लो भैया!! अब ये पसर गए की भारत माता की जय नहीं बोलूंगा। जिनके अपने ईमान का ठिकाना नहीं है, वो ठेकेदार बने बैठे हैं धर्म के। और इन ठेकेदारों (चाहे वो भगवाचन्द हों या हरीमुल्ला) का तथाकथित धर्म जरा जरा सी बात में खतरे में पड़ने लगता है। और ये मिटटी के क्षणभंगुर पुतले, धर्मरक्षक होने का दावा ठोकने लगते हैं। सच तो ये है की यदि ये लोग जहर ना उगलें तो इनका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।
सुनो हे धर्म के ठेकेदार!! तुम्हारा धर्म एक रंगी है इसलिये खतरे में पड़ जाता है। क्योंकि अन्य रंग तुम्हें स्वीकार नहीं हैं और अन्य रंगों को तुम। सच तो ये है कि वास्तविक धर्म कहीं भी कभी भी खतरे में नहीं है। धर्म तो वह है जो इंद्रधनुष के सातों रंग को स्वीकार करता है। जो कुछ भी सृष्टा ने रचा है, उसे स्वीकार्य होता है। प्रकृति में विविधता तुम्हारे स्वीकार ना करने से नष्ट नहीं होगी। वैसे भी किसी वस्तु की रक्षा करने या नष्ट करने के लिए उसके स्थान का ज्ञान होना आवश्यक है। तुम क्या किसी धर्म की रक्षा करोगे या अन्य धर्मों को नष्ट करोगे? धर्म के मर्म की बात छोडो, तुम्हें तो ये भी नहीं पता कि हमारा धर्म रहता कहाँ है।
हमारा धर्म रहता है हमारे आचरण में, विचारों में, आस्था में। और ये तुम्हारे मिटाये से ना मिटेगा। किसी के मिटाये से ना मिटेगा। ये मिटेगा जब हम स्वयं ही धर्म विमुख आचरण करेंगे। और तब भी वह मिटेगा तो मात्र हमारे जीवन से, संसार से नहीं। हमारे धर्म को यदि खतरा है तो हम ही से। वैश्विक धर्म तो सत्य है, इसलिये सनातन है और अनश्वर है।
इसी बात पर एक गरिष्ठ सी रचना। गरिष्ठ इसलिये क्योंकि मुझे मालूम है ये तुम्हें हजम नहीं होगी।
उन्माद मत बनाओ रण का
विषय है ये अंतःकरण का
निज आस्था और प्रण का
धर्म विषय है आचरण का
ना अर्जुन का ना ही कर्ण का
ना जाति का ना ही वर्ण का
धर्म विषय नहीं हार जीत का
ये विषय है निज समर्पण का
मार्ग है मुक्ति के वरण का
और बंधनों के हरण का
जीवन का भी अर्थ यही है
यही तात्पर्य है मरण का
भटके हुए पथिक को जैसे
तरुवर दे विश्वास शरण का
धर्म वही शक्ति है जैसे
बल होता है माँ के चरण का
देखो गौर से देह नश्वर है
त्यागो अहंकार एक ज्वर है
रक्षक होना मिथ्या भ्रम है
मनुज कौन सा यहाँ अमर है?
सुनो भीतर उपजता स्वर है
सनातन सत्य ये अनश्वर है
धर्म सदा रक्षित है क्योंकि
रक्षक उसका स्वयं ईश्वर है
© - प्रशांत सेठ
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