Saturday, April 23, 2016

पागल कुत्ता

मेरे मोहल्ले में पागल एक कुत्ता आ गया
सारी गली में सन्नाटा छा गया
बच्चे बूढ़े जवान दुबक गए घरों में डरकर
और कुत्ता घूम रहा ऐसे, जैसे सिकंदर

हम विचारक कहलाते हैं
हर समस्या में टांग अड़ाते हैं
अपनी समझ से सुलझाते हैं
लोग कहते हैं हम उलझाते हैं
हमको मिली है यहाँ कविवर की उपाधि
हम खुद को दवा समझते हैं, लोग कहते हैं व्याधि

उधर किसी का दिमाग झनझनाया
इधर मेरा फोन घनघनाया
बोला आप बड़े दिलेर हैं
बातों के शेर हैं
इस कुत्ते के सवालों का दीजिये जवाब
इसे बताइए, एक गली में एक ही रहेगा जनाब

मै बोला, इसका पागलपन तो पूरा है
हमारा अभी अधूरा है
समझाता हूँ फिर भी हाथ जोड़कर
महाराज, चले जाओ मोहल्ला छोड़कर
नहीं मानेगा तो कविता सुनाऊंगा
कुत्ता है तो क्या हुआ इसे भी सताऊंगा

हमको पूरा विश्वास है
हमारी प्रजाति भी ख़ास है
ये सिर्फ भोंक सकता है काट सकता है
हमारी तरह ज्ञान कहाँ बांट सकता है
कब तक रहेगा कवि और कविता के बीच में
खुद ही मर जायेगा, हीनता और खीज में

वो बोला बस कीजिये अब सह नहीं सकता
मुश्किल ये है आप से कुछ कह नहीं सकता
आप संकटमोचन ना बनिए
वैद्य का रोल निभाइए
हिमालय तो ला सकते नहीं
जड़ी का पता ही बताइए

हमने कहा फिर एक काम कीजिये
समस्या की जड़ पर ध्यान दीजिये
कहीं से थोडा सा पानी लाइए
ना मिले तो मोहल्ले में कुआँ खुदवाइये
ये कुत्ता पागल है, पानी से डरता है
वहीँ रहता है जहाँ इंसान का पानी मरता है

ये कुत्ता है टैक्स चुराता व्यापारी
ये कुत्ता है रिश्वत लेता अधिकारी
ये कुत्ता है निरंकुश बेख़ौफ़ अपराधी
सुरक्षा जिसको देती है खादी
ये कुत्ता है देश का नशेड़ी नौजवान
ये कुत्ता है मेरे भाई, सत्ता का अभिमान

हम बुद्धिजीवी हैं,  बातों के पहलवान
हमसे उम्मीद मत रखना श्रीमान
तुम ही डर छोडो, जगाओ अपना स्वाभिमान
वरना ये मोहल्ला भी हो जाएगा हिंदुस्तान
फिर कहते रहना मेरा भारत महान
मेरा भारत महान मेरा भारत महान

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, April 12, 2016

द्रौपदी

जीवन महाभारत है तो इसमें हमारा पात्र कौन सा है?

हमारा कोई एक पात्र नहीं है वरन सारे पात्र हमारे ही भीतर हैं। द्रौपदी का संदर्भ लेकर, उस युग की कथा से इस युग की व्यथा को जोड़ती एक रचना...


द्रौपदी

मन के पांच टुकड़े कर देखो
किसको सहेजो किसको फेंको
उससे पूछो, जिसने पिया गरल है
स्त्री होना, क्या इतना सरल है?

माँ बहन बेटी और पत्नी भी
एक अंश खुद अपनी भी
टुकड़े टुकड़े अस्तित्व जिसका है
द्रौपदी सा जीवन किसका है?

पुत्रधर्म तो तुमने निभाया
क्यों बँटी फिर मेरी काया?
हर बार धर्म की बलिवेदी पर
मैंने ही क्यों मान गंवाया?

