Monday, October 26, 2015

एक आहत व्यंग

हो सके तो कलम में फिर धार करो
उठो हे समाज के सृजक, प्रहार करो
रुदन ना करो अन्य के दोषों पर आज
तुम स्वयं शिल्पकार हो, स्वीकार करो

ना किसी नाम विशेष पर टिपण्णी है, ना ही ये किसी की निंदा है। क्योंकि दूर बैठकर किसी के मन के भाव को जान लेने का सामर्थ्य मुझमें नहीं। यह केवल एक प्रयास है कर्तव्यबोध का।

विरोध क्यों और किसका? जब हम स्वयं इस समाज के निर्माता हैं। सत्ता में कोई भी रहे वह तो जनता की छाया मात्र है। लोकतंत्र है इसलिये यथा प्रजा तथा राजा। दोषारोपण करना साहित्य का काम नहीं है। साहित्य का काम है सत्य का दर्शन करना और कराना और साथ ही भविष्य का निर्माण करना।

एक आहत व्यंग

आज टीवी न्यूज़ थी ब्रेकिंग अर्थात तोड़ने वाली
एक और साहित्यकार के पुरुस्कार छोड़ने वाली
सबकी तरह हमने भी मानसिक मंजन किया
सोने से पहले कुछ औपचारिक चिंतन किया

नींद में अचानक हमारे अंदर के लेखक ने पुकारा
हे ज्ञानपुंज, हे सिद्धांतवादी, हे वर्तमान युग के नाकारा
सारे देश में चारों तरफ हाहाकार हो रहा है
और एक स्वयंभू साहित्यकार सो रहा है?

उठो किसी का समर्थन करो या विरोध करो
बना नहीं सकते तो उत्पन्न अवरोध करो
परिचय दो संसार को अपनी विद्वता का
कर्म के वृक्ष पर अमरबेल की लता का

मैंने कहा देव, मैं ना किसी के समर्थन में हूँ ना ही विरोध में
मैं साहित्यकार भी नहीं हूँ, बस जिज्ञासु हूँ सत्य के शोध में
एक बात ये भी है, कुछ मिला ही नहीं तो छोड़ूँगा क्या?
मैं नंगा अगर नहा लूँगा तो फिर निचोड़ूँगा क्या?

वो बोले तुझे ले चलता हूँ एक विचित्र संसार में
गीत ग़ज़ल शायिरी और साहित्य के बाज़ार में
देख कितनी दुकानें हैं यहाँ, बड़े बड़े नाम हैं
जो साहित्य के रावण हैं मगर लिखते राम हैं

और इनसे मिलो ये इस बाज़ार के बड़े माफिया हैं
साहित्य ग़ज़ल है अगर तो ये रदीफ़ हैं, काफ़िया हैं
इनके पलटने से बड़े बड़ों के तख़्त पलट जाते हैं
ये कभी पुरुस्कार लेते हैं तो कभी लौटा आते हैं

हमने कहा हुज़ूर साहित्य सृजन है, विषय नहीं क्रोध का
इसे क्यों बनाते हैं हथियार राजनीतिक प्रतिशोध का
मिले हुए सम्मान का कुछ तो सम्मान कीजिये
कलम को सियासत का मत गुलाम कीजिये

वो बोले तुम अभी नए हो इसलिये आदर्शवादी हो
सूट बूट के ज़माने में, नैतिकता की खादी हो
अब वक़्त बदल गया है, रस्मो रिवाज़ बदल गए हैं
साहित्य के परिंदे के सियासी पर निकल गए हैं

हाथ जोड़ो, पैर पकड़ो, पुरुस्कार की भीख लो
पुरानी धुन छोडो और नई सरगम सीख लो
'स' से सलाम 'र' से राजा 'ग' से गुणगान 'म' से मंच
साहित्यकार कहलाना है तो जान लो ये सारे प्रपंच

त्याग की बात करते रहो और बने रहो भोगी
तो इस बाज़ार में एक दुकान तुम्हारी भी होगी
टीवी में, अख़बार में तुम ही तुम दिखोगे
मेरी बात मान लो प्यारे, खूब बिकोगे

स्वप्न था या दृश्य यथार्थ कथन का?
हमने चित्र देखा मनुष्यता के पतन का
हम अपनी दुनिया में तो लौट आये हैं
कुछ प्रश्न मगर साथ में ज़रूर लाये हैं

व्यवस्था पर दोष डालना सही ढंग नहीं है
क्या हम भी इसी व्यवस्था का अंग नहीं हैं?
अगर साहित्यकार हैं तो दायित्व स्वीकार करें
उठायें कलम, रुग्ण मानसिकता पर प्रहार करें

