Tuesday, March 1, 2016

अर्थ-शस्त्र

दर्द कहीं दवा कहीं। बजट चाहे जैसा हो मगर व्यवस्था तो वही पुरानी है। इस प्रजातांत्रिक देश के अर्थशास्त्र पर एक व्यंग रचना...

पड़ोस वाले शर्मा जी का सिर फिर गया
वो सेंसेक्स की तरह धड़ाम से गिर गया
दर्द जाट आंदोलन की तरह भड़क रहा था
वो गरीब हिंदुस्तान की तरह तड़प रहा था

मैंने कहा, तुम भारतीय मुद्रा की तरह रो रहे हो
अर्थव्यवस्था की तरह कमज़ोर हो रहे हो
चलो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते हैं
क्यों मिडिल क्लास उम्मीदों की तरह खो रहे हो

बोले, सीने में दर्द है, बुरा हाल है
इस बजट ने बना दिया कंगाल है
सर्विस टैक्स, उसपे सेस, ये कैसा न्याय है
गोया की ये ग्वाले हैं और जनता गाय है

मैंने कहा मोहल्ले में नया डॉक्टर आया है
अच्छे दिनों का नुस्खा लाया है
पित्त विशेषज्ञ है, डॉ. करुण केटली नाम है
सुना है अडानी-अम्बानी सबको आराम है

माना की तुम्हारा बरसों पुराना मर्ज़ है
लेकिन एक बार दिखा लेने में क्या हर्ज़ है
दर्द मिट जाये तो समझ लेंगे चमत्कार है
वरना हर बार की तरह ये भी स्वीकार है

मैंने उनकी सोई हुई उम्मीद को जगाया
और डॉक्टर केटली के घर तक ले आया
मतदान समझकर जैसे ही बटन दबाया
वो तथाकथित चमत्कार बाहर आया

बोला सेठ जी, मेरे पास एक चमत्कारी दवाई है
वो तुम्हें खानी होगी, क्योंकि शर्मा जी का बीपी हाई है
टैक्स रुपी दवाई को महंगाई रुपी दूध में मिला लो
ज़्यादा नखरे मत करो, चुपचाप दवाई खा लो

हमने पूछा डॉ साहब ये कैसा इलाज है
मर्ज़ इनका, दवाई मुझे, इसमें क्या राज है?
वो बोले, मैंने अपने बड़े भाई से सीखा है
इलाज का ये एक नायाब तरीका है

गरीबी की तरह ये बीमारी भी एक तुलनात्मक रोग है
आप बीमार हैं जब तक आपके आस पास स्वस्थ लोग हैं
इसलिये अच्छे भले स्वस्थ आदमी को बीमार करो
मिडिल क्लास को गरीब बनाने पर विचार करो

समस्या देश में भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंक है
बेईमानी राजा है और ईमानदारी रंक है
बीमार भले ही ये सड़ा हुआ सरकारी तंत्र है
दवाई प्रजा को खानी है, यही मूल मंत्र है

© - प्रशांत सेठ

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