक लीजिये

© - प्रशांत सेठ

Thursday, March 2, 2017

गर्दभ उवाच

गर्दभ उवाच

भाईसाहब, ज़रा सुनिये
उसने मुझे पीछे से टोका
मैं थोड़ा सा चौंका
पता नहीं आज किस्मत में क्या बदा था
मुड़कर देखा तो एक खूबसूरत गधा था

दरअसल गधा एक महान विभूति है
इस कौम से मुझे हमेशा सहानुभूति है
मैंने इंसानी गुरूर के विरुद्ध एक काम किया
और उसके गधत्व को झुककर प्रणाम किया

वह बोला,
आजकल राजनीति में हम ही हम छाये हैं
हम धोबीघाट से बहुत आगे निकल आये हैं
आपके एक वोट की दरकार है
अब हमको भी बनानी सरकार है

नाम धन सत्ता सम्मान पाने का
क्या हमको हक़ नहीं है चुने जाने का
बताइये हमारे अंदर कौन सी कमी है
सारी सियासत गधों पर ही तो जमी है

यही गधत्व जब मतदाता में समाता है
तो भ्रष्टाचार चुनाव जीत जाता है
जब नेता मुफ़्त की योजनाओं से लुभाता है
तो आपके भीतर के गधत्व को ही चराता है

आपके बच्चे भूखे हैं, कुपोषित हैं
वो आपको बताते हैं, आप शोषित हैं
70 बरस से आप वहीँ के वहीँ हैं
योजनायें घोषित थीं, घोषित हैं

कोई बताता है खतरे में तुम्हारा धर्म है
ये झंडा उठाओ अगर थोड़ी सी भी शर्म है
और तुम धीरे से वोट बैंक बन जाते हो
उसपर तुर्रा ये के गधा हमें बताते हो

हम पूरे होश में हैं, सिर्फ जोश नहीं है
हम सफ़ेद ज़रूर हैं, सफ़ेदपोश नहीं हैं
हम में और उनमें बड़े फर्क हैं
वो काल्पनिक स्वर्ग, हम यथार्थवादी नर्क हैं

वो देश को पचाकर भी रुष्ट हैं
हम रूखा सूखा खाकर संतुष्ट हैं
हम कर्तव्यवादी हैं, अधिकारवादी नहीं है
हम नैसर्गिक सफ़ेद हैं, कोई खादी नहीं है

दरअसल भावुकता ही वो तत्व है
जिसका दूसरा नाम गधत्व है
और ये आपके अंदर कूट कूट कर समाई है
इसलिए हम गधों को उम्मीद नज़र आई है

पंजा ना कमल ना झाड़ू न हत्थी
हमारा चुनाव चिह्न है खालिस दुलत्ती
सत्ता पाकर हम भी आपको दुलत्ती मारेंगे
आप किसी को भी चुनिये, आप ही हारेंगे

आप अपने वोट को मत बेकार कीजिये
हमारे प्रेमपूर्ण निवेदन को स्वीकार लीजिये
भौं भौं बहुत सुनी होगी, अब ढेंचू भी सुनिये
अपने गधत्वपूर्ण वोट से, गधों को ही चुनिये

© - प्रशांत सेठ

Wednesday, March 1, 2017

दो दीवाने

लोकेश नदीश और प्रशांत सेठ
दो दीवाने शहर में....

तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

©® लोकेश नदीश
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मैं आऊँगा लेकर
हौसलों का मिस्त्री
तुम देना मुझे
अरमानो का कॉन्ट्रैक्ट
फिर खड़ा करेंगे
इन्ही खंडहरों में
इन्ही अधपकी ईंटों से
सपनों का नया महल

मैं आऊँगा लेकर
विश्वास की सीमेंट
घोलकर इन्ही अश्कों में
बनायेंगे हम गारा
पाट देंगे मिलकर
प्रेम के पलस्तर से
रिश्तों में पड़ी
ये चौड़ी दरारें

तुम सहेज कर रखना
मेरे आने तक
ये खँडहर सी यादें
टूटी हुई उम्मीदें
बिखरे बिखरे एहसास
दरारों का दर्द
तड़प के आँसू
और
बचा खुचा अस्तित्व

© - प्रशांत सेठ