अहम् तुम्हारा द्यूत खेलता
मेरा सतीत्व उपहास झेलता
पौरुष ने फेके हैं पासे
चीर मेरा दोषी है कहाँ से?

युगों से सागर की तलाश में
उदगम से भटकी एक नदी है
इन प्रश्नों की अग्नि में जलती
आज भी वहीँ खड़ी द्रौपदी है

मेरी व्यथा के इस बोझ को
क्या आज तुम स्वीकार करोगे?
इन प्रश्नों का उत्तर देकर
क्या मुझ पर उपकार करोगे?

नहीं!
आज निरुत्तर मौन हूँ मैं
खुद ही पूछ रहा, कौन हूँ मैं
भूल गया हूँ देह नश्वर है
स्मृत नहीं है, कौन ईश्वर है

इच्छाओं के द्यूत में फँसकर
भोग रहा हूँ नियति पे हँसकर
किसी कर्ण का तिरस्कार किया है
हाँ मैंने अहंकार किया है

पांच पांडव सी पंच इन्द्रियां
देह द्रौपदी सी बँट रही है
ह्रदय भीतर एक महाभारत
कदाचित इसलिये घट रही है

काल खींच रहा बन दुशासन
चीर श्वांस का घट रहा है
कर्म लाचार, विवश है संकल्प
राह केशव की तक रहा है

अपूर्ण ज्ञान ले उतरा रण में
गूढ़ पहेली बूझ रहा है
और जीवन के चक्रव्यूह में
मन अभिमन्यु सा जूझ रहा है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, April 10, 2016

बस एक कदम और

कौन कहता है पिता जन्म नहीं देता। मातृत्व का अर्थ यदि संतान को जन्म देना है तो संतान के ह्रदय में आशा और साहस को निरंतर जन्म देना ही पितृत्व है।

पितृत्व का दायित्व निभाते हुए जन्मी यह रचना समर्पित है उन सभी बच्चों को जिनकी परीक्षाओं का परिणाम आशा के अनुरूप नहीं है। इस संदेश के साथ की लगनशील व्यक्ति के जीवन में विफलता जैसी कोई चीज़ नहीं होती क्योंकि कभी आप लक्ष्य प्राप्त कर रहे होते हैं तो कभी ज्ञान।

बस एक कदम और...

विफलता से ले सबक तुम
बाधाओं को चूर करो
अपनी कमियों को पहचानो
फिर उनको तुम दूर करो

मन के रथ को तुम अपने
श्रम के अश्व से खींचो तो
पसीने की बूंदों से निज
स्वप्न की बगिया सींचो तो
अवरोधों का पर्वत तोड़ो
स्वयं को मज़दूर करो
विफलता से....

सुख छाँव का तब जानोगे
जब देखी हो तपती धूप
मन में ये चिंतन रखो तो
विफलता है ज्ञान स्वरुप
शंकाओं को, हर डर को
जीवन से काफूर करो
विफलता से....

प्रथम प्रयास में तीर कोई
लक्ष्य नहीं भेद पाता है
सतत परिश्रम से धनुर्धर
अर्जुन सा बन जाता है
क्षणिक सुख का मोह त्यागो
नित्य साधना ज़रूर करो
विफलता से....

एक ठोकर से धावक की
दौड़ नहीं रुक जाती है
एक पराजय से वीर की
ग्रीवा नहीं झुक जाती है
दो कदम पीछे हटकर
प्रहार फिर भरपूर करो
विफलता से....

वर्तमान यदि विफल हुआ है
तो उसको हो जाने दो
स्वप्न कल का किन्तु आँख से
तुम अपनी मत जाने दो
दूनी क्षमता और लगन से
पुनः प्रयत्न जरूर करो
विफलता से....

विषमता से लड़कर पहले
बल का अर्जन करता है
बीज कोई अथक श्रम से
नव सृजन तब करता है
कल के वृक्ष, पूरा तुम भी
सृष्टि का दस्तूर करो
विफलता से....