दर्पण में बिम्ब दिखायें अवश्य वर्तमान का
मगर रास्ता भी बनायें भविष्य के निर्माण का
क्योंकि कल की नींव है ये, प्रेरणा है आज की
कलम तो स्वयं शिल्पकार है इस समाज की

© - प्रशांत सेठ

Monday, October 19, 2015

अहंकार

"मुझे आज तक समझ में नहीं आया के संसार ऐसा क्यों है, वैसा क्यों नहीं है। लोग इतनी सी बात को समझते क्यों नहीं हैं"

ये शब्द आपने अक्सर कुछ लोगों के मुंह से सुने होंगे। ये एक विशेष प्रकार की प्रजाति होती है जो स्वयं को इस संसार से अलग मानती है और प्रदर्शित भी करती है। ईश्वर ने उन्हें गलती से इस संसार में भेज दिया होता है क्योंकि उनके अनुसार वे पात्र तो किसी अन्य उत्कृष्ट लोक के होते हैं। बहुत घुटन होती है उन्हें इस संसार में। अपने चारों तरफ उन्हें कोई भी अपने समकक्ष नहीं मिलता। अंत में अवसाद लेकर इस संसार से जाते हैं। निश्चित है ऊपर जाकर भी शिकायत ही करते होंगे।

हम कोई अपवाद तो हैं नहीं। आपको ऐसे लोग मिल सकते हैं तो हमको क्यों नहीं? ऐसे ही एक सज्जन सुबह सुबह टकरा गए। मन ही मन कुछ हमदर्दी और उजागर शुभकामनाओं के साथ विदा किया। अब आप पूछेंगे की हमदर्दी भी कोई मन ही मन देने की चीज़ है? तो हम कहेंगे की मेरे भाई, जिसे स्वयं के रुग्ण होने का पता नहीं है, वो हमारी हमदर्दी क्यों लेगा?

चिंतन करना मेरा स्वाभाव है। उद्देश्य है स्वयं के अंदर निरंतर सुधार का प्रयास। इसलिये इस दर्पण में सबसे पहले अपना चेहरा देखा तो पाया कि कभी हम भी तो ऐसे ही थे। जब तक सिर्फ दूसरों को पढ़ते रहे तब तक शिकायतों से भरे रहे। अब जब दूसरों के पहले खुद को भी पढ़ते हैं तो अपनी कमियों के प्रति सजगता बढ़ती है। परिणाम आनंद शांति और प्रेम के रूप में मिलता है। और इससे बड़ी सफलता क्या होती होगी?

इस बार विजयादशमी पर भीतर ही कुछ जल जाये तो क्या बुरा है। देखिये, ये रचना शायद आपके भी किसी काम की हो...

अहंकार

विद्वता का चोला ओढ़े
कब चुपके से तुम आ गये
मेरे मन मंदिर के भीतर
चोरी चोरी समा गए

कभी पर्वत सा वृहद लेकर
कभी राई सा लघु आकार
क्रोध घृणा है द्वेष मोह भी
अनंत तुम्हारे हैं प्रकार

दस चेहरे तुम ही रावण के
तुम ही राम का हो वनवास
सूर्पनखा का दर्प तुम ही हो
तुम ही सीता का संत्रास

लेकिन मैं पहचान रहा हूँ
बदलो तुम कितने भी रूप
तुम ही कभी छाँव हो और
कभी तुम ही बन जाते धूप

भ्रम के अदृश्य आवरण से
अवरुद्ध करते ज्ञान की राह
भटकाते हो मन को तुम ही
देकर झूठे मान की चाह

सहज सुंदर जीवन में
विशिष्टता का भ्रामक स्वाद
फिर कुंठाओं का रूप लेकर
तुम ही बन जाते अवसाद

भरा घट लेकर मेघों से
करते हो वर्षा की आस
चलो जरा रीत भी जाओ
खाली होकर आओ पास

मन भीतर से खुद पूछेगा
प्रकाश रखूँ या अंधकार?
सागर मिलन की प्यास रखूँ
या पृथक बूँद का अहंकार?

© - प्रशांत सेठ

Thursday, October 15, 2015

एक पाती (वित्त) चोर के नाम


मेरे एक प्यारे से मित्र हैं। हास्य कवि हैं, उसपर से सरदार भी। उनकी कोई फैक्टरियां भी नहीं हैं और बाप दादों ने भी दिल खोल के दिया तो है, लेकिन केवल आशीर्वाद।

उनके घर कल रात चोरी हो गई। पहले तो दुखी हुए; बताया की जीवन भर की जो थोड़ी बहुत जमा पूँजी थी वो चली गई। फिर हंसने लगे। मुझे भी हंसी आ गई; अब एक कवि के घर सरस्वती ही रह सकती है, लक्ष्मी कहाँ ठहरती है। वित्त चला गया तो जाने दो, चित्त ना जाने पाये।

भीगा होगा अंतर्मन जिसका
वही तो मुस्कुराता है
मुझे मालूम है वो रोया होगा
जो सबको हंसाता है

द्रवित ह्रदय ने फिर एक रचना को जन्म दे दिया ....

