"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तंत्र देवताः"
सुना है आज महिला दिवस है। होगा!
मेरे लिए तो ऐसा कोई दिन नहीं है जिस दिन स्वयं को किसी नारी का ऋणी ना पाया हो। माँ, बहन, बेटी, पत्नी इनके बिना अस्तित्व ही संभव नहीं है। मैं क्या, आप क्या, स्वयं सृष्टि का निर्माता भी अपनी इस रचना से उपकृत होगा।
नारी यानि सृजन, नारी यानि पोषण, नारी यानि जीवन। नारीत्व को धन्यवाद स्वरुप, एक पुरानी रचना आज दोबारा साझा कर रहा हूँ....
नारी
बहुत की है कोशिश हमने
इतनी छोटी बात नहीं है
सच कहूँ तो तुमपर लिखना
मेरी तो औकात नहीं है
विस्तृत नीले नभ के जैसी
सागर से भी गहरी तुम हो
तुम नारी हो तुमसे बढ़कर
सृष्टि की सौगात नहीं है
संस्कारों की जननी तुम हो
मानवता की तुम शिल्पी हो
तुम नारी हो बिना तुम्हारे
आदम की ही जात नहीं है
भक्ति का आधार तुम्ही से
शक्ति का संचार तुम्ही से
तुम दुर्गा हो तुम लक्ष्मी हो
अबला जैसी बात नहीं है
सीता तुम हो राधा तुम हो
राम कृष्ण की गाथा तुम हो
जीवन को आकार जो देती
प्रेरणा तुम सी ज्ञात नहीं है
सृष्टि का श्रृंगार भी तुम हो
हर रचना का सार भी तुम हो
सात रंग और सात सुरों का
ऐसा कहीं अनुपात नहीं है
प्रिया का भी काजल तुम हो
कभी माँ का आँचल तुम हो
प्रेम के इस भाष्य से बढ़कर
ईश्वर का संवाद नहीं है
© - प्रशांत सेठ
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