गर्दभ उवाच
भाईसाहब, ज़रा सुनिये
उसने मुझे पीछे से टोका
मैं थोड़ा सा चौंका
पता नहीं आज किस्मत में क्या बदा था
मुड़कर देखा तो एक खूबसूरत गधा था
दरअसल गधा एक महान विभूति है
इस कौम से मुझे हमेशा सहानुभूति है
मैंने इंसानी गुरूर के विरुद्ध एक काम किया
और उसके गधत्व को झुककर प्रणाम किया
वह बोला,
आजकल राजनीति में हम ही हम छाये हैं
हम धोबीघाट से बहुत आगे निकल आये हैं
आपके एक वोट की दरकार है
अब हमको भी बनानी सरकार है
नाम धन सत्ता सम्मान पाने का
क्या हमको हक़ नहीं है चुने जाने का
बताइये हमारे अंदर कौन सी कमी है
सारी सियासत गधों पर ही तो जमी है
यही गधत्व जब मतदाता में समाता है
तो भ्रष्टाचार चुनाव जीत जाता है
जब नेता मुफ़्त की योजनाओं से लुभाता है
तो आपके भीतर के गधत्व को ही चराता है
आपके बच्चे भूखे हैं, कुपोषित हैं
वो आपको बताते हैं, आप शोषित हैं
70 बरस से आप वहीँ के वहीँ हैं
योजनायें घोषित थीं, घोषित हैं
कोई बताता है खतरे में तुम्हारा धर्म है
ये झंडा उठाओ अगर थोड़ी सी भी शर्म है
और तुम धीरे से वोट बैंक बन जाते हो
उसपर तुर्रा ये के गधा हमें बताते हो
हम पूरे होश में हैं, सिर्फ जोश नहीं है
हम सफ़ेद ज़रूर हैं, सफ़ेदपोश नहीं हैं
हम में और उनमें बड़े फर्क हैं
वो काल्पनिक स्वर्ग, हम यथार्थवादी नर्क हैं
वो देश को पचाकर भी रुष्ट हैं
हम रूखा सूखा खाकर संतुष्ट हैं
हम कर्तव्यवादी हैं, अधिकारवादी नहीं है
हम नैसर्गिक सफ़ेद हैं, कोई खादी नहीं है
दरअसल भावुकता ही वो तत्व है
जिसका दूसरा नाम गधत्व है
और ये आपके अंदर कूट कूट कर समाई है
इसलिए हम गधों को उम्मीद नज़र आई है
पंजा ना कमल ना झाड़ू न हत्थी
हमारा चुनाव चिह्न है खालिस दुलत्ती
सत्ता पाकर हम भी आपको दुलत्ती मारेंगे
आप किसी को भी चुनिये, आप ही हारेंगे
आप अपने वोट को मत बेकार कीजिये
हमारे प्रेमपूर्ण निवेदन को स्वीकार लीजिये
भौं भौं बहुत सुनी होगी, अब ढेंचू भी सुनिये
अपने गधत्वपूर्ण वोट से, गधों को ही चुनिये
© - प्रशांत सेठ
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