टेढ़े मेढ़े दुर्गम पथ पर
निराशा मन में छाये जब
दूर दूर तक राह कहीं भी
दृष्टि में ना आये तब
लक्ष्य को आराध्य बनाओ
अंतर्मन को सूर करो
विफलता से....

कड़ी धूप के बाद मिलती
बारिश की ठंडी फुहार है
घुमड़ घुमड़ कर मेघ कहते
देखो सावन तैयार है
पंख फैलाओ सतरंगी तुम
और मन को मयूर करो
विफलता से....

© - प्रशांत सेठ


Thursday, March 24, 2016

होली में विचार करें

यूँ तो जीवन स्वयं ही उत्सव है। और ऐसे में इस रंगोत्सव का आगमन। विविध रंग लेकर आया ये त्यौहार, मौसम बदलने का संदेश भी साथ लाता है। फिर भी मात्र परम्पराओं को निभाने से उत्सव उत्सव नहीं बनता। उत्सव तो वह है जो जीवन की नीरसता को समाप्त कर, आनंद को उत्पन्न कर दे। और भीतर आनंद उत्पन्न करने के प्रयास में कुछ नवीन विचारों ने जन्म लिया।


होली का त्यौहार हमारे आपके जीवन में खुशियों के रंग भर सके, इसके लिए मेरी निवेदनात्मक शुभकामनाओं पर ....

!! होली में विचार करें !!

प्रकृति का श्रृंगार है ये
फागुन का उपहार है ये
जीवन में रंगों की आज
विविधता स्वीकार करें
होली को त्यौहार करें

हरे तुम हो लाल हम हैं
अबीर तुम गुलाल हम हैं
एक दूजे के रंग में रंगें
पिचकारी में प्यार भरें
होली को त्यौहार करें

दुःख में निहित सुख को जानें
सुख में छुपा दुःख पहचानें
मौसम की ये आँख मिचोली
आओ अंगीकार करें
होली को त्यौहार करें

वक़्त से पहले हारें क्यों
सपनों को हम मारें क्यों
समय की करवट का हम
थोडा तो इंतज़ार करें
होली को त्यौहार करें

लक्ष्य बहुत दूर है माना
रस्ता भी है अनजाना
थकने से और रुकने से
आओ हम इनकार करें
होली को त्यौहार करें

कुछ एहसास सो गए हैं
कुछ रिश्ते भी खो गए हैं
प्रेम की एक नौका लेकर
द्वेष का दरिया पार करें
होली को त्यौहार करें

स्याह रंग की कुछ यादें हैं
कड़वी सी कुछ सौगातें हैं
दहन करें उनको अग्नि में
खुद पर ये उपकार करें
होली को त्यौहार करें

© - प्रशांत सेठ

Sunday, March 13, 2016

धर्म-द्वन्द

लो भैया!! अब ये पसर गए की भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। जिनके अपने ईमान का ठिकाना नहीं है, वो ठेकेदार बने बैठे हैं धर्म के। और इन ठेकेदारों (चाहे वो भगवाचन्द हों या हरीमुल्ला) का तथाकथित धर्म जरा जरा सी बात में खतरे में पड़ने लगता है। और ये मिटटी के क्षणभंगुर पुतले, धर्मरक्षक होने का दावा ठोकने लगते हैं। सच तो ये है की यदि ये लोग जहर ना उगलें तो इनका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

