जीवन महाभारत है तो इसमें हमारा पात्र कौन सा है?
हमारा कोई एक पात्र नहीं है वरन सारे पात्र हमारे ही भीतर हैं। द्रौपदी का संदर्भ लेकर, उस युग की कथा से इस युग की व्यथा को जोड़ती एक रचना...
हमारा कोई एक पात्र नहीं है वरन सारे पात्र हमारे ही भीतर हैं। द्रौपदी का संदर्भ लेकर, उस युग की कथा से इस युग की व्यथा को जोड़ती एक रचना...
द्रौपदी
मन के पांच टुकड़े कर देखो
किसको सहेजो किसको फेंको
उससे पूछो, जिसने पिया गरल है
स्त्री होना, क्या इतना सरल है?
माँ बहन बेटी और पत्नी भी
एक अंश खुद अपनी भी
टुकड़े टुकड़े अस्तित्व जिसका है
द्रौपदी सा जीवन किसका है?
पुत्रधर्म तो तुमने निभाया
क्यों बँटी फिर मेरी काया?
हर बार धर्म की बलिवेदी पर
मैंने ही क्यों मान गंवाया?
अहम् तुम्हारा द्यूत खेलता
मेरा सतीत्व उपहास झेलता
पौरुष ने फेके हैं पासे
चीर मेरा दोषी है कहाँ से?
किसको सहेजो किसको फेंको
उससे पूछो, जिसने पिया गरल है
स्त्री होना, क्या इतना सरल है?
माँ बहन बेटी और पत्नी भी
एक अंश खुद अपनी भी
टुकड़े टुकड़े अस्तित्व जिसका है
द्रौपदी सा जीवन किसका है?
पुत्रधर्म तो तुमने निभाया
क्यों बँटी फिर मेरी काया?
हर बार धर्म की बलिवेदी पर
मैंने ही क्यों मान गंवाया?
अहम् तुम्हारा द्यूत खेलता
मेरा सतीत्व उपहास झेलता
पौरुष ने फेके हैं पासे
चीर मेरा दोषी है कहाँ से?
युगों से सागर की तलाश में
उदगम से भटकी एक नदी है
इन प्रश्नों की अग्नि में जलती
आज भी वहीँ खड़ी द्रौपदी है
मेरी व्यथा के इस बोझ को
क्या आज तुम स्वीकार करोगे?
इन प्रश्नों का उत्तर देकर
क्या मुझ पर उपकार करोगे?
नहीं!
आज निरुत्तर मौन हूँ मैं
खुद ही पूछ रहा, कौन हूँ मैं
भूल गया हूँ देह नश्वर है
स्मृत नहीं है, कौन ईश्वर है
इच्छाओं के द्यूत में फँसकर
भोग रहा हूँ नियति पे हँसकर
किसी कर्ण का तिरस्कार किया है
हाँ मैंने अहंकार किया है
पांच पांडव सी पंच इन्द्रियां
देह द्रौपदी सी बँट रही है
ह्रदय भीतर एक महाभारत
कदाचित इसलिये घट रही है
काल खींच रहा बन दुशासन
चीर श्वांस का घट रहा है
कर्म लाचार, विवश है संकल्प
राह केशव की तक रहा है
अपूर्ण ज्ञान ले उतरा रण में
गूढ़ पहेली बूझ रहा है
और जीवन के चक्रव्यूह में
मन अभिमन्यु सा जूझ रहा है
© - प्रशांत सेठ
नहीं!
आज निरुत्तर मौन हूँ मैं
खुद ही पूछ रहा, कौन हूँ मैं
भूल गया हूँ देह नश्वर है
स्मृत नहीं है, कौन ईश्वर है
इच्छाओं के द्यूत में फँसकर
भोग रहा हूँ नियति पे हँसकर
किसी कर्ण का तिरस्कार किया है
हाँ मैंने अहंकार किया है
पांच पांडव सी पंच इन्द्रियां
देह द्रौपदी सी बँट रही है
ह्रदय भीतर एक महाभारत
कदाचित इसलिये घट रही है
काल खींच रहा बन दुशासन
चीर श्वांस का घट रहा है
कर्म लाचार, विवश है संकल्प
राह केशव की तक रहा है
अपूर्ण ज्ञान ले उतरा रण में
गूढ़ पहेली बूझ रहा है
और जीवन के चक्रव्यूह में
मन अभिमन्यु सा जूझ रहा है
© - प्रशांत सेठ

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