Wednesday, March 8, 2017

रफूगर

एक रचना पढ़ने को मिली, जिसमें कवि एक रफूगर से निवेदन करता है की रिश्तों की चादर को रफू कर दो और पहले जैसा बना दो। उस कविता से उपजा एक ख्याल...

रफूगर

आइये बुन देता हूँ
रिश्तों की फटी चादर
शब्द के नाखून से उधड़ा
बिखरा हुआ मन
स्वार्थ की कैंची से कटा
प्रेम का महीन तार
लाइये बना दूँ परिपक्व
संबंधों का संसार

सारे शहर में पूछ लीजिये
मेरा बहुत नाम है
बस यूँ समझ लीजिये
घर की दुकान है
आप भी देखिये हुनर
मेरी जादूगरी का
कुशल कारीगर हूँ
रिश्तों की रफूगरी का

बना सकता हूँ मैं
बिगड़ी हुई बात को
जगा सकता हूँ मैं
सोये हुये जज़्बात को
सुबह का इंतज़ार
मत कीजिये हुज़ूर
मैं सूरज उगा सकता हूँ
आधी रात को

यूँ तो और भी रफूगर
शहर में मिल जायेंगे
झूठी मुस्कुराहटों से
गले मिलवायेंगे
कहने को गिले शिकवे
सारे धुल जायेंगे
रफू तो हो जायेगी साहब
दाग रह जायेंगे

आपकी चादर
पहले से बेहतर होगी
लेकिन मज़दूरी
काम से पेश्तर होगी
एक बार भरोसा कीजिए
इस खाकसार पर
नहीं तो चढ़ा आइये चादर
विश्वास की मज़ार पर

अरे अरे लेकिन ये क्या
यहाँ चादर छोड़कर मत जाइये
शिकायतों की मटकी भी
वापस उठाइये
छोड़ना है तो छोड़ जाइये अपना
क्रोध और गुरूर
मेरी मज़दूरी भी केवल
इतनी सी है हुज़ूर

छोड़ जाइये कड़वाहटें
ले जाइये सुकून
आइये छाँट दूँ
शब्द के पैने नाखून
भावों की जादुई सुई देता हूँ
रिश्ते आप खुद टाँक लीजिये
इस दुकान का पता बस यही है
ज़रा सा भीतर झाँक लीजिये

© - प्रशांत सेठ

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