एक पाती (वित्त) चोर के नाम

उम्मीदें थीं कल की इसमें
कुछ बूँदें थीं पसीने की
कुँवारे जेवर थे बहन के
बेटी की फीस महीने की

लटक रही पीले पत्ते सी
एक आशा की डाली थी
बीमार माँ की थीं श्वांसें
दवा की शीशी खाली थी

बच्चों से किये वादे इसमें
जो अभी तक अधूरे थे
बहुत नहीं था अलमारी में
लेकिन सपने पूरे थे

फिर भी सब कहाँ था उसमें
भावों का गंगाजल नहीं था
रब की उसमें दुआ नहीं थी
और धीरज का बल नहीं था

कुछ ज़रूरत थीं जीवन की
मुश्किलों का हल नहीं था
असली धन तो छोड़ गए तुम
साहस और संबल नहीं था

यही सोच मैं दुआ देता हूँ
तुम्हारी भी तो बेटी होगी
बूढ़ी माँ होगी बिस्तर पर
जो बीमार सी लेटी होगी

ऐसी कोई मजबूरी जो
शायद मुझसे बड़ी होगी
सर उठाये ज़रूरत कोई
द्वार तुम्हारे खड़ी होगी

मगर जीवन यज्ञ में सुन लो
निज श्रम का ही फल मिलता है
खुशियों का कोई फूल कहाँ
रेगिस्तानों में खिलता है

इसलिये मेरी इस पाती को
पवित्र ह्रदय से पढ़ना तुम
चरित्र आँगन के फूलों का
संस्कारों से गढ़ना तुम

ईमान का कुछ धन लेकर
बेटी की फीस में मिला देना
बूढ़ी माँ को मेहनत की भी
दो बूँद ज़रूर पिला देना

© - प्रशांत सेठ


Wednesday, October 14, 2015

बचपन

सफल लोग बताते हैं की जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन मैं इन सफल लोगों से सहमत नहीं हूँ। कभी कभी पीछे मुड़कर देख लेने से बहुत कुछ ऐसा मिल जाता है जो जीवन की रफ़्तार में छूट गया है....

बचपन

बचपन वाले पंख लगाकर
उड़ने को बस है तैयार
चला आज फिर सपने लेकर
मन पंछी बादल के पार

स्मृतियों के झरोखे से
अतीत झाँक रहा इस पार
इक सुंदर थी राजकुमारी
इक सुंदर था राजकुमार
चला आज फिर....

फूलों से लेकर खुशबू
तितलियों से रंग हज़ार
हवाओं के साथ मिलकर
महकाते थे हम संसार
चला आज फिर....

रूठना फिर मान जाना
ज़रा देर की वो तकरार
ना ह्रदय में गांठ कोई
ना रिश्तों में अहंकार
चला आज फिर....

ना किसी की जीत ही थी
ना किसी की थी तब हार
संघर्षों से परे ह्रदय में
पलता था बस निश्छल प्यार
चला आज फिर....

मित्रता में स्वार्थ नहीं था
ना क्षमा थी ना आभार
इक पल में बह जाता था
नयनों से ह्रदय का ज्वार
चला आज फिर....

समझ नहीं ज्ञान नहीं था
दायित्वों का ना था भार
छोटी छोटी ख़ुशी बड़ी थी
छोटा सा दुःख था अपार
चला आज फिर....

मिट्टी की गुल्लक में रखे
सपनों का फलता व्यापार
हमसे बड़ा धनिक नहीं था
इच्छाओं का न था विस्तार
चला आज फिर....

मुस्कानों पे शर्त नहीं थी
मुक्त थी आंसुओं की धार
उत्सव था जीवन सारा
हर दिन था जैसे त्यौहार
चला आज फिर....

बचपन में नादानी थी
समझ पड़ी थी लाचार
मुड़कर देखा तो पाया कि
छूट गया जीवन का सार
चला आज फिर....

© - प्रशांत सेठ

Sunday, October 11, 2015

मेरा किरदार पढ़ लोगे

काव्योदय में आज के मिसरे से प्रेरित एक ग़ज़ल। मिसरा था...

"कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे"
___________

न काबा में न काशी में मुझे क्या यार पढ़ लोगे
कभी दिल से ज़रा समझो मेरा किरदार पढ़ लोगे

न जाने खोजते हो क्या सदा औरों की सीरत में,
कि खुद को पढ़ लिया जिस दिन तो तुम संसार पढ़ लोगे

ज़रा डुबो कभी इसमें ये जीवन मौजे दरिया है
किनारों पर यूँ ही रहकर भला क्या धार पढ़ लोगे

ज़रा साँसों को तरसो और लो गहराई में डुबकी
कज़ा क्या है ज़रा इस पार से उस पार पढ़ लोगे

कभी जब वक़्त होगा ज़ीस्त की दौलत लुटाने का
अमानत थी किसी की ये तुम्हें उधार पढ़ लोगे

तुम्हारे हाथ में हैं गढ़ लो खुद तकदीर तुम अपनी
लकीरें जब पसीने से धुलेँगी सार पढ़ लोगे

सफीना हौसले का हो, रहे पतवार रहमत की
बहुत छोटी सी है मुश्किल की ये मझधार पढ़ लोगे

गुमाँ ताउम्र था हो वस्ल तुमसे आज ही शायद
गुमाँ ही था कि तुम आँखों में इंतज़ार पढ़ लोगे

चलो अच्छा ही है जो बाख़बर हो तुम ज़माने से
खबर जब साया होगी "सेठ" की, अखबार पढ़ लोगे

© - प्रशांत सेठ

Friday, October 2, 2015

अपना अपना गांधी

गांधी जब तक एक दर्शन है तब तक वंदनीय है। मगर जहाँ केवल प्रदर्शन (दिखावा) बनकर रह गया है, वहां निंदनीय हो जाता है। दुनिया में राजनीतिक स्वार्थ और अपूर्ण समझ ने ऐसे कितने ही दर्शन और चिंतन को विकृत रूप दिया है तो गांधी कौन सा अपवाद हैं।  इस दर्शन को अपनाने के बजाय केवल प्रदर्शन तक सीमित हो जाने की वजह से इसकी गहराई को समझ पाना सबके लिए संभव नहीं है। इसको वही जान सकता जिसने गांधी जी के आत्मबल को धारण किया होगा। बलहीनों को भी अपने अधिकार के लिये संघर्ष करने का जो तरीका गांधी ने दिया है, उसके सामने दुनिया आज भी झुकती है; लेकिन तब ही जब इस प्रक्रिया को पूरी तरह आत्मसात किया जाए।

लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूँ। यह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं है, वरन एक मानसिकता पर है। और समर्थन है एक दर्शन का। एक पुरानी रचना जो आज भी पुरानी नहीं है...

अपना अपना गांधी

गांधी वो जो है नोट पर
या वो जो जिया लंगोट पर

गांधी वो जिसकी तस्वीर दीवारों पर
या वो जिसका प्रभाव है विचारों पर

गांधी वो जो स्वयं में एक दर्शन है
या वो जो खादी में कोरा प्रदर्शन है

गांधी वो चरखा जिसका स्वाभिमान है
या वो जो चर के खा रहा हिंदुस्तान है

गांधी वो जो दफ़न है राजघाट में
या वो जो है सत्ता के ठाट बाट में

मुझे नहीं मालूम तुम्हारा गांधी कौन है
मेरा गांधी तो शर्म से मौन है

फिर भी तुम सबको बधाई हो
शायद तुमने भी गांधी जयंती मनाई हो

खैर जाने दो अपना अपना सबका गांधी है
मेरा तो चला गया गुजरी हुई आंधी है

तुम्हारा वही है ना?
जिसके चेलों की आज भी चांदी है

© - प्रशांत सेठ


Thursday, October 1, 2015

बिटिया

कल प्यारी बेटी का 17वां जन्मदिन था। इससे बढ़कर मेरे पास कोई उपहार नहीं था। संसार की सभी बेटियों को समर्पित ...

बिटिया

मेरी बिटिया तू लाखों में है
तेरा स्वप्न मेरी आँखों में है
यही विश्वास तेरा उपहार है
बल मेरा तेरे पाँखों में है
(पाँखों = पंख)

मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है
तू मेरे प्रयासों की शक्ति है
एक तू ही बंधन है जग से
तू ही जीवन से अनुरक्ति है

यह संसार कुम्हार की भट्टी
और ये कच्ची गीली सी मिटटी
इसे संस्कारों की चाक पे गढ़ना
तुझमें ईश्वर की छुपी थी चिट्ठी

समय हुआ अब उड़ने का नीड़ से
घर से निकल मिल दुनिया की भीड़ से
तुझे गगन है पाने को आतुर
मोह कैसा मुझ नश्वर अनीड से
(अनीड = जिसका आश्रय ना हो)

साहस हूँ मैं, नहीं बैसाखी हूँ
पथरीली राहों का साथी हूँ
भोर हुये जिसको बुझना होगा
रात भर जलती हुई बाती हूँ

कल तेरी अपनी सृष्टि होगी
देह नहीं, मेरी दृष्टि होगी
मै वहीँ रहूंगा ह्रदय में तेरे
जब जब स्मृतियों की वृष्टि होगी

© - प्रशांत सेठ