सुनो हे धर्म के ठेकेदार!! तुम्हारा धर्म एक रंगी है इसलिये खतरे में पड़ जाता है। क्योंकि अन्य रंग तुम्हें स्वीकार नहीं हैं और अन्य रंगों को तुम। सच तो ये है कि वास्तविक धर्म कहीं भी कभी भी खतरे में नहीं है। धर्म तो वह है जो इंद्रधनुष के सातों रंग को स्वीकार करता है। जो कुछ भी सृष्टा ने रचा है, उसे स्वीकार्य होता है। प्रकृति में विविधता तुम्हारे स्वीकार ना करने से नष्ट नहीं होगी। वैसे भी किसी वस्तु की रक्षा करने या नष्ट करने के लिए उसके स्थान का ज्ञान होना आवश्यक है। तुम क्या किसी धर्म की रक्षा करोगे या अन्य धर्मों को नष्ट करोगे? धर्म के मर्म की बात छोडो, तुम्हें तो ये भी नहीं पता कि हमारा धर्म रहता कहाँ है।

हमारा धर्म रहता है हमारे आचरण में, विचारों में, आस्था में। और ये तुम्हारे मिटाये से ना मिटेगा। किसी के मिटाये से ना मिटेगा। ये मिटेगा जब हम स्वयं ही धर्म विमुख आचरण करेंगे। और तब भी वह मिटेगा तो मात्र हमारे जीवन से, संसार से नहीं। हमारे धर्म को यदि खतरा है तो हम ही से। वैश्विक धर्म तो सत्य है, इसलिये सनातन है और अनश्वर है।

इसी बात पर एक गरिष्ठ सी रचना। गरिष्ठ इसलिये क्योंकि मुझे मालूम है ये तुम्हें हजम नहीं होगी।

उन्माद मत बनाओ रण का
विषय है ये अंतःकरण का
निज आस्था और प्रण का
धर्म विषय है आचरण का

ना अर्जुन का ना ही कर्ण का
ना जाति का ना ही वर्ण का
धर्म विषय नहीं हार जीत का
ये विषय है निज समर्पण का

मार्ग है मुक्ति के वरण का
और बंधनों के हरण का
जीवन का भी अर्थ यही है
यही तात्पर्य है मरण का

भटके हुए पथिक को जैसे
तरुवर दे विश्वास शरण का
धर्म वही शक्ति है जैसे
बल होता है माँ के चरण का

देखो गौर से देह नश्वर है
त्यागो अहंकार एक ज्वर है
रक्षक होना मिथ्या भ्रम है
मनुज कौन सा यहाँ अमर है?

सुनो भीतर उपजता स्वर है
सनातन सत्य ये अनश्वर है
धर्म सदा रक्षित है क्योंकि
रक्षक उसका स्वयं ईश्वर है

© - प्रशांत सेठ

Tuesday, March 8, 2016

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ...

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तंत्र देवताः"

सुना है आज महिला दिवस है। होगा!
मेरे लिए तो ऐसा कोई दिन नहीं है जिस दिन स्वयं को किसी नारी का ऋणी ना पाया हो। माँ, बहन, बेटी, पत्नी इनके बिना अस्तित्व ही संभव नहीं है। मैं क्या, आप क्या, स्वयं सृष्टि का निर्माता भी अपनी इस रचना से उपकृत होगा।

नारी यानि सृजन, नारी यानि पोषण, नारी यानि जीवन। नारीत्व को धन्यवाद स्वरुप, एक पुरानी रचना आज दोबारा साझा कर रहा हूँ....

नारी

बहुत की है कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूँ तो तुमपर लिखना
मेरी तो औकात नहीं है

विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम हो
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है

संस्कारों की जननी तुम हो
मानवता की तुम शिल्पी हो
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही जात नहीं है

भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा हो तुम लक्ष्मी हो
अबला जैसी बात नहीं है

सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है

सृष्टि का श्रृंगार भी तुम हो
हर रचना का सार भी तुम हो
सात रंग और सात सुरों का
ऐसा कहीं अनुपात नहीं है

प्रिया का भी काजल तुम हो
कभी माँ का आँचल तुम हो
प्रेम के इस भाष्य से बढ़कर
ईश्वर का संवाद नहीं है

© - प्रशांत सेठ

Sunday, March 6, 2016

यदा यदा ही धर्मस्य .....

