लोकेश नदीश और प्रशांत सेठ
दो दीवाने शहर में....
तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो
©® लोकेश नदीश
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मैं आऊँगा लेकर
हौसलों का मिस्त्री
तुम देना मुझे
अरमानो का कॉन्ट्रैक्ट
फिर खड़ा करेंगे
इन्ही खंडहरों में
इन्ही अधपकी ईंटों से
सपनों का नया महल
मैं आऊँगा लेकर
विश्वास की सीमेंट
घोलकर इन्ही अश्कों में
बनायेंगे हम गारा
पाट देंगे मिलकर
प्रेम के पलस्तर से
रिश्तों में पड़ी
ये चौड़ी दरारें
तुम सहेज कर रखना
मेरे आने तक
ये खँडहर सी यादें
टूटी हुई उम्मीदें
बिखरे बिखरे एहसास
दरारों का दर्द
तड़प के आँसू
और
बचा खुचा अस्तित्व
© - प्रशांत सेठ
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