हमने तो सुना था की जब जब धर्म की हानि होगी तब तब कन्हैया का अवतार होगा। मगर हे केशव, ये कैसा कन्हैया है? भारतीय राजनीति में इसका अवतरण भी जेल जाकर ही हुआ है। और अबकी बार तो प्रायोजक भी साथ हैं और मीडिया भी। अभी बाल अवस्था में है, इसलिये थोडा चंचल है। कल जब बड़ा होगा (क्षमा कीजियेगा "बड़ा बना दिया जायेगा") तो महाभारत रचेगा। इसने भी सत्ताधीशों को ही चुनौती दी है। फल (जेल) की चिंता किये बगैर कर्म (राजद्रोह) कर रहा है। इसके रथ पर भी पंच दलीय पांडव सवार होकर युद्ध कर रहे हैं। कल ये भी सत्तासीन कौरवों से, विस्थापित आतंकवादियों के लिए पांच गाँव (कश्मीर) मांगेगा (विस्थापित इसलिये क्योंकि इन आतंकवादियों का जन्मदाता देश ही इन्हें अपना मानने से इनकार कर देता है)। यही एक घंटे का उदबोधन गीता कहलायेगा और JNU कहलायेगा कुरुक्षेत्र। जीत हार का तो पता नहीं, लेकिन एक बात तय है कि इस तथाकथित राष्ट्रधर्म के युद्ध में चीरहरण होगा तो सिर्फ भारत माँ का। ये कैसी लीला है प्रभु?

सुनो वत्स!
इतिहास गवाह है की मैंने कभी पुरानी स्क्रिप्ट नहीं दोहराई। हर अवतार में नयी स्क्रिप्ट लेकर आता हूँ। क्योंकि मुझे पहले ही वह मंत्र पता है "नक्कालों से सावधान"। ये वैसा ही नकली कन्हैया है, जैसा नकली तुम्हारा (राष्ट्र) धर्म है। इसलिये मेरी नई घोषणा सुनो।

"जब जब धर्म के नकली स्वरुप को आचरण में धारण करते रहोगे, तब तब नकली अवतार होते रहेंगे। जब जब निजी मान्यताओं को धर्म बताकर दूसरों पर थोपोगे तब तब (राष्ट्र) धर्म की हानि होती रहेगी। ऐसे किसी भी धर्म को राष्ट्र और मानवता से ऊपर रखोगे तो ऐसे ही कन्हैया (कुमार) और (आशा) राम उत्पन्न होते रहेंगे।"

अत: इस कलयुग में असली अवतार की प्रतीक्षा करो और तब तक नकली का भजन जपो। और हाँ, अपने भजन में उन तत्वों का भी गुणगान करना मत भूलना जिन्होंने ऐसे तमाम कलयुगी कन्हैयाओं के अवतरण में मुख्य भूमिका निभाई है।

जो आज्ञा प्रभु!

प्रभु स्वप्न में आज्ञा देकर अंतर्ध्यान हो गए और हमने इन कलयुगी कन्हैयाओं की शान में एक भजन टाइप का रच डाला। आइये जाप करें...

हाथी घोड़ा पालकी
जय कन्हैयालाल की

इशरत के सवाल की
आरक्षण के भूचाल की
JNU के बवाल की
जय बोलो कन्हैया लाल की

कोरे बज रहे गाल की
टेढ़ी मेढ़ी चाल की
दिल्ली के नटवरलाल की
जय बोलो ....वाल की

धोती के रुमाल की
खाल निकाले बाल की
नित नये नये धमाल की
जय बोलो मीडियाई चौपाल की

कर्ज से जुटाये माल की
सेंसेक्स के उछाल की
माल्या के कमाल की
जय बोलो कॉर्पोरेट कंगाल की

सेकुलरिज्म के जाल की
धर्म के इस्तेमाल की
जी के इस जंजाल की
जय बोलो लोकतंत्र के हाल की

© - प्रशांत सेठ